अहमदाबाद: भगवान कृष्ण की किंवदंतियों और आस्था के केंद्र द्वारकाधीश मंदिर के लिए प्रसिद्ध प्राचीन तटीय शहर द्वारका में एक बार फिर इतिहास के पन्ने पलटे जाएंगे। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के वरिष्ठ अधिकारियों ने पुष्टि की है कि द्वारका में जमीन और समुद्र के भीतर (अंडरवाटर) नए सिरे से पुरातात्विक खुदाई की तैयारी की जा रही है।
इस प्रस्तावित अभियान का मुख्य उद्देश्य आधुनिक तकनीक का उपयोग करके उन क्षेत्रों को खंगालना है, जिनका अभी तक अध्ययन नहीं किया गया है। इससे इस क्षेत्र के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक अतीत को और अधिक गहराई से समझने में मदद मिलेगी।
क्या है ASI का नया प्लान?
ASI के अधिकारियों के मुताबिक, आगामी चरण की खुदाई पिछली बार की तुलना में कहीं अधिक व्यापक और व्यवस्थित होगी। इससे पहले द्वारका में पानी के नीचे पुरातात्विक खुदाई आखिरी बार 2005 से 2007 के बीच की गई थी, जबकि साल 2025 में भी कुछ सीमित खोजबीन (Exploratory studies) हुई थी।
ASI के अतिरिक्त महानिदेशक (ADG) प्रो. आलोक त्रिपाठी ने बताया कि इस बार ASI की अंडरवाटर आर्कियोलॉजी विंग (UAW) बेट द्वारका के नए इलाकों और गोमती नदी के मुहाने के दूसरी तरफ के अनछुए समुद्री क्षेत्रों की जांच करेगी।
प्रो. त्रिपाठी ने कहा, “द्वारका पर पिछले लगभग 40 वर्षों से अध्ययन चल रहा है, लेकिन अब तक का काम काफी सीमित दायरे और उद्देश्यों के साथ हुआ था। इस बार हम उन जगहों पर खुदाई करेंगे जिनका विस्तार से अध्ययन नहीं हुआ है। हम गोमती नदी के मुहाने के दूसरे हिस्से की भी जांच कर रहे हैं।”
समुद्र की गहराई में उतरेंगे आधुनिक उपकरण
विशेषज्ञों का कहना है कि अरब सागर में बड़े और गहरे स्तर पर खुदाई के लिए आधुनिक उपकरणों और तकनीक का इस्तेमाल किया जाएगा। बता दें कि प्रो. त्रिपाठी स्वयं उस पांच सदस्यीय UAW टीम का हिस्सा थे, जिसने पिछले साल फरवरी में द्वारका में पानी के नीचे खोजबीन की थी।
गौरतलब है कि फरवरी 2024 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी द्वारका तट पर समुद्र में डुबकी लगाई थी और समुद्र की तलहटी में मौजूद प्राचीन अवशेषों के दर्शन किए थे। उनकी इस यात्रा ने इस ऐतिहासिक स्थल की ओर पूरे देश का ध्यान आकर्षित किया था।
जमीन पर भी होगी नई खोज
सिर्फ समुद्र ही नहीं, बल्कि जमीन पर भी खुदाई का दायरा बढ़ाया जाएगा। इस बार फोकस बेट द्वारका के उन इलाकों पर होगा जहां अभी तक ज्यादा छेड़छाड़ नहीं हुई है। इससे पहले की खुदाई मुख्य रूप से चट्टानी (क्लिफ) क्षेत्रों के पास केंद्रित थी।
प्रो. त्रिपाठी ने जानकारी दी, “अब हम जंगल के अंदरूनी हिस्सों में गहराई तक जा रहे हैं, जहां हमें एक महत्वपूर्ण बस्ती (Settlement) होने के संकेत मिले हैं। इस साइट पर कुछ उल्लेखनीय विशेषताएं हैं, और निचले स्तरों पर खुदाई करने से हमें उस समय की नगर नियोजन व्यवस्था, आर्थिक गतिविधियों, कला और शिल्प, तथा निवासियों की जीवनशैली के बारे में अहम जानकारी मिल सकती है।”
अब तक क्या-क्या मिला है?
भगवान कृष्ण द्वारा बसाई गई इस ‘डूबी हुई नगरी’ को लेकर पुरातत्वविदों और आम जनता में हमेशा से ही गहरा कौतूहल रहा है। ASI की वेबसाइट के अनुसार, अब तक की खोजों का उद्देश्य द्वारका के तट पर जलमग्न पुरातात्विक अवशेषों को समझना था, क्योंकि तटीय क्षेत्रों में कम ज्वार (Low tide) के दौरान कई मूर्तियां और पत्थर के लंगर (Stone anchors) मिले थे।
अब तक की खुदाई में टेराकोटा की वस्तुएं, मनके, चूड़ियों के टुकड़े, तांबे की अंगूठियां, लोहे की सिल्लियां (Iron ingots) और मिट्टी के बर्तन जैसी कई प्राचीन वस्तुएं प्राप्त हो चुकी हैं।
गुजरात के अन्य स्थलों पर भी काम जारी
द्वारका के अलावा, ASI ने गुजरात के अन्य प्रमुख ऐतिहासिक स्थलों पर भी खुदाई शुरू कर दी है। भावनगर जिले में स्थित प्राचीन राजधानी ‘वल्लभीपुर’ और दुनिया के सबसे पुराने डॉकयार्ड (गोदी) के लिए प्रसिद्ध हड़प्पाकालीन स्थल ‘लोथल’ में काम शुरू हो गया है।
लोथल के पास बन रहे ‘नेशनल मेरीटाइम हेरिटेज कॉम्प्लेक्स’ को देखते हुए, पुरातत्वविद उन्नत उपकरणों का उपयोग करके साइट के एक बड़े क्षेत्र को उजागर कर रहे हैं।
प्रो. त्रिपाठी ने जोर देकर कहा कि पुरातत्व का काम केवल खुदाई तक सीमित नहीं है। उन्होंने कहा, “हमारा काम खोजों को सही परिप्रेक्ष्य में रखना और ऐतिहासिक समझ में मौजूद कमियों को भरना भी है।” उन्होंने यह भी बताया कि पुरातत्व में भारत द्वारा तकनीक का उपयोग वैश्विक मानकों के अनुरूप है।
गुजरात में पिछले एक दशक में महत्वपूर्ण पुरातात्विक गतिविधियां देखी गई हैं। इसमें वडनगर (मेहसाणा जिला) में ASI द्वारा की गई व्यापक खुदाई शामिल है, जहां दो हजार वर्षों से निरंतर मानव निवास के प्रमाण मिले हैं। इसके अलावा, धोलावीरा (UNESCO वर्ल्ड हेरिटेज साइट) और लोथल जैसे स्थल गुजरात की समृद्ध विरासत की गवाही देते हैं।
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