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गुजरात UCC बिल पर संग्राम: AIMPLB ने बताया ‘संविधान के खिलाफ’, अब हाईकोर्ट में देगा चुनौती

| Updated: April 4, 2026 12:59

AIMPLB का बड़ा ऐलान- 'संविधान और मौलिक अधिकारों के खिलाफ है गुजरात का समान नागरिक संहिता कानून', हाईकोर्ट में देगा चुनौती

शुक्रवार को ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (AIMPLB) ने गुजरात विधानसभा से हाल ही में पास हुए समान नागरिक संहिता (UCC) बिल पर कड़ी आपत्ति जताई। बोर्ड ने इसे पूरी तरह से दोषपूर्ण और कानूनी मानकों के खिलाफ बताया है। उनका यह भी कहना है कि यह नया विधेयक धार्मिक आजादी और बुनियादी नागरिक अधिकारों का खुला उल्लंघन करता है।

बोर्ड ने यह स्पष्ट कर दिया है कि वह इस कानून को गुजरात हाईकोर्ट में चुनौती देगा। इसके साथ ही, संगठन ने उत्तराखंड और गुजरात दोनों ही राज्यों में यूसीसी को लागू किए जाने पर तत्काल रोक लगाने की मांग की है। एआईएमपीएलबी ने इस पूरे मामले की व्यापक संवैधानिक समीक्षा करने की जरूरत पर भी जोर दिया है।

संगठन का मानना है कि भविष्य में पारिवारिक कानूनों में कोई भी बदलाव तभी किया जाना चाहिए, जब सभी संबंधित पक्षों के साथ विस्तृत चर्चा हो। यह पूरी प्रक्रिया संवैधानिक गारंटियों और उचित कानूनी दायरे के भीतर ही होनी चाहिए।

एआईएमपीएलबी ने इस कानून को लाए जाने के समय पर भी गंभीर सवाल खड़े किए हैं। बोर्ड के अनुसार, यह कदम पूरी तरह से राजनीतिक हितों से प्रेरित नजर आता है। इसे कई राज्यों में होने वाले आगामी विधानसभा चुनावों और गुजरात के नगर निगम चुनावों से जोड़कर देखा जा रहा है।

नई दिल्ली में पत्रकारों से बातचीत करते हुए एआईएमपीएलबी के वरिष्ठ प्रतिनिधियों ने अपनी चिंताएं साझा कीं। उन्होंने कहा कि गुजरात का यूसीसी बिल, जो अभी राज्यपाल की मंजूरी का इंतजार कर रहा है, उसने गंभीर संवैधानिक, कानूनी और लोकतांत्रिक सवाल पैदा कर दिए हैं।

बोर्ड के पदाधिकारियों ने स्पष्ट किया कि ‘समान नागरिक संहिता’ के नाम पर लाया गया यह कानून वास्तव में संविधान की मूल भावना के खिलाफ है। यह संविधान के भाग III के तहत मिलने वाले मौलिक अधिकारों का सीधा हनन करता है, जिनमें मुख्य रूप से धार्मिक स्वतंत्रता, समानता और व्यक्तिगत आजादी के अधिकार शामिल हैं।

एआईएमपीएलबी ने याद दिलाया कि यूसीसी का जिक्र संविधान के भाग IV में अनुच्छेद 44 के तहत राज्य के नीति निर्देशक तत्वों में किया गया है। इसे मौलिक अधिकारों की तरह सीधे तौर पर लागू नहीं किया जा सकता।

संगठन ने इस बात पर जोर दिया कि अगर वास्तव में कोई ऐसी संहिता आती है, तो उसे पूरे देश के सभी नागरिकों पर एक समान लागू होना चाहिए। लेकिन गुजरात का कानून न तो पूरे देश में लागू होता है और न ही राज्य के भीतर इसे सभी पर थोपा जा रहा है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण यह है कि अनुसूचित जनजातियों और संविधान द्वारा संरक्षित अन्य समुदायों को इस कानून के दायरे से पूरी तरह बाहर रखा गया है।

एआईएमपीएलबी के प्रवक्ता एसक्यूआर इलियास ने इस पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि इस कानून को किसी भी तरह से असली समान नागरिक संहिता नहीं कहा जा सकता। उन्होंने कहा कि इसका नाम ही भ्रामक और जनता को धोखा देने वाला है।

इलियास ने आगे बताया कि उत्तराखंड के यूसीसी को एआईएमपीएलबी और कई अन्य धार्मिक संगठनों द्वारा पहले ही हाईकोर्ट में चुनौती दी जा चुकी है। अब बोर्ड गुजरात के यूसीसी को भी अदालत के कटघरे में खड़ा करने की पूरी तैयारी कर चुका है।

गुजरात सरकार द्वारा अपनाई गई परामर्श प्रक्रिया पर भी एआईएमपीएलबी ने गहरी चिंता व्यक्त की है। बोर्ड ने कहा कि हालांकि जनता की राय जानने के लिए एक समिति जरूर बनाई गई थी, लेकिन प्रस्ताव के भारी विरोध के बावजूद उसकी रिपोर्ट को आज तक सार्वजनिक नहीं किया गया।

संगठन ने अपने एक बयान में कहा कि यह स्थिति पारदर्शिता पर बड़े सवालिया निशान लगाती है। इससे यही साबित होता है कि जनता से राय मांगने की पूरी कवायद एक सच्ची लोकतांत्रिक प्रक्रिया न होकर सिर्फ एक कागजी खानापूर्ति थी।

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