साल 2012 बैच के भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) अधिकारी कन्नन गोपीनाथन ने कश्मीर के लोगों की ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ के मुद्दे पर 2019 में अपने पद से इस्तीफा दे दिया था। अब उन्होंने केंद्र सरकार पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा है कि उनके इस्तीफे को छह साल से अधिक समय से जानबूझकर अटका कर रखा गया है।
बुधवार (25 मार्च) को उन्होंने बताया कि इस देरी के कारण वह आगामी केरल विधानसभा चुनाव में कांग्रेस उम्मीदवार के रूप में चुनाव नहीं लड़ सके। गोपीनाथन पिछले साल अक्टूबर में ही कांग्रेस में शामिल हुए थे।
सरकारी सूत्रों का कहना है कि गोपीनाथन के इस्तीफे पर अंतिम सिफारिश अभी तक कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (DoPT) को नहीं भेजी गई है। यह विभाग आईएएस अधिकारियों के लिए कैडर-नियंत्रक प्राधिकरण के रूप में काम करता है।
इसका सीधा मतलब है कि उनका इस्तीफा अभी भी गृह मंत्रालय के पास लंबित है। सूत्रों के मुताबिक, इस्तीफे की स्वीकृति में इतनी लंबी देरी का कोई पूर्व उदाहरण मौजूद नहीं है।
आईएएस अधिकारियों और राजनीतिक गतिविधियों से जुड़े नियम
गोपीनाथन ने अनुच्छेद 370 हटाए जाने के बाद जम्मू-कश्मीर में लगाई गई पाबंदियों के विरोध में अगस्त 2019 में आईएएस पद छोड़ दिया था। उनके पलक्कड़ विधानसभा सीट से कांग्रेस के उम्मीदवार होने की काफी चर्चा थी।
हालांकि, आचरण नियम सेवारत सरकारी कर्मचारियों को किसी भी राजनीतिक दल या संगठन से जुड़ने की अनुमति नहीं देते हैं। इसके साथ ही उन्हें किसी भी राजनीतिक गतिविधि में हिस्सा लेने या किसी की मदद करने से भी रोका जाता है। इसी वजह से एक सेवारत सरकारी अधिकारी के रूप में गोपीनाथन की स्थिति अभी भी अधर में लटकी हुई है।
अखिल भारतीय सेवा (आचरण) नियमों में 27 नवंबर 2014 को हुए एक संशोधन के जरिए कुछ नए खंड जोड़े गए थे। इसके नियम 3(1) के अनुसार, हर सरकारी कर्मचारी को हमेशा राजनीतिक तटस्थता बनाए रखनी होगी और उसे संविधान तथा लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति अपनी प्रतिबद्धता साबित करनी होगी।
बुधवार को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को टैग करते हुए गोपीनाथन ने इस पूरी स्थिति को ‘शुद्ध उत्पीड़न’ करार दिया। गौरतलब है कि प्रधानमंत्री ही डीओपीटी के प्रभारी मंत्री होते हैं।
गोपीनाथन ने लिखा कि उनका राजनीतिक रुख चाहे जो भी हो, लेकिन इस्तीफा देने और लोकतांत्रिक प्रक्रिया में हिस्सा लेने के उनके अधिकार को रोकना बेहद दयनीय और क्षुद्र मानसिकता है। उन्होंने सरकार से इस ओछेपन को छोड़कर उनका इस्तीफा तुरंत स्वीकार करने की अपील की।
इस्तीफे की आधिकारिक प्रक्रिया क्या है?
आईएएस, भारतीय पुलिस सेवा (आईपीएस) और भारतीय वन सेवा जैसे तीनों अखिल भारतीय सेवाओं के अधिकारियों का इस्तीफा एक विशेष नियम के तहत आता है। यह प्रक्रिया अखिल भारतीय सेवा (मृत्यु-सह-सेवानिवृत्ति लाभ) नियम, 1958 के नियम 5(1) और 5(1)(A) द्वारा शासित होती है। अन्य केंद्रीय सेवाओं के अधिकारियों पर भी इसी तरह के नियम लागू होते हैं।
किसी कैडर (राज्य या केंद्र शासित प्रदेश) में सेवारत अधिकारी को अपना इस्तीफा उस राज्य के मुख्य सचिव को सौंपना अनिवार्य है। वहीं, केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पर तैनात अधिकारियों को अपना इस्तीफा संबंधित मंत्रालय या विभाग के सचिव को देना होता है। इसके बाद वह मंत्रालय अधिकारी का इस्तीफा अपनी टिप्पणियों और सिफारिशों के साथ संबंधित राज्य कैडर को आगे बढ़ा देता है।
एजीएमयूटी (अरुणाचल प्रदेश-गोवा-मिजोरम और केंद्र शासित प्रदेश) कैडर के अधिकारियों के मामले सीधे केंद्रीय गृह मंत्रालय के माध्यम से रूट किए जाते हैं। कन्नन गोपीनाथन भी इसी एजीएमयूटी कैडर के अधिकारी थे।
डीसीआरबी नियमों के नियम 5 के मुताबिक, सेवा से बर्खास्त किए गए, हटाए गए या इस्तीफा देने वाले किसी भी व्यक्ति को सेवानिवृत्ति लाभ नहीं दिया जा सकता है। डीओपीटी के दिशा-निर्देश भी स्पष्ट करते हैं कि इस्तीफा पूरी तरह से स्पष्ट और बिना किसी शर्त के होना चाहिए।
इस्तीफा देने के बाद क्या होता है?
सबसे पहले राज्य सरकार यह जांच करती है कि अधिकारी पर कोई बकाया, अदालती मामला या भ्रष्टाचार जैसी कोई जांच तो लंबित नहीं है। अगर ऐसा कुछ पाया जाता है, तो आमतौर पर इस्तीफा तुरंत खारिज कर दिया जाता है।
इसके बाद राज्य सरकार अधिकारी के बकाया और सतर्कता स्थिति का पूरा ब्यौरा अपनी सिफारिश के साथ केंद्र सरकार को भेजती है। आईएएस अधिकारियों के मामले में इस इस्तीफे पर विचार करने का अधिकार डीओपीटी मंत्री यानी प्रधानमंत्री के पास होता है। आईपीएस के लिए यह अधिकार गृह मंत्री और भारतीय वन सेवा के लिए पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्री के पास सुरक्षित होता है।
क्या सरकार इस्तीफे को रोककर रख सकती है?
आईएएस अधिकारी का इस्तीफा स्वीकार करने के लिए सरकार के पास कोई निर्धारित समय सीमा नहीं होती है। हालांकि, 15 फरवरी 1988 को जारी डीओपीटी के एक परिपत्र में साफ कहा गया है कि जो अधिकारी सेवा नहीं करना चाहता, उसे जबरन रोके रखना सरकार के हित में नहीं है। इसलिए सामान्य नियम यही है कि अधिकारी का इस्तीफा स्वीकार कर लिया जाना चाहिए, बशर्ते कुछ विशेष परिस्थितियां बाधा न बनें।
साल 1988 के उसी परिपत्र के अनुसार, अगर कोई निलंबित सरकारी कर्मचारी इस्तीफा देता है, तो सक्षम प्राधिकारी को उसके खिलाफ लंबित अनुशासनात्मक मामले की गंभीरता देखनी होती है।
इसके आधार पर यह तय होता है कि इस्तीफा स्वीकार करना जनहित में होगा या नहीं। कुछ मामलों में अधिकारियों के खिलाफ अनुशासनात्मक मामले लंबित होने के कारण ही उनके इस्तीफे खारिज किए गए हैं। ऐसे मामलों में केंद्रीय सतर्कता आयोग (सीवीसी) की सहमति भी ली जाती है।
सरकार इस बात की भी जांच करती है कि अधिकारी ने विशेष प्रशिक्षण या फेलोशिप के लिए एक तय समय तक सरकार की सेवा करने का कोई बॉन्ड तो नहीं भरा था।
उदाहरण के लिए, अरविंद केजरीवाल ने 2006 में भारतीय राजस्व सेवा (आईआरएस) से इस्तीफा दिया था। बाद में पता चला कि फेलोशिप पर जाते समय उन्होंने एक बॉन्ड भरा था। इसी कारण आयकर विभाग ने उन्हें नोटिस भेजकर करीब 9 लाख रुपये का जुर्माना लगाया था।
डीओपीटी का नियम यह भी कहता है कि अगर कोई अधिकारी किसी महत्वपूर्ण काम में लगा है और उसकी जगह किसी और की व्यवस्था करने में समय लगेगा, तो इस्तीफा तुरंत स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए। वैकल्पिक व्यवस्था होने के बाद ही इसे मंजूरी मिलनी चाहिए।
कन्नन गोपीनाथन के मामले में क्या हुआ?
गोपीनाथन ने अगस्त 2019 में अपना इस्तीफा सरकार को सौंपा था। लेकिन उनके कार्यकारी रिकॉर्ड शीट के अनुसार, 26 सितंबर 2019 को उन्हें दादरा और नगर हवेली के बिजली विकास विभाग में सचिव के पद पर तैनात कर दिया गया। आईएएस अधिकारियों की नवीनतम सिविल सूची में भी उनका नाम अभी तक मौजूद है।
गोपीनाथन के पद छोड़ने के ठीक दो महीने बाद केंद्रीय गृह मंत्रालय ने उनके खिलाफ विभागीय जांच का एक ज्ञापन जारी कर दिया। कुछ समय बाद उन्हें मीडिया के साथ अनधिकृत बातचीत जैसे गंभीर आरोपों के लिए चार्जशीट भी सौंप दी गई।
अप्रैल 2020 में कोविड-19 महामारी के दौरान काम पर लौटने से इनकार करने पर उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई। सरकार का तर्क था कि उनका इस्तीफा स्वीकार नहीं हुआ है, इसलिए उन्हें ड्यूटी पर वापस आना ही होगा। इस एफआईआर में आईपीसी की धारा 188, महामारी रोग अधिनियम और आपदा प्रबंधन अधिनियम के तहत अवज्ञा का आरोप लगाया गया था।
अब तक कितने आईएएस अधिकारी दे चुके हैं इस्तीफा?
डीओपीटी से इस महीने प्राप्त एक आरटीआई डेटा के अनुसार, साल 2010 से अब तक कुल 31 आईएएस अधिकारी अपनी सेवा से इस्तीफा दे चुके हैं। यह वही साल है जब यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा में प्रीलिम्स की जगह सिविल सेवा एप्टीट्यूड टेस्ट (सीसैट) को शामिल किया गया था।
आंकड़ों से पता चलता है कि 2010 से 2014 के बीच यूपीए सरकार के कार्यकाल में 11 आईएएस अधिकारियों ने इस्तीफा दिया था। वहीं, 2015 से मई 2025 तक के एनडीए सरकार के कार्यकाल के दौरान 20 अधिकारियों ने अपना पद छोड़ा।
साल 2019 में एक अन्य एजीएमयूटी कैडर के अधिकारी कशिश मित्तल ने दिल्ली से अरुणाचल प्रदेश तबादला होने के बाद इस्तीफा दे दिया था। मित्तल को उसी साल सेवामुक्त भी कर दिया गया था। इसके अलावा साल 2018 में छत्तीसगढ़ कैडर के ओ पी चौधरी ने इस्तीफा देकर भाजपा का दामन थाम लिया था और आज वह उसी राज्य के वित्त मंत्री हैं।
इसी तरह, मौजूदा केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव ने अपना व्यवसाय शुरू करने के लिए 2011 में ओडिशा कैडर से इस्तीफा दिया था और बाद में वह भाजपा में शामिल हो गए। सीसैट लागू होने के बाद से चुने गए ज्यादातर उम्मीदवार टेक्नोक्रेट रहे हैं। माना जाता है कि इनमें से कई ने निजी क्षेत्र में बेहतर अवसरों या राजनीति में शामिल होने के लिए ही इस्तीफा चुना होगा।
क्या आईएएस अधिकारी अपना इस्तीफा वापस ले सकते हैं?
साल 2019 में कश्मीर मुद्दे पर इस्तीफा देने वाले गोपीनाथन अकेले आईएएस अधिकारी नहीं थे। साल 2010 बैच के अधिकारी शाह फैसल ने भी उसी साल जनवरी में कश्मीर में हो रही हत्याओं का हवाला देते हुए इस्तीफा दे दिया था। हालांकि, अपनी राजनीतिक पारी में असफल रहने के बाद फैसल ने अपना इस्तीफा वापस ले लिया और 2022 में आईएएस के तौर पर लौट आए।
संशोधित डीसीआरबी नियमों के नियम 5(1A)(i) के अनुसार, केंद्र सरकार ‘जनहित’ में किसी अधिकारी को अपना इस्तीफा वापस लेने की अनुमति दे सकती है।
2011 में हुए एक नियम संशोधन में यह भी स्पष्ट किया गया है कि इस्तीफे की प्रभावी तारीख और काम पर लौटने की तारीख के बीच अधिकतम 90 दिनों का ही अंतर हो सकता है।
यह नियम यह भी कहता है कि यदि कोई अधिकारी राजनीति में उतरने के मकसद से इस्तीफा देता है, तो सरकार उसकी वापसी को स्वीकार नहीं करेगी।
हालांकि, शाह फैसल के मामले में ये दोनों ही नियम लागू नहीं हुए क्योंकि उनका इस्तीफा भी सालों तक प्रक्रिया में लाया ही नहीं गया था। ऐसे मामलों में नियम कहता है कि यदि कोई अधिकारी इस्तीफा स्वीकार होने से पहले लिखित रूप में उसे वापस ले लेता है, तो वह इस्तीफा अपने आप वापस लिया हुआ मान लिया जाता है।
एक ओर जहां फैसल आज वापस सरकारी सेवा में लौट चुके हैं, वहीं गोपीनाथन का मामला बिल्कुल अलग दिशा में मुड़ गया है। गोपीनाथन ने उनके इस्तीफे को स्वीकार करने में हो रही इस सरकारी देरी को लगातार उत्पीड़न का नाम दिया है।
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