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अहमदाबाद: सुप्रीम कोर्ट की सख्ती के बीच आवारा कुत्तों की गिनती करेगा नगर निगम, 48 वार्डों में होगा महासर्वे

| Updated: January 24, 2026 13:39

शहर में 1.5 लाख कुत्तों का अनुमान और रेबीज वैक्सीन की बढ़ती मांग के बीच AMC ने कसी कमर; जानिए क्या है 'फ्री रोमिंग स्ट्रीट डॉग सर्वे' का पूरा प्लान और क्यों पड़ी इसकी जरूरत।

अहमदाबाद। आवारा कुत्तों की बढ़ती समस्या और सुप्रीम कोर्ट में चल रही सुनवाई के बीच, अहमदाबाद नगर निगम (AMC) ने शहर भर में श्वानों (कुत्तों) का व्यापक सर्वेक्षण कराने का अहम फैसला लिया है। नगर निगम अपने अधिकार क्षेत्र में आने वाले सभी 48 वार्डों में ‘फ्री रोमिंग स्ट्रीट डॉग सर्वे’ (आवारा कुत्तों का सर्वेक्षण) आयोजित करेगा, जिसके लिए एक विशेष एजेंसी की नियुक्ति की जाएगी।

यह निर्णय ऐसे समय में आया है जब नसबंदी के आंकड़ों में गिरावट और रेबीज (रेबीज) के टीकों की बढ़ती मांग देखी जा रही है। साथ ही, शहर के बाहरी इलाकों से डॉग बाइट (कुत्ते के काटने) के मामलों में बढ़ोतरी दर्ज की गई है।

क्या है वर्तमान स्थिति और पुराने आंकड़े?

शहर में आवारा कुत्तों की आखिरी बार रैंडम गणना वर्ष 2019 में की गई थी। उस समय शहर की सीमा के भीतर लगभग 2.1 लाख कुत्ते दर्ज किए गए थे। हालांकि, एएमसी के मौजूदा अनुमान के मुताबिक, अभी शहर में करीब 1.5 लाख आवारा कुत्ते हैं।

तकनीक का सहारा लेते हुए, निगम ने जनवरी 2025 से आवारा कुत्तों में ‘रेडियो फ्रीक्वेंसी आइडेंटिफिकेशन’ (RFID) चिप्स लगाना शुरू कर दिया है। इसके डेटा को रिकॉर्ड करने के लिए एक विशेष एप्लिकेशन भी विकसित किया गया है। निगम के आंकड़ों के अनुसार, अब तक 6,007 कुत्तों में ये चिप्स लगाए जा चुके हैं।

सर्वेक्षण की आवश्यकता क्यों पड़ी?

इस कवायद के पीछे का मुख्य कारण सुप्रीम कोर्ट के दिशानिर्देश हैं। एएमसी के मवेशी उपद्रव नियंत्रण विभाग (CNCD) के विभागाध्यक्ष नरेश राजपूत ने बताया, “सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुसार, शिक्षण संस्थानों और अस्पतालों जैसे सार्वजनिक स्थानों से आवारा कुत्तों को टीकाकरण और नसबंदी के बाद शेल्टर होम में शिफ्ट किया जाना है। इस प्रक्रिया के लिए हमें बुनियादी ढांचा (इन्फ्रास्ट्रक्चर) तैयार करना होगा। इंफ्रास्ट्रक्चर खड़ा करने से पहले हमें हर वार्ड में कुत्तों की मौजूदा आबादी का सटीक अनुमान होना बेहद जरूरी है।”

एजेंसी चयन और प्रक्रिया

इस सर्वेक्षण को अंजाम देने के लिए एजेंसी चुनने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है, जिसके लिए टेंडर जमा करने की अंतिम तारीख 13 फरवरी निर्धारित की गई है।

निगम के एक अधिकारी ने बताया कि इस काम के लिए पशु कल्याण के क्षेत्र में काम करने वाली प्रमुख गैर-लाभकारी संस्थाओं से संपर्क किया गया है। संस्थाओं की मदद के लिए शर्तों को लचीला रखा गया है, जैसे कि कोई सुरक्षा जमा राशि नहीं ली जाएगी और प्रोजेक्ट पूरा होने पर एकमुश्त भुगतान के बजाय किस्तों में भुगतान की सुविधा दी जाएगी।

नसबंदी अभियान का असर और नई चुनौतियां

वर्ष 2019 के सर्वे के बाद चलाए गए व्यापक नसबंदी अभियान के तहत अब तक लगभग 1.94 लाख कुत्तों की नसबंदी की जा चुकी है। नरेश राजपूत ने जानकारी दी कि जनसंख्या नियंत्रण के उपायों के चलते अब नसबंदी की संख्या 150-170 कुत्ते प्रति दिन से घटकर 30-35 रह गई है। अब विभाग का मुख्य फोकस सरदार पटेल रिंग रोड (SPRR) से सटे उन गांवों पर है, जिन्हें हाल ही में एएमसी सीमा में शामिल किया गया है।

अधिकारियों के अनुसार, सर्वे करने वाली एजेंसी के सामने एक बड़ी चुनौती उन कुत्तों की पहचान करना होगा जिनकी नसबंदी 2025 से पहले हो चुकी है और जिन्हें आरएफआईडी चिप लगाई गई है।

MoHUA पैनल ने जताई चिंता: कचरा प्रबंधन पर जोर

केंद्रीय आवास और शहरी मामलों के मंत्रालय (MoHUA) द्वारा गठित उच्च स्तरीय समिति (HLC) ने अपनी रिपोर्ट में आवारा कुत्तों के मुद्दे पर तत्काल ध्यान देने की बात कही है। रिपोर्ट में कहा गया है कि यह मुद्दा इंसानों और जानवरों दोनों की भलाई के लिए महत्वपूर्ण है।

रिपोर्ट के मुताबिक, देश भर में डॉग बाइट के मामले 2022 में 21.8 लाख से बढ़कर 2023 में 27.5 लाख हो गए हैं, जो समस्या की गंभीरता को दर्शाता है। रिपोर्ट में इस बात पर जोर दिया गया है कि आवारा कुत्तों की समस्या का मुख्य कारण उन्हें मिलने वाला भोजन है। जहां कुछ एनजीओ कुत्तों को खाना खिलाते हैं, वहीं अधिकांश कुत्ते कचरे पर निर्भर हैं।

समिति ने सुझाव दिया है कि शहरों को ठोस कचरा प्रबंधन (सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट) में सुधार करना चाहिए और ‘जीरो वेस्ट प्रोग्राम’ लागू करना चाहिए ताकि भोजन के स्रोत खत्म हो सकें।

इसके अलावा, बीमार या आक्रामक कुत्तों को सार्वजनिक स्थानों से हटाना नागरिकों की सुरक्षा के लिए आवश्यक बताया गया है। रिपोर्ट में दिल्ली और अहमदाबाद जैसे शहरों में पैदल चलने वालों (वॉकर्स) को सबसे अधिक असुरक्षित माना गया है।

टीकाकरण के बढ़ते आंकड़े और वैक्सीन की स्थिति

भले ही निगम सर्वे के लिए सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का हवाला दे रहा है, लेकिन अधिकारी डॉग बाइट के बढ़ते मामलों से इनकार नहीं कर रहे हैं।

नरेश राजपूत ने बताया, “तीन साल पहले एएमसी के 35 स्वास्थ्य केंद्रों पर महीने में 5,000-5,500 टीके लगते थे, जो अब बढ़कर 7,000-7,500 हो गए हैं। इसका कारण डॉग बाइट के मामलों में बढ़ोतरी और लोगों में बढ़ी जागरूकता दोनों हैं। इसमें से 20-25 प्रतिशत मामले एएमसी सीमा के बाहर के हैं।”

राहत की बात यह है कि 2025 में अहमदाबाद में रेबीज से मौत का कोई मामला सामने नहीं आया है। रेबीज से आखिरी मौत 2024 में रानिप इलाके में दर्ज की गई थी, जहां एक व्यक्ति मध्य प्रदेश में एक शादी के दौरान संक्रमित हुआ था और उसने टीका नहीं लगवाया था।

सूत्रों के मुताबिक, रेबीज वैक्सीन की कोई कमी नहीं है, लेकिन ‘रेबीज इम्युनोग्लोबुलिन’ की कमी है, जो गंभीर (श्रेणी-III) काटने या खरोंच के मामलों में जरूरी होता है।

सर्वे में किन बातों का रखा जाएगा हिसाब?

आगामी सर्वे में 480.88 वर्ग किमी के एएमसी क्षेत्र में निम्नलिखित विवरण जुटाए जाएंगे:

  • वार्ड-वार आवारा कुत्तों की कुल संख्या।
  • नर और मादा कुत्तों की अलग-अलग गिनती (नसबंदी किए गए और बिना नसबंदी वाले)।
  • गर्भवती, स्तनपान कराने वाली और बीमार मादा कुत्तों का डेटा।
  • ऐसे कुत्तों की पहचान जो कमजोर हैं, त्वचा संक्रमण से ग्रस्त हैं या जिन्हें गंभीर चोटें आई हैं (जो नसबंदी के योग्य नहीं हैं)।
  • प्रत्येक वार्ड में कुत्तों और इंसानों का अनुपात (Dog-Human Ratio) और कुत्तों का घनत्व।

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