जूनागढ़/अहमदाबाद: गुजरात के गिर वन क्षेत्र से एक बेहद ही दुखद और चौंकाने वाला मामला सामने आया है, जहाँ शिकारी को काबू करने गया रक्षक खुद ही एक दुर्भाग्यपूर्ण हादसे का शिकार हो गया। विसावदर तालुका में एक शेरनी को रेस्क्यू करने के दौरान फॉरेस्ट ट्रैकर अशरफ चौहान की ट्रैंक्विलाइजर डार्ट (बेहोश करने वाला इंजेक्शन) लगने से मौत हो गई। यह डार्ट असल में शेरनी के लिए चलाया गया था, लेकिन गलती से अशरफ को जा लगा।
सोमवार को जूनागढ़ सिविल अस्पताल में इलाज के दौरान अशरफ ने दम तोड़ दिया। वन विभाग के इतिहास में यह अपनी तरह की पहली घटना है, जब किसी वन्यजीव को बेहोश करने वाले डार्ट से किसी वन कर्मी की जान गई हो।
क्या था पूरा मामला?
यह घटना रविवार शाम की है। वन विभाग की टीम उस शेरनी को पकड़ने की कोशिश कर रही थी, जिसने उसी सुबह नानी मोनपरी गांव में एक चार साल के बच्चे पर हमला किया था। टीम एक खेत में थी जहाँ अरहर (Tuvar) की फसल करीब पांच फीट ऊंची थी।
घने खेतों के बीच शेरनी को निशाना बनाने के लिए पशु चिकित्सक (वेटनरी डॉक्टर) वी.ए. चौहान को जमीन पर पेट के बल लेटना पड़ा। जैसे ही उन्होंने डार्ट फायर किया, निशाना चूक गया और सामने बैठे ट्रैकर अशरफ चौहान को जा लगा।
शेर की खुराक इंसान पर पड़ी भारी
सूत्रों के मुताबिक, डार्ट में मुख्य रूप से केटामाइन (Ketamine) का इस्तेमाल किया गया था, जो नर्वस सिस्टम को सुस्त कर देता है। वयस्कों शेरों के लिए इस्तेमाल होने वाली यह ‘फुल डोज’ एक इंसान के लिए निर्धारित मात्रा से तीन गुना ज्यादा थी।
वन विभाग के एक सूत्र ने बताया, “शेरनी के लिए तैयार किया गया यह डोज 70 किलो तक के वजन वाले जानवर को बेहोश करने के लिए था। इंसान का शरीर इतनी भारी मात्रा को झेल नहीं पाया। रात में अशरफ को दो बार सीपीआर (CPR) दिया गया, लेकिन सुबह जब उनका दिल जवाब देने लगा, तो तमाम कोशिशों और दोबारा सीपीआर देने के बावजूद उन्हें बचाया नहीं जा सका।”
चिंताजनक बात यह भी सामने आई कि मौके पर या अस्पताल में मौजूद डॉक्टरों के पास ऐसे मामलों से निपटने का कोई प्रोटोकॉल नहीं था और न ही इसका एंटीडोट (काट) उपलब्ध था।
अधिकारियों ने क्या कहा?
जूनागढ़ के वन संरक्षक (वन्यजीव) राम रतन नाला ने घटना पर गहरा दुख व्यक्त करते हुए कहा कि हम सभी इस हादसे से स्तब्ध हैं। घटना की जांच गिर (पश्चिम) के डिप्टी वन संरक्षक को सौंपी गई है।
वहीं, प्रधान मुख्य वन संरक्षक जयपाल सिंह ने बताया कि यह एक अनजाने में हुआ हादसा था, इसमें किसी की बुरी मंशा नहीं थी। उन्होंने बताया कि अशरफ उस वक्त डॉक्टर के ठीक सामने ‘कोन ऑफ फायर’ (निशाने की दिशा) में बैठे थे।
मुआवजे और मदद का ऐलान
विभाग ने पीड़ित परिवार के लिए आर्थिक सहायता की घोषणा की है। जयपाल सिंह के अनुसार, 10 लाख रुपये आकस्मिक मृत्यु कवरेज के तहत, 5 लाख रुपये राहत कोष से और 2 लाख रुपये सरकारी फंड से दिए जाएंगे।
लापरवाही या हादसा? उठे सवाल
भारतीय वन्यजीव संस्थान (WII) के एक वरिष्ठ अधिकारी ने इस घटना पर हैरानी जताई है। उन्होंने कहा, “बाघों के रेस्क्यू में भी आज तक ऐसा नहीं हुआ। सवाल यह है कि जब डार्ट चलाया जा रहा था, तो अशरफ ठीक सामने क्यों बैठे थे? आमतौर पर टीम एक साथ रहती है। यह भी संभावना होती है कि जानवर बेहोश होने से पहले हमला कर दे, ऐसे में सुरक्षा मानकों का पालन क्यों नहीं किया गया?”
जानकारों का कहना है कि फायर करते समय बंदूक का सेफ्टी लॉक चेक करना जरूरी होता है, हो सकता है कि सेफ्टी लॉक न लगा हो या कोई तकनीकी खराबी आ गई हो।
परिवार पर टूटा दुखों का पहाड़
अशरफ अपने पीछे पत्नी और एक चार साल की बेटी को छोड़ गए हैं। विडंबना यह है कि उनके पिता अली अल्लाह रक्खा चौहान भी वन विभाग में ट्रैकर के पद पर कार्यरत थे। जिस शेरनी को पकड़ने के लिए यह अभियान चलाया गया था, उसने भी एक चार साल के बच्चे को ही अपना शिकार बनाया था।
फिलहाल, पुलिस और वन विभाग दोनों इस मामले की गहनता से जांच कर रहे हैं कि आखिर इतनी बड़ी चूक कैसे हुई।
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