चीनी के स्वस्थ विकल्प के तौर पर प्रचारित किए जाने वाले सुक्रालोज़ और स्टीविया जैसे कृत्रिम मिठास वाले पदार्थ (आर्टिफिशियल स्वीटनर) हमारे जीन की कार्यप्रणाली को बदल सकते हैं। एक नए अध्ययन में चेतावनी दी गई है कि इनका सेवन हमारी आने वाली पीढ़ियों में डायबिटीज के खतरे को काफी हद तक बढ़ा सकता है।
हाल ही में हुए कई शोध इस बात की ओर इशारा करते हैं कि इन कृत्रिम मिठास के नकारात्मक प्रभाव जीन की गतिविधियों में बदलाव के कारण संतानों में भी स्थानांतरित हो सकते हैं। अक्सर ये स्वीटनर डाइट कोल्ड ड्रिंक्स में चीनी के विकल्प के रूप में इस्तेमाल किए जाते हैं, जो मीठे तो होते हैं लेकिन इनमें कोई कैलोरी नहीं पाई जाती है।
इस नए अध्ययन से पता चला है कि जिन चूहों ने सुक्रालोज़ या स्टीविया का सेवन किया था, उनकी संतानों में सूजन और मेटाबॉलिज्म (चयापचय) से जुड़े जीन की अभिव्यक्ति में महत्वपूर्ण बदलाव देखा गया।
इस बदलाव ने उन्हें डायबिटीज जैसी बीमारियों के प्रति अधिक संवेदनशील बना दिया, जबकि हैरानी की बात यह है कि इन स्वीटनर्स को मूल रूप से इसी समस्या को हल करने के लिए ही बनाया गया था।
मोटापा और इंसुलिन प्रतिरोध पर प्रभाव
फ्रंटियर्स इन न्यूट्रिशन पत्रिका में प्रकाशित इस अध्ययन की प्रमुख लेखिका फ्रांसिस्का कोंचा सेलुमे ने कहा कि यह काफी दिलचस्प है कि इन एडिटिव्स की बढ़ती खपत के बावजूद, मोटापा और इंसुलिन प्रतिरोध जैसी चयापचय संबंधी बीमारियों के प्रसार में कोई कमी नहीं आई है।
इन नतीजों से संकेत मिलता है कि आर्टिफिशियल स्वीटनर हमारे मेटाबॉलिज्म को ऐसे तरीकों से प्रभावित करते हैं जिन्हें हम अभी तक पूरी तरह से नहीं समझ पाए हैं।
अध्ययन के लिए 47 नर और मादा चूहों को तीन समूहों में बांटा गया था। इनमें से प्रत्येक समूह को या तो सादा पानी दिया गया, या फिर सुक्रालोज़ और स्टीविया की ऐसी खुराक दी गई जो एक इंसान के दैनिक सामान्य आहार के बराबर थी।
इसके बाद इन चूहों की लगातार दो पीढ़ियों तक ब्रीडिंग कराई गई और इन दोनों नई पीढ़ियों को केवल सादा पानी ही पीने को दिया गया।
इसके बाद सभी चूहों का इंसुलिन प्रतिरोध के लिए परीक्षण किया गया, जो कि डायबिटीज का एक शुरुआती चेतावनी संकेत माना जाता है। वैज्ञानिकों ने चूहों के आंत के माइक्रोबायोम में संभावित बदलाव देखने के लिए उनके मल के नमूनों का भी गहन आकलन किया।
आंत और जीन पर पड़ने वाला सीधा असर
पिछले अध्ययनों में यह सुझाव दिया गया था कि कृत्रिम मिठास आंत के माइक्रोबायोम के कार्य को प्रभावित कर सकती है और अंततः जीन अभिव्यक्ति को बदल सकती है।
शोधकर्ताओं ने विशेष रूप से यकृत और आंतों में सूजन, गट बैरियर फंक्शन और मेटाबॉलिज्म से जुड़े पांच जीनों की गतिविधि का अध्ययन किया, ताकि आंत पर पड़ने वाले प्रभावों की स्पष्ट तस्वीर मिल सके।
वैज्ञानिकों ने पाया कि आर्टिफिशियल स्वीटनर्स के अलग-अलग प्रभाव उत्पन्न हुए, जो समय के साथ बदलते रहे। सुक्रालोज़ का सेवन करने वाले चूहों की केवल नर संतानों में ग्लूकोज टॉलरेंस (सहनशीलता) की कमी के संकेत मिले।
अगली पीढ़ी में, सुक्रालोज़ का सेवन करने वाले चूहों के नर वंशजों और स्टीविया का सेवन करने वाले चूहों की मादा वंशजों में खाली पेट ब्लड शुगर का स्तर बढ़ा हुआ पाया गया। स्टीविया और सुक्रालोज़ दोनों का सेवन करने वाले चूहों में आंत के बैक्टीरिया कम लाभकारी यौगिकों का उत्पादन कर रहे थे।
चूहों की आने वाली पीढ़ियों में भी इन फायदेमंद गट बैक्टीरिया यौगिकों की सांद्रता काफी कम पाई गई। जिन चूहों ने सुक्रालोज़ का सेवन किया था, उनकी आंत में हुए बदलावों का असर अधिक गंभीर और लंबे समय तक रहने वाला था।
अध्ययन में स्पष्ट रूप से पाया गया कि इन चूहों के मल में बीमारी पैदा करने वाली प्रजातियां अधिक थीं और फायदेमंद बैक्टीरिया बहुत कम थे।
नतीजों का क्या है अर्थ?
डॉ. कोंचा ने स्पष्ट किया कि इन जानवरों को सीधे तौर पर डायबिटीज नहीं हुई, बल्कि शरीर द्वारा ग्लूकोज को नियंत्रित करने के तरीके और सूजन एवं मेटाबॉलिज्म से जुड़े जीनों की गतिविधि में सूक्ष्म बदलाव देखे गए।
उन्होंने बताया कि यह संभव है कि ऐसे बदलाव उच्च वसा वाले आहार जैसी विशेष परिस्थितियों में चयापचय संबंधी गड़बड़ी की संवेदनशीलता को बढ़ा सकते हैं। कुल मिलाकर, यह पाया गया कि सुक्रालोज़ से जुड़े प्रभाव पीढ़ियों तक अधिक सुसंगत और लगातार बने रहे।
वैज्ञानिकों ने इस बात पर जोर दिया कि हालांकि अध्ययन ने स्वास्थ्य की स्थिति में बदलाव और कृत्रिम मिठास के बीच एक संबंध का संकेत दिया है, लेकिन इसने दोनों के बीच सीधे कारण और प्रभाव (कॉजेशन) को पूरी तरह स्थापित नहीं किया है। डॉ. कोंचा ने कहा कि इस शोध का उद्देश्य लोगों को डराना नहीं है, बल्कि इस विषय पर और अधिक जांच की आवश्यकता को उजागर करना है।
उन्होंने सुझाव दिया कि इन एडिटिव्स के सेवन में संयम बरतना और इनके दीर्घकालिक जैविक प्रभावों का निरंतर अध्ययन करते रहना एक उचित कदम होगा।
इस अध्ययन में शामिल नहीं रहे अन्य वैज्ञानिकों ने भी इन नतीजों पर अपनी राय रखी। फ्लिंडर्स यूनिवर्सिटी के गट हार्मोन्स इन हेल्थ एंड डिजीज लैब की प्रमुख एलीस मार्टिन ने कहा कि यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि चूहे मनुष्यों के साथ कई जैविक समानताएं साझा करते हैं, लेकिन हम इन परिणामों को अभी सीधे लोगों पर लागू नहीं कर सकते।
हालांकि, उन्होंने यह जरूर जोड़ा कि यह अध्ययन हालिया वैश्विक स्वास्थ्य चेतावनियों को और अधिक बल देता है कि हमें इस मामले में सतर्क रहना चाहिए।
यूनिवर्सिटी ऑफ मेलबर्न के क्लिनिकल एसोसिएट प्रोफेसर एलेक्स पॉलाकोव ने कहा कि यह नियंत्रित प्रयोगशाला स्थितियों के तहत किया गया एक चूहे का अध्ययन है, जो मनुष्यों के जटिल आहार परिदृश्य से बहुत अलग है। इसके बावजूद, उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि इसके संभावित व्यापक निहितार्थ काफी महत्वपूर्ण हैं और इन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
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