अहमदाबाद): गुजरात भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) में शनिवार देर रात हुए एक बड़े संगठनात्मक फेरबदल ने पार्टी की आंतरिक राजनीति को गरमा दिया है। नवनियुक्त प्रदेश अध्यक्ष जगदीश विश्वकर्मा ने अपनी बहुप्रतीक्षित टीम की घोषणा कर दी, जिससे हफ्तों से चल रही अटकलों पर तो विराम लग गया, लेकिन संगठन में नेतृत्व के प्रभाव, गुटबाजी और क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व को लेकर नई चर्चाएं शुरू हो गई हैं।
नई टीम में किसे मिली क्या जिम्मेदारी?
पार्टी द्वारा जारी सूची के अनुसार, संगठन के ‘कमांड स्ट्रक्चर’ को नया रूप देते हुए 10 वरिष्ठ नेताओं को प्रदेश उपाध्यक्ष (Vice Presidents) की जिम्मेदारी सौंपी गई है। वहीं, अनिरुद्ध दवे, डॉ. प्रशांत कोराट, हितेंद्रसिंह चौहान और अजय ब्रह्मभट्ट को प्रदेश महामंत्री (General Secretaries) के रूप में पदोन्नत किया गया है।
इसके साथ ही पार्टी के सामाजिक और राजनीतिक ढांचे को पूरा करते हुए किसान मोर्चा, युवा मोर्चा, महिला मोर्चा, एससी-एसटी, ओबीसी और अल्पसंख्यक मोर्चा के प्रदेश अध्यक्षों की भी घोषणा कर दी गई है।
पार्टी का तर्क: संगठन की मजबूती और बूथ प्रबंधन ही लक्ष्य
भाजपा नेतृत्व ने स्पष्ट किया है कि इस कवायद का एकमात्र उद्देश्य संगठन को मजबूत करना है। पार्टी के अनुसार, अनुभवी नेताओं को उपाध्यक्ष पद की जिम्मेदारी दी गई है, जबकि महामंत्रियों में एक “प्रतिनिधि मिश्रण” (Representative Mix) तैयार किया गया है। इसका लक्ष्य आगामी राजनीतिक लड़ाइयों से पहले बूथ स्तर की दक्षता को बढ़ाना और संदेशों को सही तरीके से जनता तक पहुंचाना है।
गुजरात भाजपा के मुख्य प्रवक्ता डॉ. अनिल पटेल ने बताया कि घोषणा के तुरंत बाद नवनियुक्त पदाधिकारियों, प्रदेश अध्यक्ष और संगठन महामंत्री के बीच एक बैठक हुई। उन्होंने कहा, “सभी को औपचारिक रूप से परिचय कराया गया और उनकी जिम्मेदारियों के बारे में मार्गदर्शन दिया गया।”
डॉ. पटेल ने पार्टी की अपेक्षाओं को रेखांकित करते हुए कहा, “हमारा फोकस बिल्कुल साफ है—संगठन को कैसे मजबूत किया जाए और गुजरात सरकार के विकास कार्यों को जनता तक कैसे पहुंचाया जाए। हर पदाधिकारी को समझना होगा कि इस मिशन में उनकी क्या भूमिका है। नए दायित्व सिर्फ एक उद्देश्य से दिए गए हैं—सरकार का सहयोग करना और यह सुनिश्चित करना कि पार्टी हर कार्यक्रम के लिए तैयार रहे। पुराने और नए पदाधिकारी समन्वय में काम करेंगे। यह टीमवर्क के बारे में है, केवल पदों के बारे में नहीं।”
सीआर पाटिल खेमे को झटका?
हालांकि, इस नई कार्यकारिणी के सामने आते ही गुटबाजी के आरोप एक बार फिर सतह पर आ गए हैं। पूर्व प्रदेश अध्यक्ष सीआर पाटिल के बेहद करीबी माने जाने वाले कई नेता इस सूची से नदारद हैं, जिससे यह अटकलें तेज हो गई हैं कि उन्हें जानबूझकर दरकिनार किया गया है। इसके विपरीत, पाटिल विरोधी खेमे के माने जाने वाले नेताओं का कद बढ़ा है, जो पार्टी के आंतरिक शक्ति संतुलन में एक जानबूझकर किए गए बदलाव का संकेत देता है।
क्षेत्रीय असंतुलन और भौगोलिक पक्षपात के आरोप
नई प्रदेश कार्यकारिणी में क्षेत्रीय असंतुलन को लेकर भी आलोचना के स्वर उठ रहे हैं। दक्षिण गुजरात, जो लंबे समय से पार्टी का मजबूत गढ़ रहा है, वहां से किसी भी नेता को महामंत्री नहीं बनाया गया है। वहीं दूसरी ओर, सौराष्ट्र से तीन नेताओं को यह अहम पद मिला है, जिससे भौगोलिक पक्षपात के आरोप लग रहे हैं।
स्थानीय स्तर पर भी असंतोष के स्वर
इस घोषणा ने स्थानीय स्तर पर भी असंतोष पैदा कर दिया है। सुरेंद्रनगर जिले के एक नेता को प्रदेश महामंत्री के पद पर पदोन्नत करने के फैसले ने सबका ध्यान खींचा है, क्योंकि उन्हें पहले अपने ही गृह जिले में पार्टी कार्यकर्ताओं के विरोध का सामना करना पड़ा था। इस फैसले ने पार्टी कैडर को चौंका दिया है और यह चिंता बढ़ा दी है कि जमीनी स्तर के फीडबैक की अनदेखी की गई है।
इसी तरह, खेड़ा से अजय ब्रह्मभट्ट की महामंत्री के रूप में नियुक्ति ने पार्टी के भीतर कानाफूसी शुरू कर दी है। वडोदरा और उत्तर गुजरात के नेताओं को लग रहा है कि उन्हें साइडलाइन कर दिया गया है।
पुराने विवादों की याद और वापसी
इस फेरबदल ने पुराने आंतरिक विवादों की यादें भी ताजा कर दी हैं। जिन नेताओं ने सार्वजनिक रूप से सीआर पाटिल की कार्यशैली से मतभेद जताया था या जिनके नाम ‘पत्रिका कांड’ जैसे विवादों में आए थे, उन्हें अब नई संरचना में जगह मिली है।
पूर्व मंत्री गणपत वसावा, जिन्हें व्यापक रूप से पाटिल का विरोधी माना जाता था, उन्हें अनुसूचित जनजाति (ST) मोर्चा का प्रदेश अध्यक्ष नियुक्त किया गया है। वहीं, झंखनाबेन पटेल, जिनका विधानसभा टिकट पहले काट दिया गया था, उन्हें प्रदेश समिति में उपाध्यक्ष पद से पुरस्कृत किया गया है।
‘एक व्यक्ति, एक पद’ के नियम पर सवाल
नई कार्यकारिणी ने भाजपा के घोषित सिद्धांत “एक व्यक्ति, एक पद” पर भी बहस छेड़ दी है। पार्टी के आलोचकों का कहना है कि कई ऐसे नेताओं को राज्य कार्यकारिणी में फिर से शामिल किया गया है जो पहले से ही संगठन या सरकार में जिम्मेदारियां संभाल रहे हैं। इसने पार्टी हलकों में नियम लागू करने में निरंतरता और विस्तारित समिति के गठन में आंतरिक अनुशासन को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं।
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