राजू करपड़ा के इस्तीफे ने न केवल सियासी विवाद को जन्म दिया है, बल्कि गुजरात में आम आदमी पार्टी (AAP) के संगठन की मजबूती पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं।
गुजरात में आम आदमी पार्टी (AAP) से राजू करपड़ा के इस्तीफे ने राज्य में सिर्फ एक नया राजनीतिक विवाद ही नहीं छेड़ा है, बल्कि इसने पार्टी के संगठनात्मक ढांचे की नाजुक स्थिति और कुछ चुनिंदा चेहरों पर उसकी निर्भरता को लेकर भी बहस फिर से शुरू कर दी है।
भले ही AAP के नेताओं ने करपड़ा के आरोपों को खारिज करते हुए इसके पीछे भाजपा (BJP) के दबाव का संकेत दिया हो, लेकिन राजनीतिक जानकारों का मानना है कि करपड़ा के जाने से पार्टी की किसानों के बीच, खासकर सौराष्ट्र क्षेत्र में पकड़ कमजोर हो सकती है। यह घटनाक्रम ऐसे समय में हुआ है जब इस साल के अंत में गुजरात में नगर निगमों, तालुका और जिला पंचायतों के चुनाव होने वाले हैं।
इस्तीफे की वजह: ‘निजी कारण’ या पार्टी से नाराजगी?
AAP के किसान संगठन के प्रदेश अध्यक्ष के रूप में कार्य कर चुके राजू करपड़ा ने बुधवार को “निजी कारणों” का हवाला देते हुए पार्टी छोड़ दी। लेकिन, ठीक एक दिन बाद उन्होंने राजकोट में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस कर अपने “अचानक इस्तीफे” की असली वजह बताई।
उनकी मुख्य शिकायत यह थी कि जब बोटाद (Botad) में हड़दड़ (Hadadad) किसान आंदोलन के दौरान हिंसा के बाद उन्हें और कई अन्य किसानों को जेल भेजा गया, तो AAP नेतृत्व ने उन्हें समय पर कानूनी मदद नहीं मुहैया कराई।
क्या हुआ था बोटाद आंदोलन में?
यह आंदोलन बोटाद APMC सब-यार्ड में कपास खरीद में कथित धांधली के खिलाफ करपड़ा के नेतृत्व में शुरू हुआ था, जो बाद में हिंसक हो गया। पुलिस ने आंसू गैस के गोले छोड़े और लाठीचार्ज किया, जिसके बाद लगभग 65 लोगों को गिरफ्तार किया गया। करपड़ा और अन्य नेताओं ने 100 से अधिक दिन जेल में बिताए और 1 फरवरी को उन्हें जमानत मिली।
रिहाई के महज दस दिनों के भीतर, करपड़ा ने पार्टी के सभी पदों से इस्तीफा दे दिया, जिससे अंदरूनी कलह की अटकलें तेज हो गईं।
करपड़ा ने कहा कि वे 2022 में इस उम्मीद के साथ AAP में शामिल हुए थे कि राजनीतिक समर्थन से किसानों के आंदोलन को मजबूती मिलेगी। लेकिन जेल के अनुभव ने उनका मोहभंग कर दिया। उन्होंने दावा किया कि महत्वपूर्ण जमानत सुनवाई के दौरान पार्टी का कोई भी बड़ा वकील मौजूद नहीं था, जिसके कारण उन पर भरोसा करने वाले किसानों को बेवजह भुगतना पड़ा।
“मैं सालों तक जेल में रहने को तैयार था,” करपड़ा ने भावुक होते हुए कहा, “लेकिन यह दिल तोड़ने वाला था कि जिन आम किसानों ने कभी पुलिस थाने का मुंह तक नहीं देखा था, उन्हें अपनी दिवाली सलाखों के पीछे गुजारनी पड़ी।”
करपड़ा ने यह भी आरोप लगाया कि उनकी रिहाई में मदद करने के बजाय, पार्टी के ही कुछ लोगों ने उन्हें जेल में रहते हुए फेसबुक पोस्ट को लेकर दर्ज अतिरिक्त एफआईआर (FIR) के जरिए “फंसाने” की कोशिश की। उन्होंने अंत में कहा कि उनका भविष्य का काम अब “गैर-राजनीतिक” होगा और वे पूरी तरह से किसानों के अधिकारों पर ध्यान केंद्रित करेंगे।
AAP का पलटवार: ‘जेल के डर से लिखी गई पटकथा’
दूसरी ओर, AAP नेताओं ने इन आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया है। इसी मामले में जेल जा चुके प्रवीण राम ने तर्क दिया कि करपड़ा का इस्तीफा किसी वैचारिक मतभेद के कारण नहीं, बल्कि लंबित आपराधिक मामलों के डर से दिया गया है। राम के अनुसार, करपड़ा ने पहले भी अपने ऊपर चल रहे हत्या के प्रयास (attempt-to-murder) जैसे पुराने मामलों को लेकर चिंता जताई थी।
विसावदर (Visavadar) से विधायक गोपाल इटालिया ने और भी कड़ा रुख अपनाते हुए सुझाव दिया कि करपड़ा का गुस्सा “स्क्रिप्टेड” था और संभवतः भाजपा से प्रभावित था। इटालिया ने दावा किया कि करपड़ा से जुड़े हत्या के प्रयास के दो मामलों की सुनवाई 12 फरवरी को निर्धारित थी, और हो सकता है कि इसी राजनीतिक दबाव ने उनके इस्तीफे में भूमिका निभाई हो।
इटालिया ने कहा, “मुझे दुख है कि जो व्यक्ति कभी पूरे जोश के साथ बोलता था, वह आज एक स्क्रिप्ट से वजनहीन शब्द बोल रहा है।” उनका आरोप है कि करपड़ा ने खुद को दोबारा जेल जाने से बचाने के लिए किसान आंदोलन की बलि दे दी।
पार्टी के लिए क्यों अहम है यह झटका?
यह पूरा घटनाक्रम गुजरात में AAP के लिए एक बड़ी चुनौती को रेखांकित करता है: पार्टी की सीमित संगठनात्मक गहराई और नेतृत्व में बार-बार होने वाला बदलाव। 2022 के विधानसभा चुनावों के बाद से, कई AAP नेताओं और स्थानीय पदाधिकारियों ने आंतरिक असंतोष या राजनीतिक दबाव का हवाला देते हुए पार्टी छोड़ी है।
हालांकि AAP ने 2022 में पांच सीटें जीतकर अपनी उपस्थिति दर्ज कराई थी, लेकिन वह नेतृत्व की एक मजबूत दूसरी पंक्ति (second line of leadership) बनाने में संघर्ष करती दिख रही है।
पिछले दो वर्षों में ही, कई प्रमुख चेहरे—जिनमें स्थानीय विधायक, जिला-स्तरीय समन्वयक और शुरुआती अभियान के नेता शामिल हैं—पार्टी से अलग हो चुके हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का अनुमान है कि हाल के दिनों में आधा दर्जन से अधिक वरिष्ठ नेताओं और कई जमीनी पदाधिकारियों ने इस्तीफा दिया है, जो राज्य इकाई के भीतर जारी अस्थिरता को दर्शाता है।
ग्रामीण आधार पर असर
राजू करपड़ा का जाना इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि वे केवल एक पदाधिकारी नहीं थे—वे ग्रामीण सौराष्ट्र में पार्टी के सबसे प्रमुख किसान नेताओं में से एक थे। उनकी सक्रियता को ग्रामीण क्षेत्र में सरकार विरोधी लहर को AAP के पक्ष में करने की क्षमता के रूप में देखा जाता था, जिसकी पार्टी को अपने शहरी वोट बैंक से बाहर विस्तार करने के लिए सख्त जरूरत है।
खबरों के मुताबिक, 2022 के नतीजों का विश्लेषण करने के बाद उन्होंने कच्छ और सौराष्ट्र में किसानों पर केंद्रित रणनीतियां भी बनाई थीं।
करपड़ा के जाने से AAP ने पार्टी और ग्रामीण कृषक समुदायों के बीच एक महत्वपूर्ण सेतु (bridge) खो दिया है। भले ही पार्टी उनके इस्तीफे को भाजपा की साजिश बताकर अपना बचाव कर ले, लेकिन आंतरिक असंतोष और जमीनी नेताओं को समर्थन न मिलने की धारणा उसकी विश्वसनीयता को नुकसान पहुंचा सकती है।
अंततः, राजू करपड़ा का इस्तीफा सिर्फ एक नेता के जाने की बात नहीं है—यह इस बड़े सवाल को खड़ा करता है कि क्या AAP गुजरात में एक टिकाऊ राजनीतिक आधार बना पाएगी या फिर कुछ हाई-प्रोफाइल चेहरों पर ही निर्भर रहेगी। सौराष्ट्र के ग्रामीण इलाकों में अपनी जमीन तलाश रही पार्टी के लिए यह इस्तीफा एक गंभीर झटका साबित हो सकता है।
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