अहमदाबाद: गुजरात हाईकोर्ट ने गुरुवार को एक अहम फैसला सुनाते हुए संत श्री आसाराम जी आश्रम ट्रस्ट को बड़ा झटका दिया है। कोर्ट ने ट्रस्ट द्वारा दायर उन दो याचिकाओं को खारिज कर दिया है, जिनमें राज्य सरकार के जमीन वापस लेने के फैसले को चुनौती दी गई थी।
यह मामला मोटेरा स्थित नरेंद्र मोदी स्टेडियम के पास मौजूद 45,000 वर्ग मीटर भूमि से जुड़ा है, जिस पर अभी आश्रम बना हुआ है। हाईकोर्ट के इस फैसले के बाद अब इस जमीन को सरदार पटेल स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स के निर्माण के लिए खाली करना होगा।
आसाराम और उनके बेटे का आपराधिक इतिहास
गौरतलब है कि आश्रम के संस्थापक आसाराम 2013 से जेल में बंद हैं। उन पर गांधीनगर और राजस्थान के जोधपुर में दुष्कर्म के मामले दर्ज हैं। हाल ही में हाईकोर्ट ने उन्हें अस्थायी जमानत दी थी। वहीं, उनके बेटे नारायण साईं भी दुष्कर्म के एक मामले में लाजपोर जेल में आजीवन कारावास की सजा काट रहे हैं।
वैश्विक खेल आयोजनों के लिए सरकार की तैयारी
अहमदाबाद शहर खुद को आगामी वैश्विक खेल आयोजनों के लिए तैयार कर रहा है। इसी कड़ी में राज्य सरकार पिछले एक साल से मोटेरा इलाके में सार्वजनिक सुविधाओं के विकास के लिए सरकारी जमीन को वापस अपने कब्जे में ले रही है।
राजस्व विभाग ने कई जमीन धारकों को बेदखली का नोटिस भेजा था, जिनमें आसाराम ट्रस्ट भी शामिल था। सरकार के इसी नोटिस और कार्रवाई के खिलाफ ट्रस्ट ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।
सरकार की दलील: धार्मिक उपयोग की आड़ में हुआ विस्तार
कोर्ट में सुनवाई के दौरान ट्रस्ट की दलीलों का विरोध करते हुए सरकारी वकील जी.एच. विर्क ने अपना पक्ष मजबूती से रखा। उन्होंने अदालत को बताया कि यह जमीन दशकों पहले केवल सीमित धार्मिक कार्यों के लिए आवंटित की गई थी। लेकिन ट्रस्ट के अधिकारियों ने आवंटित क्षेत्र से आगे बढ़कर आश्रम की सीमाओं का विस्तार कर लिया।
सरकारी वकील ने स्पष्ट किया कि जमीन आवंटन की शर्तों में साफ था कि वहां कोई व्यावसायिक गतिविधि नहीं होगी, बिना अनुमति कोई निर्माण नहीं होगा और सभी नियमों का कड़ाई से पालन किया जाएगा। लेकिन निरीक्षण के दौरान यह पाया गया कि वहां बड़े पैमाने पर निर्माण कार्य हुआ है और आवंटित सीमा से कहीं अधिक जमीन पर कब्जा किया गया है।
अवैध निर्माण को वैध बनाने की कोशिश ही गलती की स्वीकारोक्ति
सुनवाई के दौरान यह बात भी सामने आई कि ट्रस्ट ने खुद अनधिकृत ढांचों को नियमित (Regularize) करने की मांग की थी। राज्य सरकार ने तर्क दिया कि अवैध निर्माण को वैध करने की यह मांग ही इस बात का मौन सबूत है कि ट्रस्ट ने नियमों का उल्लंघन किया है।
सरकारी वकील ने जोर देकर कहा कि आश्रम को खाली कराने का फैसला कोई रातों-रात की गई कार्रवाई या प्रशासनिक जल्दबाजी नहीं थी, बल्कि यह एक “निष्पक्ष, धैर्यपूर्ण और पारदर्शी प्रक्रिया” का हिस्सा है। उन्होंने बताया कि आश्रम को कानून की जरूरत से ज्यादा बार नोटिस दिए गए और सुनवाई के कई मौके मिले। सरकार का कहना था कि धीरे-धीरे किए गए अतिक्रमण को बाद में कानूनी मान्यता देने की मांग नहीं की जा सकती।
एएमसी ने भी खारिज कर दी थी अर्जी
हाल ही में अहमदाबाद म्युनिसिपल कॉरपोरेशन (AMC) ने भी मोटेरा साइट पर 30 से अधिक अवैध ढांचों को नियमित करने के लिए ट्रस्ट द्वारा दिए गए आवेदनों को खारिज कर दिया था।
दो सप्ताह बाद जारी होगा नोटिस
लंबी सुनवाई के बाद जस्टिस वी.डी. नानावटी ने ट्रस्ट की याचिकाओं को खारिज कर दिया। कोर्ट ने राज्य सरकार के इस बयान को रिकॉर्ड पर लिया कि आदेश पारित होने के दो सप्ताह की अवधि के बाद राजस्व अधिकारी ‘लैंड रेवेन्यू कोड’ की धारा 202 के तहत नोटिस जारी करेंगे। यह धारा अधिकारियों को बेदखली की कार्रवाई लागू करने का अधिकार देती है।
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