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बिहार चुनाव से पहले बीजेपी की रणनीति और बंगाल के मटुआ समीकरण से बढ़ी सियासी हलचल

| Updated: September 4, 2025 14:01

बिहार चुनाव रणनीति पर बीजेपी की बड़ी बैठक, वहीं बंगाल के मटुआ समुदाय की नाराज़गी से पार्टी की चिंता बढ़ी

नई दिल्ली/पटना। आगामी बिहार विधानसभा चुनाव को लेकर भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने अपनी तैयारियों को तेज कर दिया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के एक दिन पहले दिए गए संदेश के बाद बुधवार को दिल्ली में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के आवास पर पार्टी की कोर कमेटी की बैठक हुई। बैठक में बीजेपी अध्यक्ष व केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जे.पी. नड्डा, बिहार प्रभारी विनोद तावड़े, सह-प्रभारी दीपक प्रकाश, उपमुख्यमंत्री विजय सिन्हा और सम्राट चौधरी समेत कई वरिष्ठ नेता मौजूद रहे।

बैठक में आरजेडी-कांग्रेस की ‘वोट अधिकार यात्रा’ के प्रभाव का आकलन, चुनावी कार्यक्रमों का खाका और विपक्ष के नैरेटिव का जवाब देने पर चर्चा हुई। पार्टी सूत्रों के अनुसार, चुनाव प्रचार में महिलाओं के सम्मान और सशक्तिकरण को ‘मइया’ के प्रतीक से जोड़कर प्रमुखता दी जाएगी। साथ ही, विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) से जुड़ी संवैधानिक प्रावधानों को स्पष्ट करने, आरजेडी शासन के ‘अंधकारमय दिनों’ और कांग्रेस की भ्रष्टाचार की राजनीति को उजागर करने पर भी जोर रहेगा।

बीजेपी नेताओं ने बताया कि अब तक नवंबर 20 तक के लिए कार्यक्रम तय कर लिए गए हैं। पार्टी का मानना है कि प्रधानमंत्री की मां को लेकर विपक्षी नेताओं द्वारा की गई अभद्र टिप्पणियों और आरजेडी शासन में महिलाओं की स्थिति जैसे मुद्दों पर जनता से सीधा संवाद किया जाएगा। साथ ही, SIR को लेकर फैलाए जा रहे भ्रम को दूर करने के लिए भी बड़े स्तर पर अभियान चलेगा।

बिहार बीजेपी अध्यक्ष दिलीप जायसवाल ने बताया कि राज्य की 243 विधानसभा सीटों पर संयुक्त एनडीए शिविर आयोजित करने पर चर्चा हुई। राष्ट्रीय नेतृत्व ने 25 सितंबर तक विधानसभा स्तर पर कार्यकर्ता सम्मेलन आयोजित करने के निर्देश दिए हैं। जायसवाल ने यह भी स्पष्ट किया कि सीट बंटवारे पर अंतिम फैसला राष्ट्रीय नेतृत्व ही करेगा। चुनावी रणनीति को धार देने के लिए वरिष्ठ नेताओं की एक चुनाव अभियान समिति भी बनाई जाएगी।

बिहार में राहुल गांधी से मिले मटुआ प्रतिनिधि

इसी बीच, बंगाल की राजनीति से जुड़ी एक घटना ने बीजेपी को और सतर्क कर दिया है। पश्चिम बंगाल के प्रभावशाली मटुआ समुदाय का एक 24 सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल 30 अगस्त को बिहार के सारण जिले के एकमा कस्बे में कांग्रेस नेता और विपक्ष के नेता राहुल गांधी से मिला। यह मुलाकात राहुल गांधी की ‘वोट अधिकार यात्रा’ के दौरान हुई।

मटुआ समुदाय का प्रतिनिधित्व करने वाले समूह ने राहुल गांधी को अपनी चिंताओं से अवगत कराया और आश्वासन पाया कि उनकी समस्याओं पर आगे भी फॉलो-अप किया जाएगा। इस दौरान उन्होंने एक बैनर भी दिखाया जिस पर लिखा था— “Rahul dada, come to Bengal .. SIR-e bipad, Congress-e nirapad”

कांग्रेस नेता अधीर रंजन चौधरी ने बताया कि मटुआ समुदाय के लोग बीजेपी और टीएमसी, दोनों से नाराज हैं क्योंकि उन्हें सिर्फ वोट बैंक की तरह इस्तेमाल किया गया है। उनकी सबसे बड़ी चिंता है कि SIR और नागरिकता से जुड़े प्रावधानों से उनका मतदाता सूची में नाम प्रभावित हो सकता है।

मटुआ राजनीति और बीजेपी की चिंता

मटुआ समुदाय, जो नमशूद्र जाति से जुड़ा है, पश्चिम बंगाल में अहम चुनावी ताकत रखता है। 2019 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी को बड़ी सफलता दिलाने में इस समुदाय की भूमिका रही थी। उस समय उन्हें नागरिकता संशोधन कानून (CAA 2019) का भरोसा दिया गया था। हालांकि, अब NRC और SIR जैसे मुद्दों ने समुदाय में आशंका पैदा कर दी है।

बीजेपी नेता और केंद्रीय मंत्री शांतनु ठाकुर ने आरोप लगाया कि कांग्रेस ने मटुआ प्रतिनिधियों को बहला-फुसलाकर बिहार ले जाया। उन्होंने कहा कि यह समुदाय बीजेपी और टीएमसी के झूठे वादों से थक चुका है, लेकिन कांग्रेस भी उन्हें गुमराह कर रही है। दूसरी ओर, कांग्रेस प्रवक्ता केतन जायसवाल ने इन आरोपों को बेबुनियाद बताया और कहा कि मटुआ समुदाय अब बदलाव चाहता है।

समुदाय का सियासी महत्व

मटुआ समुदाय का भारत आगमन विभाजन (1947) और 1971 के युद्ध के दौरान हुआ था। तब से लेकर अब तक नागरिकता और पहचान पत्र उनका केंद्रीय मुद्दा रहा है। 2003 में वाजपेयी सरकार द्वारा पारित नागरिकता संशोधन कानून और बाद में NRC ने उनकी स्थिति को और जटिल बना दिया।

वर्षों तक CPI(M) और बाद में TMC के साथ रहने के बाद यह समुदाय धीरे-धीरे बीजेपी की ओर झुका। लेकिन अब SIR और नागरिकता से जुड़ी अनिश्चितता के कारण उनमें असंतोष बढ़ रहा है।

बिहार चुनाव से पहले बीजेपी जहां अपने अभियान की रणनीति तय कर रही है, वहीं बंगाल के मटुआ समुदाय की नाराज़गी उसके लिए नई चुनौती बनती दिख रही है।

एक तरफ पार्टी बिहार में महिलाओं के सम्मान, भ्रष्टाचार विरोध और विकास के एजेंडे को प्रचार का आधार बना रही है, तो दूसरी ओर बंगाल में मटुआ समर्थन खोने का खतरा उसके सामने है। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि बीजेपी इन दोनों मोर्चों पर अपनी स्थिति कैसे संभालती है।

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