अहमदाबाद: बनासकांठा बाल तस्करी का मामला महज एक अपराध नहीं, बल्कि एक गहरी और दुखद साजिश का हिस्सा है। शुरुआत में यह मामला सिर्फ एक बच्चे की खरीद-फरोख्त का लग रहा था, लेकिन जांच जैसे-जैसे आगे बढ़ी, एक बेहद खौफनाक सच्चाई सामने आई है। जांच एजेंसियों ने खुलासा किया है कि पिछले दो वर्षों में उत्तरी गुजरात के आदिवासी इलाकों से कम से कम 20 बच्चों की तस्करी कर उन्हें हैदराबाद में बेचा गया है।
यह संख्या न केवल इस रैकेट के विशाल नेटवर्क को दर्शाती है, बल्कि उन कुंवारी माताओं और उनके परिवारों की मजबूरी और शोषण की कहानी भी कहती है, जो सामाजिक बदनामी के डर में जी रहे हैं।
आदिवासी इलाकों को बनाया निशाना
जांच अधिकारियों ने पुष्टि की है कि तस्करी किए गए सभी 20 बच्चे उत्तरी गुजरात के सुदूर आदिवासी क्षेत्रों के थे। इनमें साबरकांठा के पोशिना, खेरोज और इडर के साथ-साथ बनासकांठा के दांता और डीसा जैसे इलाके शामिल हैं। क्राइम ब्रांच के वरिष्ठ अधिकारियों का कहना है कि इन बच्चों को ऐसे ही नहीं चुना गया था।
तस्करों ने सुनियोजित तरीके से उन परिवारों को निशाना बनाया जो समाज के हाशिए पर हैं, गरीबी से जूझ रहे हैं और सामाजिक कलंक के डर से दबे हुए हैं। स्वास्थ्य सेवाओं और शिक्षा के अभाव ने इस अपराध को और बढ़ावा दिया।
बदलते सामाजिक नियम बने तस्करों का हथियार
अधिकारियों ने बताया कि इन समुदायों में बदलते सामाजिक ढांचे और पारिवारिक मान्यताओं का तस्करों ने भरपूर फायदा उठाया।
एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया, “कुछ दशक पहले तक आदिवासियों में अविवाहित महिलाओं का मां बनना असामान्य नहीं माना जाता था। लेकिन अब उनकी मान्यताओं में बदलाव आया है और जो पहले सामान्य था, अब उसे ‘पाप’ या कलंक माना जाने लगा है। शादी के बिना पैदा हुए बच्चों को लेकर अब समाज में जो डर और शर्म है, तस्करों ने उसी को अपना हथियार बनाया।”
29 जनवरी को हुआ भंडाफोड़
इस पूरे रैकेट का खुलासा 29 जनवरी को हुआ, जब हिम्मतनगर से आ रहे चार आरोपियों को अहमदाबाद एयरपोर्ट के पास रोका गया। उनके पास एक 15 दिन का बच्चा था, जिसे हैदराबाद में ‘रीसेल’ (पुनः विक्रय) के लिए ले जाया जा रहा था।
उनकी गिरफ्तारी ने जांच का दायरा बढ़ाया, जिसके बाद मुख्य आरोपी यूनुस सिंधी को हाल ही में दांता से गिरफ्तार किया गया। पुलिस का मानना है कि यह तो बस शुरुआत है, मामला और भी गहरा हो सकता है।
रंग और लिंग के आधार पर लगती थी बोली
जांच में पता चला कि सिंधी का साथी रमी (जो बनासकांठा का है) उन महिलाओं की पहचान करता था जिन्होंने शादी के बिना बच्चों को जन्म दिया हो। वह मां या उनके रिश्तेदारों को पैसों का लालच देता, बच्चे खरीदता और फिर उन्हें एक बड़े अंतर-राज्यीय नेटवर्क के जरिए हैदराबाद में बेच देता था।
दिल दहला देने वाली बात यह है कि बच्चों की कीमत उनकी त्वचा के रंग और जेंडर के आधार पर तय की जाती थी। गोरे रंग के बच्चों के लिए खरीदार 7 लाख रुपये तक देते थे, जबकि सांवले रंग के बच्चों का सौदा 2 से 3 लाख रुपये में होता था। लड़कियों के मुकाबले लड़कों की कीमत ज्यादा वसूली जाती थी।
रिश्तेदारों ने भी किया सौदा
पुलिस ने बताया कि सिर्फ माता-पिता ही नहीं, बल्कि एक मामले में तो नवजात को उसके दादा-दादी और चाचा-चाची ने ही बेच दिया था। जांच अब पैसों के लेन-देन (मनी ट्रेल) और हैदराबाद में बैठे खरीदारों की पहचान पर केंद्रित है। साथ ही, उन आईवीएफ (IVF) केंद्रों की भूमिका की भी जांच की जा रही है, जिनका इस्तेमाल कथित तौर पर निःसंतान दंपतियों को तस्करों से जोड़ने के लिए किया गया।
अधिकारियों ने चिंता जताते हुए कहा कि इन इलाकों में अस्पतालों, काउंसलिंग और कल्याणकारी योजनाओं की कमी है। अगर सही समय पर मदद मिलती, तो शायद ये परिवार इस दबाव से अलग तरह से निपट सकते थे, लेकिन जागरूकता और कानूनी मदद के अभाव ने उन्हें तस्करों के जाल में धकेल दिया।
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