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साबरमती आश्रम: विनोबा-मीरा कुटीर की खुदाई में मिले इतिहास के दबे हुए निशान, जल्द अपने पुराने स्वरूप में लौटेगी ऐतिहासिक कुटिया

| Updated: December 31, 2025 14:45

गांधी आश्रम के 1,200 करोड़ रुपये के पुनर्विकास प्रोजेक्ट के दौरान एक 'सरप्राइज डिस्कवरी' हुई है। जानिए, विनोबा भावे और मीरा बेन की ऐतिहासिक कुटिया के नीचे क्या मिला, जो सालों से मिट्टी में दफन था।

अहमदाबाद: साबरमती के तट पर स्थित ऐतिहासिक गांधी आश्रम इन दिनों बड़े बदलावों का गवाह बन रहा है। 1,200 करोड़ रुपये की लागत से चल रही आश्रम पुनर्विकास परियोजना के तहत, साबरमती आश्रम संरक्षण और स्मारक ट्रस्ट (SAPMT) ने महात्मा गांधी के निवास सहित आश्रम के प्रमुख भवनों के जीर्णोद्धार (Restoration) का जिम्मा उठाया है। इसी कड़ी में विनोबा-मीरा कुटीर के संरक्षण कार्य के दौरान जमीन के नीचे दबे एक पुराने ढांचे की खोज ने विशेषज्ञों को भी चौंका दिया है।

खुदाई में मिलीं दबी हुई सीढ़ियां और प्लिंथ

आश्रम के पांच एकड़ के मुख्य क्षेत्र में स्थित ‘विनोबा-मीरा कुटीर’ वह ऐतिहासिक जगह है, जहाँ अलग-अलग समय पर समाज सुधारक आचार्य विनोबा भावे और ब्रिटिश मूल की विदुषी मेडलीन स्लेड (मीरा बेन) ने निवास किया था। अब तक यह कुटिया जमीन की सतह के बराबर लगती थी, लेकिन जीर्णोद्धार के लिए की गई खुदाई ने इसकी असली संरचना को सामने ला दिया है।

SAPMT के ट्रस्टी कार्तिकेय साराभाई ने इसे एक “आश्चर्यजनक खोज” बताया। उन्होंने कहा कि इस इमारत की पहली बार इतनी बड़ी मरम्मत की जा रही है, और इसी दौरान पता चला कि कुटिया वास्तव में डेढ़ फीट ऊंचे चबूतरे (प्लिंथ) पर बनी थी, जो समय के साथ मिट्टी में दब गया था।

मीडिया से बात करते हुए साराभाई ने कहा, “मैं वर्षों से आश्रम को जानता हूँ, लेकिन मुझे भी इसका अंदाजा नहीं था। खुदाई करने पर हमें कुटिया के प्लिंथ के नीचे दो सीढ़ियां मिलीं। हम यह देखकर हैरान थे कि आज के समय में जमीन का स्तर और कुटिया का अंदरूनी फर्श एक ही स्तर पर आ गया था, जबकि मूल रूप से ऐसा नहीं था। अब हम इसे इसके मूल स्वरूप में बहाल कर रहे हैं, ठीक वैसे ही जैसे ‘हृदय कुंज’ में ऊपर जाने के लिए सीढ़ियां हैं।”

क्यों दब गई थीं सीढ़ियां?

अधिकारियों का मानना है कि वर्षों पहले जब आश्रम में लाइट एंड साउंड शो शुरू किया गया था, तो जमीन के समतलीकरण (Leveling) के दौरान ये सीढ़ियां मिट्टी में दब गई होंगी। आश्रम नदी के किनारे स्थित है और इसका ढलान स्वाभाविक रूप से नदी की ओर है, जिससे मिट्टी का जमाव भी एक कारण हो सकता है।

उल्लेखनीय है कि 2022 में ब्रिटेन के तत्कालीन प्रधान मंत्री बोरिस जॉनसन ने भी इस कुटिया का दौरा किया था, जहां उन्हें मीरा बेन की आत्मकथा ‘द स्पिरिट्स पिलग्रिमेज’ भेंट की गई थी।

संरक्षण का वैज्ञानिक तरीका और 15 दिन का लक्ष्य

अहमदाबाद के प्रसिद्ध संरक्षण वास्तुकार प्रो. रवींद्र वासवदा की देखरेख में चल रहे इस प्रोजेक्ट में कुटिया को भविष्य के खतरों से बचाने के लिए विशेष इंतजाम किए जा रहे हैं। SAPMT के सचिव और निदेशक अतुल पंड्या ने बताया कि यह संरचना ईंट और मिट्टी से बनी थी। जमीन के प्राकृतिक ढलान के कारण बारिश का पानी कुटिया के किनारों से होकर साबरमती नदी की ओर जाता था, जिससे इमारत कमजोर हो रही थी।

पंड्या ने कहा, “वास्तुकारों के सुझाव पर अब यहां एक विशेष पाइपलाइन डाली जा रही है ताकि बारिश का पानी सीधे नदी में जाए और कुटिया की नींव को नुकसान न पहुंचे। लकड़ी के बीम, छत और खपरैल (टाइल्स) की मरम्मत की जा रही है और उन पर विशेष रसायनों (Chemicals) का लेप लगाया जा रहा है ताकि उनकी मजबूती और जल-प्रतिरोधक क्षमता बढ़ सके।”

उन्होंने जानकारी दी कि करीब दो महीने पहले शुरू हुआ यह काम अगले 15 दिनों में पूरा होने की उम्मीद है।

‘अपरिग्रह’ का जीवंत उदाहरण

अहमदाबाद के वास्तुकार और प्रोफेसर नीलकंठ छाया अपनी किताब ‘गांधीज प्लेसेज – एन आर्किटेक्चरल डॉक्यूमेंटेशन’ में विनोबा-मीरा कुटीर को गांधीवादी जीवन शैली के मूल सिद्धांत ‘अपरिग्रह’ (संचय न करना) का प्रतीक बताते हैं। उन्होंने लिखा है कि यह छत वाली जगह एक तरफ से पूरी तरह खुली है, जिसमें न तो दरवाजे हैं और न ही खिड़कियां। इसे ताला नहीं लगाया जा सकता। यह केवल बारिश और तेज धूप से शरीर को बचाने के लिए है, उससे ज्यादा कुछ नहीं।

इतिहास के आईने में: विनोबा और मीरा का प्रवास

इस कुटिया का ऐतिहासिक महत्व गहरा है। अतुल पंड्या ने बताया कि यह कुटिया ‘हृदय कुंज’ से भी पहले बनी थी।

  • विनोबा भावे: सत्य के प्रति अपनी निष्ठा के लिए गांधीजी के आदर्श सत्याग्रही माने जाने वाले विनोबा भावे 1918 से 1921 तक यहां रहे। बाद में उन्होंने ऐतिहासिक भूदान आंदोलन का नेतृत्व किया।
  • मीरा बेन: एक ब्रिटिश एडमिरल की बेटी मेडलीन स्लेड, जो रोम्या रोलां की किताब से गांधीजी की विचारधारा से प्रभावित हुई थीं, 1925 से 1933 के बीच यहां रहीं। गांधीजी ने उन्हें ‘मीरा’ नाम दिया था।

पंड्या के अनुसार, 1930 में आश्रम छोड़ने के बाद गांधीजी यहां रहने के लिए कभी नहीं लौटे, लेकिन 1932 या 1933 के आसपास वे मीरा बेन से मिलने एक आगंतुक के रूप में आए थे। 1933 से 1950 के बीच यहां कौन रहा, इसका कोई लिखित रिकॉर्ड नहीं है, हालांकि गुजरात के प्रसिद्ध आध्यात्मिक संत रंग अवधूत महाराज ने कुछ समय यहां रहकर अपनी साधना शुरू की थी।

भविष्य की योजनाएं

कार्तिकेय साराभाई ने बताया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पहल पर गुजरात सरकार और केंद्र सरकार संयुक्त रूप से इस भव्य प्रोजेक्ट को लागू कर रहे हैं। 55 एकड़ में फैले इस प्रोजेक्ट में 36 ऐतिहासिक इमारतों का संरक्षण और जीर्णोद्धार शामिल है।

विनोबा-मीरा कुटीर का काम पूरा होने के बाद, ट्रस्ट महात्मा गांधी और कस्तूरबा के निवास स्थान ‘हृदय कुंज’ का जीर्णोद्धार शुरू करेगा। इससे पहले, ‘नंदिनी’ गेस्ट हाउस का काम पूरा कर लिया गया है, जहां रवींद्रनाथ टैगोर, जवाहरलाल नेहरू और मौलाना आजाद जैसी दिग्गज हस्तियां कभी मेहमान बनकर ठहरी थीं।

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