अहमदाबाद: गुजरात में शैक्षणिक वर्ष 2019-20 के दौरान आयुर्वेद कॉलेजों में प्रवेश लेने वाले 150 से अधिक छात्रों के डिग्री और करियर पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात उच्च न्यायालय के उस फैसले पर अपनी मुहर लगा दी है, जिसमें इन छात्रों के प्रवेश को रद्द करने का आदेश दिया गया था। इसके साथ ही, शीर्ष अदालत ने इस पूरे मामले की गंभीरता को देखते हुए एक संयुक्त समिति के गठन और विस्तृत जांच के आदेश भी दिए हैं।
क्या है पूरा विवाद?
यह मामला राज्य के छह आयुर्वेद कॉलेजों से जुड़ा है। आरोप है कि इन संस्थानों ने उन छात्रों को भी प्रवेश दे दिया, जो नीट (NEET) के लिए निर्धारित न्यूनतम योग्यता (परसेंटाइल) को पूरा नहीं करते थे। नियमों के अनुसार, आयुर्वेद और होम्योपैथी पाठ्यक्रमों में दाखिले के लिए उम्मीदवारों को नीट में एक निश्चित न्यूनतम परसेंटाइल हासिल करना अनिवार्य होता है।
वर्ष 2019-20 के लिए, अनारक्षित वर्ग के छात्रों के लिए कम से कम 50वां परसेंटाइल प्राप्त करना आवश्यक था।
खाली सीटों को भरने के लिए नियमों की अनदेखी
रिपोर्ट्स के मुताबिक, इन छह कॉलेजों में सीटें खाली रह गई थीं। इन सीटों को भरने के लिए, कॉलेज प्रबंधन ने कथित तौर पर उन छात्रों को ‘सशर्त प्रवेश’ (Conditional Admission) दे दिया जो पात्रता मानदंडों पर खरे नहीं उतरते थे।
छात्रों को यह भरोसा दिलाया गया कि केंद्र सरकार आमतौर पर बाद में क्वालीफाइंग परसेंटाइल कम कर देती है, और जैसे ही ऐसा होगा, उनका प्रवेश नियमित कर दिया जाएगा। हालांकि, सरकार की ओर से परसेंटाइल में ऐसी कोई कटौती मंजूर नहीं की गई, जिसके बाद यह मामला कानूनी विवाद में बदल गया।
कानूनी लड़ाई और अदालतों का रुख
इस मामले की सुनवाई सबसे पहले गुजरात उच्च न्यायालय के एक एकल न्यायाधीश (Single Judge) ने की थी, जिन्होंने इन दाखिलों को वैध मानने से इनकार कर दिया। इसके बाद, मामला खंडपीठ (Division Bench) के पास गया। खंडपीठ ने भी एकल न्यायाधीश के फैसले को सही ठहराते हुए स्पष्ट किया कि न्यूनतम नीट परसेंटाइल की शर्त को पूरा करना अनिवार्य है।
अंततः, छात्रों और कॉलेजों ने राहत की उम्मीद में सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया, लेकिन शीर्ष अदालत ने भी उच्च न्यायालय के फैसले में हस्तक्षेप करने से साफ इनकार कर दिया।
सुप्रीम कोर्ट सख्त: जांच के आदेश जारी
सुप्रीम कोर्ट ने न केवल प्रवेश रद्द करने के फैसले को बरकरार रखा, बल्कि यह सवाल भी उठाया कि आखिर अयोग्य छात्रों को प्रवेश कैसे दिया गया? कोर्ट ने इस बात पर भी नाराजगी जताई कि छात्रों को उनके अध्ययन के दूसरे, तीसरे और चौथे वर्ष तक इस अनियमितता के बारे में अंधेरे में क्यों रखा गया।
अदालत ने इस मामले की तह तक जाने के लिए एक सख्त कदम उठाया है:
- संयुक्त जांच समिति: कोर्ट ने ‘गुजरात आयुर्वेद विश्वविद्यालय’ और ‘सेंट्रल काउंसिल ऑफ इंडियन मेडिसिन’ को निर्देश दिया है कि वे एक संयुक्त समिति का गठन करें और पूरे प्रकरण की जांच करें।
- नोटिस जारी: संबंधित सभी कॉलेजों को नोटिस जारी कर हलफनामा (Affidavit) दाखिल करने को कहा गया है।
इन कॉलेजों पर गि रही है गाज
इस विवाद में शामिल छह कॉलेजों के नाम निम्नलिखित हैं:
- अनन्या कॉलेज ऑफ आयुर्वेद (Ananya College of Ayurveda)
- भार्गव आयुर्वेद कॉलेज (Bhargav Ayurveda College)
- इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ आयुर्वेद (Indian Institute of Ayurveda)
- बीजी गरैया आयुर्वेद कॉलेज (BG Garaiya Ayurveda College)
- ग्लोबल इंस्टीट्यूट ऑफ आयुर्वेद (Global Institute of Ayurveda)
- जय जलाराम आयुर्वेद मेडिकल कॉलेज (Jay Jalaram Ayurveda Medical College)
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