इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हिंदू कानून के तहत महिलाओं के अधिकारों को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि एक पति की अपनी पत्नी के भरण-पोषण की जिम्मेदारी उसकी मृत्यु के साथ खत्म नहीं होती है। इस ऐतिहासिक फैसले के मुताबिक, एक विधवा महिला को अपने ससुर से गुजारा भत्ता मांगने का पूरा कानूनी अधिकार है।
रामपुर निवासी अकुल रस्तोगी द्वारा दायर की गई एक अपील को खारिज करते हुए अदालत ने यह अहम टिप्पणी की। न्यायमूर्ति अरिंदम सिन्हा और न्यायमूर्ति सत्य वीर सिंह की खंडपीठ ने 17 मार्च को दिए गए अपने आदेश में इस बात पर जोर दिया कि पत्नी का भरण-पोषण करना पति का स्थापित और प्राथमिक दायित्व है।
अदालत ने अपने आदेश में कहा कि आमतौर पर यह कानूनी व्यवस्था उन स्थितियों से उत्पन्न हुई है जहां पति-पत्नी अलग हो गए हों और पत्नी ने आपराधिक या हिंदू कानून के प्रावधानों के तहत भरण-पोषण की मांग की हो।
हालांकि, नए आदेश के अनुसार पति का यह दायित्व उसके निधन के बाद भी जीवित रहता है, क्योंकि कानून एक विधवा को अपने ससुर से भरण-पोषण का दावा करने की पूरी अनुमति देता है।
कानूनी जानकारों के अनुसार, हिंदू दत्तक ग्रहण और भरण-पोषण अधिनियम, 1956 की धारा 19 इस अधिकार को कानूनी मान्यता प्रदान करती है। इस धारा के तहत एक विधवा बहू अपने ससुर से उस स्थिति में गुजारा भत्ता मांग सकती है, जब वह अपनी व्यक्तिगत कमाई या अपनी संपत्ति से अपना गुजारा करने में पूरी तरह असमर्थ हो।
इस कानून में यह भी स्पष्ट किया गया है कि महिला अपने ससुर के पास भरण-पोषण के लिए तभी जा सकती है, जब उसके पास आर्थिक सहायता का कोई अन्य विकल्प न बचा हो।
इसका सीधा अर्थ यह है कि यदि वह अपने दिवंगत पति की संपत्ति, अपने माता-पिता की संपत्ति, या फिर अपने बच्चों की संपत्ति से भरण-पोषण प्राप्त करने में विफल रहती है, तभी वह ससुर के समक्ष यह दावा पेश कर सकती है।
हालांकि, ससुर पर यह कानूनी बाध्यता कुछ विशेष परिस्थितियों में लागू नहीं होती है। यदि ससुर के पास अपने कब्जे वाली पैतृक संपत्ति या सहदायिक (कोपार्सनरी) संपत्ति से इस भत्ते का भुगतान करने के साधन नहीं हैं, तो उस पर भरण-पोषण का दबाव नहीं डाला जा सकता।
यह छूट विशेष रूप से तब भी लागू होती है जब बहू ने उस संपत्ति में से पहले ही अपना हिस्सा प्राप्त कर लिया हो।
इस पूरे कानून का एक सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि यदि विधवा बहू दूसरी शादी कर लेती है, तो ससुर की यह जिम्मेदारी उसी समय समाप्त हो जाती है।
इसके अलावा, अधिनियम की धारा 21 (viii) महिला को यह अधिकार भी देती है कि ससुर की मृत्यु (चाहे महिला उसके पहले या बाद में विधवा हुई हो) के बाद भी वह उसकी संपत्ति से भरण-पोषण का दावा कर सकती है, बशर्ते वह कभी पुनर्विवाह न करे।
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