नई दिल्ली/वाशिंगटन: अमेरिका और भारत के बीच लंबे समय से अटके पड़े व्यापार समझौते (Trade Deal) की राह में अब ‘दाल’ एक नई और बड़ी बाधा बनकर उभर रही है। हालिया घटनाक्रम ने कूटनीतिक गलियारों में हलचल मचा दी है, जिससे संकेत मिल रहे हैं कि भारत ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की सख्त व्यापार नीतियों का जवाब बेहद खामोशी से दिया है।
दो प्रमुख अमेरिकी सीनेटरों ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को पत्र लिखकर भारत द्वारा अमेरिकी दालों पर लगाए गए 30% आयात शुल्क (Import Duty) पर कड़ी आपत्ति जताई है और इसे “अनुचित” करार दिया है।
दिलचस्प बात यह है कि भारत का यह कदम मीडिया की सुर्खियों से दूर रहा, जिसे अब ट्रंप द्वारा पिछले साल लगाए गए 50% दंडात्मक शुल्कों के जवाब में भारत की “मूक जवाबी कार्रवाई” (Silent Retaliation) के रूप में देखा जा रहा है।
कब और कैसे लगा टैक्स?
अमेरिकी सीनेटर केविन क्रेमर (नॉर्थ डकोटा) और स्टीव डेन्स (मोंटाना) ने 16 जनवरी को लिखे अपने पत्र में इस बात पर झंडा बुलंद किया है। उन्होंने बताया कि भारत ने पिछले साल 30 अक्टूबर को अमेरिकी पीली मटर (Yellow Peas) पर 30% टैरिफ लगाने की घोषणा की थी, जो 1 नवंबर से प्रभावी भी हो गया।
सरकार द्वारा इस फैसले का कोई खास प्रचार-प्रसार नहीं किया गया, जो भारत-अमेरिका संबंधों में चल रही खींचतान के बीच भारत के नपे-तुले और सतर्क दृष्टिकोण को दर्शाता है।
भू-राजनीतिक विशेषज्ञ और लेखक नवरूप सिंह ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर इस स्थिति का विश्लेषण करते हुए लिखा, “इसका मतलब है कि भारत ने अमेरिकी टैरिफ का जवाब आयातित दालों पर शुल्क को 30% तक बढ़ाकर दिया, जो अक्टूबर 2025 में लागू हुआ।” एक अन्य यूजर ने भी टिप्पणी की, “हमने खामोशी से पलटवार किया है।”
अमेरिकी किसानों पर मार
सीनेटरों ने ट्रंप से आग्रह किया है कि वे भारत के साथ किसी भी व्यापार समझौते से पहले अमेरिकी दालों और मसूर के लिए बेहतर बाजार पहुंच सुनिश्चित करें। पत्र में कहा गया है, “भारत के इस अनुचित टैरिफ के कारण, अमेरिकी दलहन उत्पादकों को अपनी उच्च गुणवत्ता वाली फसल भारत निर्यात करते समय भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है।”
यह मुद्दा अमेरिका के कृषि प्रधान राज्यों जैसे नॉर्थ डकोटा और मोंटाना के लिए बेहद संवेदनशील है, जो अमेरिका में मटर और दालों के शीर्ष उत्पादक हैं। वहीं, भारत दुनिया का सबसे बड़ा दाल उपभोक्ता है, जो वैश्विक खपत का लगभग 27% हिस्सा अकेले उपभोग करता है।
सीनेटरों ने कहा, “भारत में मसूर, चना, सूखी फलियां और मटर सबसे ज्यादा खाए जाते हैं, फिर भी उन्होंने अमेरिकी फसलों पर भारी शुल्क लगा रखा है।”
2020 का इतिहास और ‘नमस्ते ट्रंप’
इन सीनेटरों ने याद दिलाया कि उन्होंने ट्रंप के पहले कार्यकाल के दौरान भी यह मुद्दा उठाया था। उस समय, 2020 की व्यापार वार्ता के दौरान ट्रंप ने खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को यह पत्र सौंपा था। उस समय ट्रंप ने भारत का दौरा किया था और अहमदाबाद में ‘नमस्ते ट्रंप’ कार्यक्रम में हिस्सा लिया था, जिसे दोनों नेताओं की दोस्ती के प्रदर्शन के तौर पर देखा गया था।
सीनेटरों ने अपने 2020 के पत्र में भी जून 2019 में भारत को ‘जनरलाइज्ड सिस्टम ऑफ प्रेफरेंस’ (GSP) से हटाए जाने के बाद अमेरिकी फसलों पर लगाए गए भारतीय शुल्कों को अनुचित बताया था।
भारत की ‘लक्ष्मण रेखा’ (Red Lines)
मौजूदा हालात यह दर्शाते हैं कि अमेरिका जहां अपने फायदे के लिए दबाव बना रहा है, वहीं भारत अपनी घरेलू प्राथमिकताओं से समझौता करने के मूड में नहीं है। व्यापार वार्ता में एक बड़ा पेंच यह है कि ट्रंप प्रशासन भारत के कृषि और डेयरी बाजारों में व्यापक पहुंच चाहता है। लेकिन नई दिल्ली के लिए यह एक ‘लक्ष्मण रेखा’ है।
विशेषज्ञों का मानना है कि भारतीय किसान सरकार के लिए सर्वोच्च प्राथमिकता हैं। यदि कोई भी व्यापार समझौता घरेलू उत्पादकों की कीमत पर भारत के दाल बाजार को खोलने की मांग करता है, तो ऐसा समझौता होना मुश्किल है।
ब्लूमबर्ग की एक रिपोर्ट के अनुसार, 2024 के लोकसभा चुनावों से पहले, भारत ने खाद्य मुद्रास्फीति को नियंत्रित करने के लिए दालों की कुछ किस्मों पर से आयात शुल्क हटा दिया था। लेकिन मौजूदा परिदृश्य को देखते हुए ऐसा लगता है कि ट्रंप प्रशासन इस बार बातचीत के मामले में थोड़ा पीछे रह गया है और भारत ने अपनी चाल बहुत ही रणनीतिक तरीके से चल दी है।
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