नई दिल्ली: इतिहास के पन्ने अक्सर युद्धों और संधियों की कहानियों से भरे होते हैं, लेकिन कभी-कभी खाने की मेज भी सत्ता और कूटनीति का सबसे बड़ा गवाह बन जाती है। ऐसी ही एक शाम थी 31 जनवरी, 1897 की। बड़ौदा (वडोदरा) का राजमहल रोशनी से नहाया हुआ था। मेजबान थे बड़ौदा के महाराजा और उनके खास मेहमान थे ग्वालियर के महाराजा सिंधिया।
उस दौर में भले ही भारत पर ब्रिटिश साम्राज्य का सूरज चमक रहा था, लेकिन महलों की चारदीवारी के भीतर भारतीय राजा अपनी शान-ओ-शौकत की परिभाषा खुद गढ़ रहे थे। और उस शाम, यह परिभाषा खाने के जरिए तय की जा रही थी।
हाल ही में उस ऐतिहासिक रात्रिभोज का ‘मेन्यू कार्ड’ एक अमेरिकी आर्काइव (पुरालेख) से बाहर निकलकर दुनिया के सामने आया है। मुगलकालीन दक्षिण एशियाई इतिहास की जानकार और इतिहासकार, नेहा वर्माणी ने अपने शोध के दौरान इसे खोजा और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर साझा किया।
इसके बाद से ही यह मेन्यू चर्चा का विषय बना हुआ है। हैरानी की बात यह नहीं है कि भोजन शाही था—राजाओं से तो इसकी उम्मीद ही की जाती है—बल्कि हैरानी की वजह वह व्यंजन हैं जो उस रात परोसे गए थे।
न मुगलिया अंदाज़, न देसी स्वाद: थाली में था ‘यूरोप’
अगर आप उस शाम के मेन्यू पर नज़र डालें, तो ऐसा लगेगा जैसे आप भारत के किसी रियासती महल में नहीं, बल्कि पेरिस या लंदन के किसी आलीशान रेस्तरां में बैठे हों। यह कोई पारंपरिक मुगलिया दस्तरख्वान नहीं था।
दावत की शुरुआत बादाम कस्टर्ड (Almond Custard) से हुई। इसके बाद मेयोनेज़ सॉस में लिपटी मछली परोसी गई। सूप का दौर आया, तो वह साधारण नहीं था, बल्कि ‘ट्रफल्स’ (एक दुर्लभ मशरूम) की महक से सराबोर चिकन सूप था। इसके बाद इतालवी शैली में बने मटन कटलेट्स और मटर के साथ भुने हुए तीतर (Roasted Partridges) मेज की शान बढ़ा रहे थे।
यहाँ तक कि सब्जियों को भी ‘डेमी-ग्लेस’ (एक तरह की गाढ़ी फ्रेंच ग्रेवी) में तैयार आटिचोक (हाथी चक) के रूप में पेश किया गया। चावल के साथ परोसी गई सब्जी वाली करी का नाम भी फ्रांसीसी अंदाज़ में लिखा गया था। और अंत में, पिस्ता आइसक्रीम और क्रीम से भरे सेबों के साथ इस शानदार दावत का समापन हुआ।
सिर्फ खाना नहीं, यह थी ‘पावर डिप्लोमेसी’
आज की नज़र से देखें तो यह सिर्फ एक विदेशी भोजन लग सकता है, लेकिन 19वीं सदी के अंत में इसका अर्थ गहरा था। यह मेन्यू बताता है कि उस दौर के भारतीय राजा केवल अपनी रियासतों तक सीमित नहीं थे; वे खुद को ‘ग्लोबल एलीट’ यानी वैश्विक कुलीन वर्ग का हिस्सा मानते थे।
उस समय बड़ौदा, ग्वालियर, हैदराबाद, मैसूर और त्रावणकोर जैसी रियासतों के रसोइयों में फ्रांसीसी शेफ काम करते थे। खाने की मेज पर अंग्रेजी शिष्टाचार (Etiquette) का पालन होता था और सामग्री औपनिवेशिक व्यापार मार्गों से मंगवाई जाती थी। मेन्यू कार्ड अक्सर अंग्रेजी और फ्रेंच में छापे जाते थे, जो उनकी आधुनिकता का प्रतीक थे।
बड़ौदा और ग्वालियर के महाराजाओं के बीच का यह भोज इसी बदलाव का गवाह था। फ्रेंच खाना परोसना और उसे समझना उस समय शिक्षा, आधुनिक सोच और दुनिया तक अपनी पहुंच दिखाने का एक जरिया था। यह अपने साथी राजाओं और ब्रिटिश अधिकारियों के सामने अपना रुतबा (Status) कायम करने का एक राजनीतिक तरीका भी था।
इतिहास को देखने का नया नज़रिया
नेहा वर्माणी द्वारा खोजा गया यह दस्तावेज औपनिवेशिक भारत की एक अलग तस्वीर पेश करता है। यह बताता है कि भारतीय शासक केवल मूक दर्शक नहीं थे, बल्कि वे अपनी शर्तों पर संस्कृति और स्वाद के साथ प्रयोग कर रहे थे। 1890 के दशक तक, शाही महलों की रसोई वह जगह बन गई थी जहाँ साम्राज्य, आकांक्षाएं और आत्म-छवि एक साथ पक रही थीं।
1897 का वह शाही दस्तरख्वान आज भी हमें यही याद दिलाता है कि कैसे बदलती दुनिया के बीच भी भारतीय रियासतों ने अपनी एक अलग और आधुनिक पहचान बनाने की कोशिश की थी।
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