हांगकांग – अडानी फाउंडेशन की चेयरपर्सन डॉ. प्रीति अडानी ने हांगकांग में आयोजित AVPN ग्लोबल कॉन्फ्रेंस में अपने कीनोट संबोधन के दौरान परोपकार, सामाजिक बदलाव और सामूहिक प्रयासों की अहमियत पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि वास्तविक बदलाव तब आता है जब परोपकार केवल एकतरफा देने का काम न रहकर साझेदारी और सह-निर्माण का माध्यम बने।
उन्होंने कहा – “सिर्फ दान मत दीजिए, साथ मिलकर निर्माण कीजिए।”
डॉ. अडानी ने अपने भाषण में कहा कि सामाजिक विकास का अगला बड़ा कदम तभी संभव है जब परोपकारी संस्थान, एनजीओ और भागीदार एक साझा मंच पर आएं, जहाँ प्रयासों का समन्वय हो, अनुभव साझा हों और प्रभाव कई गुना बढ़ सके। उन्होंने कहा कि वास्तविक बदलाव अलग-अलग योगदान से नहीं, बल्कि एकजुट होकर काम करने से आता है।
डॉ. अडानी ने अपने संबोधन की शुरुआत कच्छ के रेगिस्तान की एक प्रेरक घटना से की, जहाँ उन्होंने एक महिला को बंजर भूमि में बीज बोते देखा था। उस महिला ने उनसे कहा था – “अगर बीज बोए ही नहीं जाएंगे तो बारिश आने पर जागेगा क्या?” इसी भावना को उन्होंने समाज में परिवर्तन का प्रतीक बताया।
सहयोग के तीन मूल मंत्र
डॉ. प्रीति अडानी ने इस साझा आंदोलन के लिए तीन अहम बिंदुओं पर जोर दिया:
- सह-निर्माण (Co-Building): हर भागीदार केवल दाता नहीं, बल्कि स्थायी बदलाव का निर्माता हो।
- लाभार्थी नहीं, गुणक (Multipliers, Not Beneficiaries): प्रभाव का असली पैमाना यह है कि लाभार्थी खुद बदलाव के वाहक बनें।
- कौशल और मूल्यों का संगम (Uniting Skills with Values): सिर्फ कौशल से भवन बन सकते हैं, लेकिन नींव नहीं। जब कौशल और मूल्य साथ आते हैं, तभी पीढ़ियों का निर्माण होता है।
उन्होंने कहा – “यह ताली बजाने का पल नहीं है, बल्कि संकल्प लेने का समय है। हमें वह पीढ़ी बनना होगा जिसने सूखे में भी बोया, बारिश से पहले ही विश्वास किया और सबके लिए गरिमा और अवसर की फसल तैयार की।”
उन्होंने अपने निजी अनुभव साझा करते हुए कहा कि शुरुआती दिनों में वह दंत चिकित्सक के रूप में करियर बनाना चाहती थीं, लेकिन पति गौतम अडानी के राष्ट्रनिर्माण के सपनों में साझेदारी के लिए उन्होंने यह पेशा छोड़ दिया। 1996 में स्थापित अडानी फाउंडेशन आज शिक्षा, स्वास्थ्य एवं पोषण, सतत आजीविका, सामुदायिक बुनियादी ढाँचे और जलवायु कार्रवाई जैसे पाँच स्तंभों पर कार्य कर रहा है। फाउंडेशन की पहुँच 7,000 भारतीय गाँवों तक है और यह 9.6 मिलियन से अधिक लोगों के जीवन को छू रहा है।
अपने संबोधन में उन्होंने तीन कहानियाँ साझा कीं –
- वंश (उमरपाड़ा, गुजरात): कुपोषण से जूझ रहे तीन वर्षीय वंश का जीवन अडानी सुपोषण संगिनी की मदद से बदल गया। आज वह स्वस्थ और सक्रिय है।
- रेखा बिसेन (तिरोडा, महाराष्ट्र): पति की मृत्यु के बाद निराशा में डूबी रेखा ने फाउंडेशन की मदद से न सिर्फ खुद को संभाला, बल्कि गाँव की पहली महिला दूध शीतलन केंद्र संचालक बनीं और 130 महिलाओं को प्रेरित किया।
- सोनल गढ़वी (मुण्ड्रा, कच्छ): किसान परिवार की बेटी सोनल ने अडानी पब्लिक स्कूल से शिक्षा प्राप्त की और आज आयरलैंड से मास्टर्स कर Apple में कार्यरत हैं।
अपने समापन संबोधन में उन्होंने कहा – “हमें सिर्फ दानदाता नहीं बल्कि सह-निर्माता बनना होगा। केवल सहानुभूति नहीं, बल्कि एकजुटता दिखानी होगी। हमें सूखे में बीज बोने वाली पीढ़ी बनना होगा, ताकि जब बारिश आए तो हमारी मेहनत से सम्मान और अवसर की फसल लहलहाए।”
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