नागपुर: कभी एक फार्मेसी में काम करके महीने के मात्र 150 रुपये कमाने वाले रवींद्र मेटकर आज किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। साल 1984 में जब वह एक किशोर थे, तब उनका जीवन काफी संघर्षों से भरा था। लेकिन आज महाराष्ट्र के अमरावती जिले के मसला गांव का यह 57 वर्षीय किसान दुनिया भर के लिए एक मिसाल बन गया है।
अगले महीने वह यूनाइटेड किंगडम के प्रतिष्ठित ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में एआई (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) पर आयोजित होने वाले एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में हिस्सा लेने जा रहे हैं। ऑक्सफोर्ड में वह अपनी सफलता की वह प्रेरक कहानी साझा करेंगे, जिसमें उन्होंने महज एक एकड़ जमीन से 15 करोड़ रुपये का विशाल कृषि व्यवसाय खड़ा कर दिया।
उनके इस सफर की शुरुआत इस मजबूत संकल्प के साथ हुई थी कि जो खाद वह खुद बना सकते हैं, उसके लिए वह बाजार में पैसे नहीं चुकाएंगे।
मेटकर को 1 से 5 मई तक ऑक्सफोर्ड के सेड कॉलेज (Said College) में होने वाले ग्लोबल रिसर्च कॉन्फ्रेंस में बतौर वक्ता आमंत्रित किया गया है। इस सम्मेलन की थीम “AI For Every Mind” रखी गई है। इस वैश्विक मंच पर रवींद्र टिकाऊ खेती, लागत कम करने के तरीकों, जलवायु-अनुकूल कृषि पद्धतियों और पोल्ट्री उद्यमशीलता जैसे अहम विषयों पर अपने विचार रखेंगे।
अपने शुरुआती जीवन के बारे में बात करते हुए मेटकर बताते हैं कि उनके पिता राज्य सरकार में चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारी थे और तब जीवन बहुत कठिन था। अमरावती विश्वविद्यालय से कॉमर्स में मास्टर डिग्री पूरी करने के बाद उनके जीवन में पहला बड़ा बदलाव साल 1994 में आया। उस दौरान उनके रिश्तेदारों ने उनके परिवार को चार एकड़ जमीन दी थी।
मेटकर परिवार ने उस जमीन को बेचकर भंडारा जिले में एक एकड़ का प्लॉट खरीदा। रवींद्र ने शुरुआत में ही यह बात समझ ली थी कि एक किसान अपनी फसल के बाजार मूल्य को तो नियंत्रित नहीं कर सकता, लेकिन वह लागत कम करके अपनी पैदावार जरूर सुधार सकता है।
इसी सोच के साथ उन्होंने अपने खेतों के लिए खुद खाद बनानी शुरू कर दी। देखते ही देखते मेटकर ने अपने इस सिद्धांत को एक सफल बिजनेस मॉडल में बदल दिया।
आज वह अपने पैतृक गांव में लगभग 50 एकड़ जमीन पर खेती कर रहे हैं। उनके खेतों में आम, मोसंबी, आंवला, केला, सुपारी और विभिन्न प्रकार के अनाज लहलहाते हैं।
इसके अलावा वह एक पोल्ट्री फार्म भी चलाते हैं। इस फार्म में बाजार के व्यावसायिक उत्पादों की जगह स्थानीय रूप से तैयार किए गए चारे का इस्तेमाल होता है, जबकि खेती से निकलने वाले कचरे को वापस खाद के रूप में उपयोग कर लिया जाता है।
अपनी इस अनूठी और आत्मनिर्भर तकनीक से वह अब तक देश भर के 50 लाख से अधिक किसानों का मार्गदर्शन कर चुके हैं। मेटकर गर्व से बताते हैं कि देश के किसान उनके इस कृषि उद्यम से काफी प्रेरित महसूस करते हैं। उनका मानना है कि अगर वह खेती के जरिए 15 करोड़ रुपये का टर्नओवर हासिल कर सकते हैं, तो कोई भी दूसरा किसान इस सफलता को दोहरा सकता है।
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