नई दिल्ली: भारत और नीदरलैंड के चिकित्सकों और सामाजिक संगठनों ने मिलकर एक बेहतरीन पहल की है। इसके तहत भारत में दुर्लभ बीमारी से जूझ रहे सात बच्चों के लिए हेग (The Hague) में एक विशेष दवा तैयार की जा रही है। इस प्रक्रिया को ‘कंपाउंडिंग’ कहा जाता है, जिसमें जरूरत के हिसाब से थोड़ी मात्रा में कस्टमाइज्ड दवा का निर्माण किया जाता है।
इस खास दवा का नाम टिरैट्रिकोल (tiratricol) है। हेग की ट्रांसवाल फार्मेसी इसे महज 1.8 यूरो प्रति कैप्सूल की दर से तैयार कर रही है। यह कीमत स्वीडिश कंपनी एगेटिस (Egetis) द्वारा जर्मनी में बेची जा रही कमर्शियल दवा की तुलना में 99 गुना कम है। एगेटिस इस दवा को जर्मनी में 180 यूरो (करीब 19,000 रुपये) प्रति टैबलेट की दर से बेच रही है।
फिलहाल, इनमें से एक बच्चे का परिवार इस दवा को जर्मनी से आयात कर रहा है। इसका मासिक खर्च लगभग 3 लाख रुपये आता है। चूंकि यह दवा जीवन भर खानी पड़ती है, इसलिए इतना भारी आर्थिक बोझ उठाना परिवार के लिए असंभव होता जा रहा था।
ये सातों बच्चे एलन हर्नडॉन-डुडले सिंड्रोम (AHDS) नामक एक बेहद दुर्लभ बीमारी से पीड़ित हैं। इसे एमसीटी8 (MCT8) डेफिशिएंसी भी कहा जाता है। अनुवांशिक दोष के कारण इन बच्चों के थायराइड हार्मोन मस्तिष्क की कोशिकाओं तक नहीं पहुंच पाते, जिससे उनके विकास में गंभीर बाधाएं आती हैं। इरास्मस यूनिवर्सिटी मेडिकल सेंटर (Erasmus MC) के शोध में यह साबित हो चुका है कि 1953 से पहचानी जाने वाली दवा ‘टिरैट्रिकोल’ इस बीमारी के शारीरिक लक्षणों को काफी हद तक कम कर सकती है। फ्रांस में यह दवा थायराइड के मरीजों के इलाज के लिए 1974 से ही बाजार में उपलब्ध है।
साल 2014 में इरास्मस एमसी के डॉक्टरों ने 1.4 करोड़ यूरो (14 मिलियन यूरो) के सार्वजनिक फंड से हुए शोध में पाया कि टिरैट्रिकोल का इस्तेमाल एएचडीएस (AHDS) के इलाज में भी किया जा सकता है। लेकिन संस्थान ने बिना किसी “उचित मूल्य शर्त” (fair price clause) के इसके बौद्धिक संपदा अधिकार एगेटिस को बेच दिए। इसके बाद 2025 में एगेटिस को यूरोप में इस दवा की मार्केटिंग की मंजूरी मिल गई, जिससे उसे यूरोपीय अनाथ दवा कानून (orphan drug legislation) के तहत 10 साल का मार्केट एकाधिकार प्राप्त हो गया। नतीजतन, साल 2017 में फ्रांस में 0.35 यूरो में मिलने वाली यह दवा 2026 तक जर्मनी में 180 यूरो प्रति टैबलेट तक पहुंच गई।
दवाओं और चिकित्सा तकनीकों तक किफायती पहुंच सुनिश्चित करने के लिए काम करने वाले नीदरलैंड स्थित ‘फार्मास्युटिकल अकाउंटेबिलिटी फाउंडेशन’ (PAF) ने भारत के इन बच्चों तक यह दवा पहुंचाने का जिम्मा उठाया है। पीएएफ के विल्बर्ट बैननबर्ग ने एगेटिस की मूल्य निर्धारण नीति को “अनैतिक बिजनेस मॉडल” करार दिया है। इस फंडिंग प्रयास पर छपी एक खबर ने पीएएफ का ध्यान खींचा, जिसके बाद भारत और डच विशेषज्ञों के बीच इस सहयोग की शुरुआत हुई।
चूंकि फार्मेसी में कंपाउंडिंग के जरिए दवा तैयार करना केवल एक आपातकालीन राहत है, इसलिए पीएएफ एक स्थायी समाधान की तलाश में है। इसके लिए संस्था भारतीय बाल रोग विशेषज्ञों और दवा अधिकार कार्यकर्ताओं के साथ मिलकर काम कर रही है। उनका मकसद भारत में टिरैट्रिकोल का किफायती उत्पादन और पंजीकरण शुरू करवाना है, ताकि आने वाले कुछ वर्षों में देश के भीतर ही इसका जेनेरिक निर्माण संभव हो सके।
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