अमेरिका ने छात्र वीज़ा धारकों के ठहरने की अधिकतम अवधि तय करने की दिशा में कदम बढ़ाया है। 28 अगस्त को अमेरिकी डिपार्टमेंट ऑफ होमलैंड सिक्योरिटी (DHS) ने एक ड्राफ्ट नियम जारी किया, जिसके तहत लगभग आधी सदी से लागू “ड्यूरेशन ऑफ स्टेटस (D/S)” व्यवस्था को खत्म करने का प्रस्ताव रखा गया है। इस व्यवस्था के तहत अब तक F-1 (शैक्षणिक छात्र) और J-1 (एक्सचेंज विज़िटर) वीज़ा धारक तब तक अमेरिका में रह सकते थे, जब तक वे फुल-टाइम नामांकित रहते और नियमों का पालन करते।
नए प्रस्ताव के मुताबिक अब छात्र अधिकतम चार साल तक ही रह पाएंगे। इसके बाद उन्हें DHS से ‘एक्सटेंशन ऑफ स्टे’ (EOS) के लिए आवेदन करना होगा।
वर्तमान में अमेरिका में 10 लाख से ज्यादा विदेशी छात्र पढ़ाई कर रहे हैं, जिनमें से लगभग 3.3 लाख भारत से हैं।
एनबी वीज़ा वर्ल्ड प्राइवेट लिमिटेड के प्रबंध निदेशक जनक नायक ने वाइब्स ऑफ़ इंडिया को बताया कि पीएचडी छात्रों को वीज़ा विस्तार पाने के लिए एक लंबी और महंगी प्रक्रिया से गुजरना होगा।
नायक, जिनकी देश भर में शाखाएँ हैं, ने आगे कहा कि कई छात्र यूके, ऑस्ट्रेलिया और कनाडा की ओर रुख कर सकते हैं। अब एक वीज़ा पर दो मास्टर डिग्री प्राप्त नहीं की जा सकतीं। उन्होंने कहा कि एक डिग्री पूरी होने के बाद छात्र दूसरे वीज़ा के लिए आवेदन कर सकेंगे।
अहमदाबाद की सीमा पटेल (बदला हुआ नाम) कुछ महीनों में F1 वीज़ा पर अमेरिका जाएँगी। उन्होंने वाइब्स ऑफ़ इंडिया को बताया कि अपनी मास्टर्स डिग्री के लिए वह ऐसे देश जाएँगी जहाँ ज़्यादा पाबंदियाँ न हों।
18 वर्षीय सीमा ने कहा, “मेरे जो दोस्त अमेरिका में पढ़ाई पूरी कर रहे हैं, वे भी आगे की पढ़ाई के लिए दूसरे देशों में जा रहे हैं।”
ड्यूरेशन ऑफ स्टेटस क्या है और इसे क्यों खत्म किया जा रहा है?
अभी तक F-1 वीज़ा पर आने वाले छात्रों के I-94 फॉर्म में कोई निश्चित समाप्ति तिथि दर्ज नहीं की जाती थी। उनकी स्थिति “D/S” यानी Duration of Status के तौर पर अंकित रहती थी, जिसका मतलब था कि जब तक छात्र नामांकित हैं, वे देश में रह सकते हैं।
छात्रों की गतिविधियों पर निगरानी विश्वविद्यालयों के Designated School Officials (DSOs) के माध्यम से रखी जाती थी और सारी जानकारी DHS के Student and Exchange Visitor Information System (SEVIS) को भेजी जाती थी।
लेकिन DHS का कहना है कि मौजूदा व्यवस्था का दुरुपयोग हो रहा है। कई छात्र दशकों तक अमेरिका में रह जाते हैं, अलग-अलग प्रोग्राम करते हैं या उन्नत डिग्री लेने के बाद भी भाषा स्कूलों में दाखिला लेते हैं।
2023 में अनुमानित तौर पर F-1 वीज़ा धारकों का ओवरस्टे रेट 2.69% था। वहीं, F-1 एडमिशन 1980-81 के 2.6 लाख से बढ़कर 2023 में 16 लाख से ज्यादा हो गया। J-1 वीज़ा में भी 1980 के दशक से अब तक 250% की बढ़ोतरी हुई है।
अधिकारियों का तर्क है कि इतनी बड़ी संख्या में छात्रों पर निगरानी रखना कठिन है। तय समयसीमा लागू करने से अनुपालन की नियमित समीक्षा आसान होगी और दुरुपयोग की संभावना कम होगी।
प्रस्तावित बदलाव क्या हैं?
- छात्रों को अधिकतम चार साल या कोर्स पूरा होने तक (जो भी पहले हो) रहने की अनुमति होगी।
- चार साल से अधिक रुकने के लिए उन्हें USCIS (US Citizenship and Immigration Services) को Form I-539 भरकर एक्सटेंशन के लिए आवेदन करना होगा। इसमें फीस, वित्तीय दस्तावेज़, बायोमैट्रिक्स और इंटरव्यू शामिल होंगे।
- पढ़ाई पूरी करने के बाद का ग्रेस पीरियड 60 दिन से घटाकर 30 दिन कर दिया जाएगा।
- ट्रांसफर पर रोक: अंडरग्रेजुएट छात्रों को कम-से-कम एक साल पढ़ाई पूरी करनी होगी, तभी वे दूसरे स्कूल में जा सकेंगे। वहीं, ग्रेजुएट छात्र बीच कोर्स में प्रोग्राम नहीं बदल पाएंगे।
- छात्र अब समान स्तर या उससे नीचे की डिग्री शुरू नहीं कर पाएंगे। यानी “सेकंड मास्टर्स” की प्रैक्टिस खत्म हो जाएगी।
- भाषा अध्ययन (Language Study) की अवधि अधिकतम 24 महीने तक सीमित होगी।
ह्यूस्टन के इमिग्रेशन वकील चंद पर्वथनेनी ने कहा, “अब हर किसी को एक एंड डेट मिलेगी। अगर समय से ज्यादा चाहिए तो एक्सटेंशन लेना पड़ेगा। पहले तक जब तक विश्वविद्यालय पुष्टि करता था, USCIS दखल नहीं देता था। लेकिन अब USCIS आवेदन को मंजूरी या खारिज कर सकता है। इससे अनिश्चितता बढ़ेगी।”
किस पर होगा असर?
- शॉर्ट मास्टर्स प्रोग्राम वाले छात्रों पर ज्यादा असर नहीं होगा।
- लेकिन PhD (5-6 साल) या STEM OPT (तीन साल तक का कार्य-अनुभव) करने वाले छात्रों को निश्चित रूप से एक्सटेंशन लेना पड़ेगा।
- सेकंड मास्टर्स का विकल्प भी बंद हो जाएगा, जो अक्सर भारतीय छात्र H-1B वीज़ा न मिलने पर चुनते थे।
पहले से मौजूद छात्रों पर क्या असर पड़ेगा?
फ़िलहाल, यह सिर्फ एक प्रस्ताव है। स्टेट डिपार्टमेंट और CBP अभी भी D/S सिस्टम के तहत छात्रों को एडमिट करेंगे।
ICE के Student and Exchange Visitor Program (SEVP) ने विश्वविद्यालयों को सूचित किया है कि छात्रों को कोई तत्काल कदम उठाने की ज़रूरत नहीं है।
अगर नियम लागू हुआ, तो मौजूदा छात्रों को उनके I-20 फॉर्म के आधार पर एक निश्चित एंड डेट मिलेगी और एक बार का ग्रेस पीरियड मिलेगा।
कब लागू हो सकता है नया नियम?
- इस प्रस्ताव पर टिप्पणियां 29 सितंबर तक दी जा सकती हैं।
- कागज़ी कार्यवाही और SEVIS में बदलावों पर सुझाव देने की आखिरी तारीख 27 अक्टूबर है।
- DHS को सबमिशन की समीक्षा करनी होगी, जिसके बाद अंतिम नियम जारी किया जाएगा।
- माना जा रहा है कि यह नया नियम 2026 की शुरुआत या मध्य तक लागू हो सकता है।
विश्वविद्यालयों और संगठनों की प्रतिक्रिया
- Presidents’ Alliance on Higher Education and Immigration (580 अमेरिकी विश्वविद्यालय प्रमुखों का संगठन) ने इसे “अनावश्यक और हानिकारक” बताया और कहा कि इससे USCIS का काम बढ़ेगा और महामारी के बाद मुश्किल से सुधर रही एडमिशन प्रक्रिया और प्रभावित होगी।
- NAFSA (अंतरराष्ट्रीय शिक्षा से जुड़ा प्रमुख संगठन) ने कहा कि यह नियम शैक्षणिक निर्णयों को कैंपस से हटाकर इमिग्रेशन अधिकारियों के हाथ में देगा, जो खतरनाक और अनावश्यक है।
- Manifest Law ने चेतावनी दी कि बीच कोर्स में एक्सटेंशन की अनिवार्यता छात्रों को अस्थिर स्थिति में डाल सकती है।
- RNLawGroup ने स्पष्ट किया कि कानूनी मंजूरी सिर्फ USCIS ही देगा, DSO नहीं। अगर चार साल की सीमा पार हुई तो छात्र को अमेरिका में दोबारा प्रवेश पर 3 से 10 साल का बैन झेलना पड़ सकता है।
- Badmus Law Firm का कहना है कि चूंकि अमेरिका में बैचलर्स डिग्री पूरी करने में औसतन 4.3 साल और PhD में 5.7 साल लगते हैं, इसलिए बहुत से छात्रों को एक्सटेंशन की ज़रूरत होगी।
हालांकि पर्वथनेनी का कहना है कि “अनिश्चितताओं के बावजूद अमेरिका अभी भी उच्च शिक्षा के लिए सबसे अच्छा देश है। जो छात्र पहले से यहां हैं, उन्हें बस नियमों का पालन करना चाहिए।”
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