अहमदाबाद: गुजरात उच्च न्यायालय ने राज्य मानवाधिकार आयोग (HRC) की शक्तियों और अधिकार क्षेत्र को लेकर एक बेहद अहम फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट शब्दों में लकीर खींचते हुए कहा है कि निजी संपत्ति से जुड़े विवादों को ‘मानवाधिकार उल्लंघन’ का मामला नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने आयोग को सख्त हिदायत दी है कि वह ‘जल्दबाजी’ में काम न करे और केवल “पुख्ता सबूतों” के आधार पर ही किसी मामले में दखल दे, न कि “कच्ची जानकारी” पर।
क्या है पूरा मामला?
यह फैसला जस्टिस एनआर मेहता की पीठ ने 40 पन्नों के अपने विस्तृत निर्णय में दिया। मामला एक परिवार के बीच संपत्ति विवाद से जुड़ा था। महेंद्र पटेल, राकेश पटेल और भरत पटेल ने शारदा नारन पटेल के खिलाफ याचिका दायर की थी।
तथ्यों के अनुसार, शारदा पटेल ने साल 2015 में एक रजिस्टर्ड सेल डीड के जरिए विवादित जमीन में अपना एक-चौथाई हिस्सा और अधिकार याचिकाकर्ताओं के पक्ष में छोड़ दिया था।
हालांकि, 10 साल बाद, 2025 में उन्होंने इस मामले को फिर से उठाया। शारदा पटेल ने अप्रैल 2025 में गांधीनगर के प्रिंसिपल सीनियर सिविल जज के समक्ष एक नियमित दीवानी मुकदमा (Civil Suit) दायर किया, जिसमें उन्होंने 2015 की डीड को रद्द करने और संपत्ति में अपने हिस्से की मांग की।
हैरानी की बात यह रही कि दीवानी अदालत में मामला लंबित होने के बावजूद, शारदा पटेल ने उसी जमीन के लिए मानवाधिकार आयोग का दरवाजा खटखटाया और आरोप लगाया कि उनके मानवाधिकारों का उल्लंघन हो रहा है। आयोग ने भी इस पर तुरंत संज्ञान ले लिया।
हाईकोर्ट ने आयोग की कार्रवाई को बताया ‘अधिकारों का हनन’
गुजरात हाईकोर्ट ने मानवाधिकार आयोग द्वारा शुरू की गई कार्यवाही को रद्द कर दिया। कोर्ट ने कहा कि आयोग ने न केवल अपने अधिकार क्षेत्र (Jurisdiction) का उल्लंघन किया है, बल्कि उसने दीवानी अदालत (Civil Court) की शक्तियों को भी हथियाने की कोशिश की है।
जस्टिस मेहता ने अपने फैसले में टिप्पणी की, “आयोग विधायिका के उद्देश्यों को विफल करते हुए लापरवाही से जांच या कार्यवाही नहीं कर सकता। आयोग से उम्मीद की जाती है कि वह अपनी शक्तियों का प्रयोग सावधानी और समझदारी से करेगा। किसी भी कार्यवाही को शुरू करने से पहले, आयोग को कम से कम प्रथम दृष्टया यह राय बनानी चाहिए कि क्या वास्तव में मानवाधिकारों का उल्लंघन हुआ है।”
आयोग के लिए जारी किए गए नए दिशानिर्देश
अदालत ने मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993 के तहत आयोग की शक्तियों के दुरुपयोग को रोकने के लिए कड़े दिशा-निर्देश जारी किए हैं:
- प्राथमिक जांच जरूरी: स्वतः संज्ञान लेने से पहले आयोग को यह सुनिश्चित करना होगा कि आरोपों में मानवाधिकार उल्लंघन का कोई ठोस आधार है या नहीं।
- निजी विवादों से दूरी: कोर्ट ने साफ कहा कि आयोग को उन शिकायतों पर विचार नहीं करना चाहिए जो मुख्य रूप से निजी दीवानी विवाद हैं। इसमें मालिकाना हक, कब्जा, उत्तराधिकार, बंटवारा, रिलीज डीड या अनुबंध जैसे मामले शामिल हैं। ये सीधे तौर पर दीवानी अदालत के दायरे में आते हैं, जब तक कि इसमें राज्य की कार्रवाई से मानवाधिकार हनन न हो रहा हो।
- अदालती कार्यवाही में बाधा न बनें: आयोग को शिकायतकर्ता से यह घोषणा लेनी चाहिए कि क्या उसी मामले में किसी अन्य अदालत में केस चल रहा है। यदि हां, तो आयोग को सक्षम दीवानी अदालत की शक्तियों को हथियाने से बचना चाहिए।
- समन भेजने में सावधानी: समन, नोटिस या वारंट जारी करने से पहले आयोग को ‘उचित परिश्रम’ (Due Diligence) करना होगा और यह सुनिश्चित करना होगा कि विशुद्ध रूप से निजी मामलों में सरकारी अधिकारियों को अनावश्यक रूप से घसीटा न जाए।
संविधान और मानवाधिकार की परिभाषा
याचिकाकर्ताओं के वकीलों ने तर्क दिया कि एक निजी संपत्ति विवाद को सुलझाने के लिए आयोग द्वारा नोटिस जारी करना कानूनन गलत था। इस पर सहमति जताते हुए कोर्ट ने अधिनियम की धारा 2(d) का हवाला दिया। कोर्ट ने कहा कि ‘मानवाधिकार’ का अर्थ व्यक्ति के जीवन, स्वतंत्रता, समानता और गरिमा से है, जो संविधान द्वारा गारंटीकृत हैं।
अदालत ने स्पष्ट किया, “निजी संपत्ति के बारे में दो निजी व्यक्तियों के बीच के विवाद को संविधान द्वारा गारंटीकृत अधिकार नहीं कहा जा सकता। संपत्ति में हिस्सेदारी से जुड़ी शिकायत को किसी भी तरह से मानवाधिकारों का उल्लंघन नहीं माना जा सकता।”
कोर्ट ने माना कि शारदा पटेल द्वारा आयोग के समक्ष शुरू की गई कार्यवाही कानूनन सही नहीं थी और इसे निजी विवाद निपटाने के लिए “दुर्भावनापूर्ण इरादे” से दायर किया गया था। कोर्ट ने कहा कि आयोग ने “अनावश्यक जल्दबाजी” में काम किया और बिना जांच किए नोटिस जारी कर दिए, जिससे दीवानी मुकदमा बिना किसी न्यायिक फैसले के ही एक तरह से प्रभावित हो गया।
अंततः, हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ताओं के खिलाफ मानवाधिकार आयोग की कार्यवाही को रद्द कर दिया और आयोग को भविष्य में अधिक सतर्क रहने की नसीहत दी।
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