अहमदाबाद/गांधीनगर: गुजरात, जिसने मई 2025 में 1 करोड़ पंजीकृत निवेशकों (Registered Investors) के आंकड़े को पार कर देश का तीसरा सबसे बड़ा राज्य होने का गौरव हासिल किया था, अब साइबर अपराधियों के लिए एक बड़ा ‘सॉफ्ट टारगेट’ बनकर उभरा है। महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश के बाद, गुजरात देश का ऐसा तीसरा राज्य है जहाँ निवेशकों की संख्या 1 करोड़ से अधिक है।
लेकिन इस बड़ी उपलब्धि के साथ ही राज्य में निवेश के नाम पर होने वाली ऑनलाइन धोखाधड़ी में भी चिंताजनक उछाल आया है।
ताजा आंकड़ों के मुताबिक, इस साल के पहले 11 महीनों में राष्ट्रीय साइबर क्राइम हेल्पलाइन के माध्यम से गुजरात में निवेश धोखाधड़ी के 13,122 मामले दर्ज किए गए। इन मामलों में राज्य के नागरिकों को कुल 564.77 करोड़ रुपये का चूना लगाया गया है।
निवेश के नाम पर सबसे बड़ी लूट
आंकड़े बताते हैं कि गुजरात में ठगों के लिए निवेशकों का विशाल आधार एक अवसर बन गया है। राज्य में कुल 37 श्रेणियों में ऑनलाइन धोखाधड़ी दर्ज की गई, लेकिन इसमें ‘इन्वेस्टमेंट फ्रॉड’ यानी निवेश के नाम पर ठगी सबसे प्रमुख कारण बनकर उभरी है।
साइबर अपराध की शिकायतों से जुटाए गए डेटा के अनुसार, आलोच्य अवधि के दौरान राज्य में कुल 1.61 लाख शिकायतें दर्ज हुईं, जिनमें नागरिकों को कुल 1,334.06 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ। हैरानी की बात यह है कि इस कुल नुकसान में से लगभग 42% हिस्सा अकेले निवेश धोखाधड़ी का है।
एक साइबर क्राइम अधिकारी ने स्थिति को स्पष्ट करते हुए कहा, “गुजरात में टारगेट ऑडियंस (लक्षित वर्ग) बहुत बड़ा है। भले ही इस तरह की ठगी का शिकार होने वालों की संख्या कम हो सकती है, लेकिन जाल में फंसने वाले लोग यह महसूस करने से पहले ही कई लाख रुपये गंवा चुके होते हैं कि उन्हें ठगा गया है।”
पढ़े-लिखे और रसूखदार लोग बन रहे शिकार
अधिकारी ने बताया कि इस प्रकार की धोखाधड़ी के पीड़ितों में केवल आम लोग ही नहीं, बल्कि बड़े व्यवसायी, कॉर्पोरेट अधिकारी, डॉक्टर और अन्य शिक्षित वर्ग के लोग भी शामिल हैं।
हाल ही का एक उदाहरण साझा करते हुए अधिकारी ने बताया, “साइबर क्राइम विभाग ने हाल ही में उत्तर भारत की एक महिला से पूछताछ की। उनके खाते में लगभग 2 लाख रुपये थे, जो गांधीनगर के एक व्यक्ति द्वारा ट्रांसफर किए गए थे। वह महिला एक लोकप्रिय ऑनलाइन ट्रेडिंग प्लेटफॉर्म पर ट्रेडिंग करती हैं।”
जांच में पता चला कि उन्हें एक ऐसे ग्रुप में जोड़ा गया था, जिसका नाम असली प्लेटफॉर्म से मिलता-जुलता था। 4 लाख रुपये निवेश करने के बाद, यूके (UK) में रहने वाली उनकी बेटी ने उन्हें आगाह किया कि यह एक स्कैम हो सकता है। जब उन्होंने पैसे निकालने की कोशिश की, तो उन्हें केवल 2 लाख रुपये ही निकालने की अनुमति मिली।
‘डिजिटल अरेस्ट’ में सबसे ज्यादा औसतन नुकसान
1.61 लाख शिकायतों के प्रति-केस विश्लेषण (Per-case analysis) से पता चलता है कि गुजरात के नागरिकों को प्रति शिकायत औसतन 82,884 रुपये का नुकसान हुआ है। हालांकि, अलग-अलग प्रकार की ठगी में यह औसत तेजी से बदलता है, जिससे पता चलता है कि कुछ स्कैम केवल संख्या बढ़ाने के लिए हैं, जबकि कुछ का मकसद बड़ी रकम ऐंठना है।
इसमें प्रति केस सबसे अधिक नुकसान दर्ज किया गया। इसमें पीड़ित ने औसतन 15.46 लाख रुपये प्रति केस गंवाए। इन मामलों में ठग पुलिस या जांच एजेंसियों के अधिकारी बनकर कॉल करते हैं और गिरफ्तारी का डर दिखाकर तुरंत पैसे ट्रांसफर करने का दबाव बनाते हैं।
प्रति केस नुकसान में यह दूसरे स्थान पर है, जहाँ औसतन 4.34 लाख रुपये प्रति केस की ठगी हुई।
तीसरे स्थान पर वीजा धोखाधड़ी रही, जिसमें 318 मामलों में औसतन 3.34 लाख रुपये का नुकसान हुआ। जांचकर्ताओं के अनुसार, विदेश में बसने की चाहत रखने वाले गुजरातियों को फर्जी जॉब ऑफर और फर्जी दस्तावेजों के जरिए फंसाया जाता है और ‘प्रोसेसिंग फीस’ के नाम पर पैसे वसूले जाते हैं।
टास्क और इंश्योरेंस फ्रॉड का बढ़ता जाल
बीमा (Insurance) और टास्क फ्रॉड (Task Fraud) भी उन श्रेणियों में शामिल हैं जहाँ पीड़ितों को बड़ा नुकसान उठाना पड़ा। इनमें औसतन क्रमशः 1.83 लाख रुपये और 1.58 लाख रुपये का नुकसान हुआ। टास्क फ्रॉड में शुरुआत में छोटे टास्क पूरा करने पर पैसे दिए जाते हैं, लेकिन बाद में बड़े “रिचार्ज” या “अनब्लॉक” पेमेंट के नाम पर बड़ी रकम ठग ली जाती है, जो कभी वापस नहीं मिलती।
इसके विपरीत, कुरियर फ्रॉड के मामले सबसे कम रहे, जिसमें केवल 14 घटनाएं दर्ज हुईं। इनमें पार्सल प्राप्त करने या पता कन्फर्म करने के नाम पर लिंक भेजे गए, जिससे अन्य श्रेणियों की तुलना में कम राशि की चोरी हुई।
RTO चालान: ठगी का नया तरीका
अधिकारियों ने आरटीओ चालान फ्रॉड (RTO Challan Fraud) के बारे में भी चेतावनी दी है। इसमें पीड़ितों को फर्जी ट्रैफिक चालान भरने के लिए कहा जाता है। इसके 794 मामले दर्ज हुए हैं, जिनमें 5.69 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है।
डिजिटलीकरण बढ़ने और ड्राइविंग लाइसेंस व वाहन पंजीकरण के लिए मोबाइल नंबर अनिवार्य होने से ठगों के लिए लोगों तक पहुंचना आसान हो गया है, जिससे यह स्कैम तेजी से फैल रहा है।
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