भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) ने जब्त किए गए मादक पदार्थों के रखरखाव को लेकर गुजरात के गृह विभाग को कड़ी फटकार लगाई है। कैग ने अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट किया है कि राज्य में एनडीपीएस एक्ट और सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के तहत नशीली दवाओं के उचित भंडारण और उनके त्वरित निपटान की कोई पुख्ता व्यवस्था स्थापित नहीं की गई है।
यह रिपोर्ट मार्च 2024 को समाप्त हुई अवधि के लिए तैयार की गई है, जिसे बजट सत्र के अंतिम दिन बुधवार को विधानसभा में पेश किया गया। इस ऑडिट में फोरेंसिक साइंस लेबोरेटरी (एफएसएल) की रिपोर्ट में दो दशक तक की लंबी देरी और बुनियादी ढांचे की भारी कमी को उजागर किया गया है। यहां तक कि गुजरात एंटी-टेररिस्ट स्क्वॉड (एटीएस) और सीआईडी क्राइम तथा रेलवे जैसी विशेष एजेंसियों के पास भी जब्त मादक पदार्थों को सुरक्षित रखने के लिए सही जगह नहीं है, जिसके कारण पुलिस हिरासत से ही ड्रग्स के चोरी होने और नष्ट होने के मामले सामने आ रहे हैं।
ऑडिट ने अपनी टिप्पणी में इस बात पर जोर दिया है कि ये सभी कमियां कई स्तरों पर कमजोर संस्थागत नियंत्रण और पर्यवेक्षी निगरानी की घोर कमी को दर्शाती हैं।
गांधीनगर स्थित सीआईडी क्राइम और रेलवे के एडीजीपी कार्यालय ने ऑडिटर्स को जानकारी दी कि विभिन्न प्रवर्तन एजेंसियों ने अगस्त 2010 से नवंबर 2022 के बीच 17 मामलों में 6,510.54 किलोग्राम मादक पदार्थ और नियंत्रित पदार्थों की 848 बोतलें जब्त की थीं। कार्यालय ने यह भी दावा किया कि जनवरी 2025 में, उसने अगस्त 2021 से नवंबर 2024 के बीच दर्ज मामलों से संबंधित सभी दवाओं का निपटान कर दिया है।
हालांकि, इस दौरान अक्टूबर 2022 और जुलाई 2023 के बीच नष्ट की गई वास्तविक मात्रा में 35 प्रतिशत का बड़ा अंतर पाया गया, जो कि 4,177.86 किलोग्राम थी। इस गिरावट को लेकर फरवरी 2024 में एडीजीपी कार्यालय ने कई अजीबोगरीब तर्क पेश किए। उन्होंने बताया कि लगभग 144.180 किलोग्राम गांजा चोरी हो गया और भंडारण की उचित सुविधा न होने के कारण कुछ मात्रा चूहों ने नष्ट कर दी। इसके अलावा भांग और अफीम के हरे पौधों के सूखने तथा पोस्त के भूसे में नमी कम होने को भी इस कमी का कारण बताया गया।
इस पर कैग के ऑडिट ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि यद्यपि ये प्राकृतिक कारण नष्ट की गई मात्रा में कमी की कुछ हद तक व्याख्या कर सकते हैं, लेकिन 35% का कुल अंतर भंडारण और निपटान सुविधाओं की तत्काल समीक्षा की मांग करता है। जांच में यह भी पाया गया कि एक मामले में मजिस्ट्रेट को आवेदन देने की तारीख ही रिकॉर्ड में उपलब्ध नहीं थी। वहीं 36 अन्य मामलों में एफएसएल रिपोर्ट मिलने के 34 से लेकर 2,816 दिनों (6 वर्ष) के बाद आवेदन किया गया, जबकि इसके लिए 30 दिनों की समय सीमा निर्धारित है, जो सीधे तौर पर संबंधित कार्यालयों की लापरवाही को दर्शाता है।
सीआईडी द्वारा दिए गए वाष्पीकरण और मौसम के स्पष्टीकरण पर ऑडिट ने अविश्वास जताया। रिपोर्ट के अनुसार गृह विभाग न तो चोरी और नष्ट होने से बचाने के लिए उचित भंडारण सुविधाएं बना सका और न ही जब्त ड्रग्स का समय पर निपटान कर सका। जब्त किए गए और नष्ट किए गए मादक पदार्थों के बीच का अंतर 11.99% से 93.201% तक दर्ज किया गया। वजन कम होने की कोई विशिष्ट गाइडलाइन न होने के कारण विभाग के इस तर्क को अनुचित माना गया।
अप्रैल 2016 से मार्च 2023 की अवधि के लिए एसीएस गृह विभाग का ऑडिट नवंबर 2023 और फरवरी 2024 के बीच किया गया था। इस जांच में सामने आया कि एडीजीपी एटीएस के कार्यालय ने फरवरी 2016 और फरवरी 2023 के बीच 33 मामलों में 2,968.476 किलोग्राम मादक पदार्थ जब्त किए थे। इनमें से 2019 और 2022 के बीच जब्त किया गया 650.582 किलोग्राम ड्रग्स फरवरी 2024 तक निपटाया नहीं जा सका था। सबसे बड़ी लापरवाही यह थी कि इन नशीले पदार्थों को डबल लॉकिंग सिस्टम वाले सेफ या वॉल्ट के बजाय सामान्य कमरों में रखा गया था, जिससे उन पर चोरी का खतरा हमेशा बना रहता है।
भरूच जिले के आंकड़ों ने पूरी व्यवस्था की सबसे दयनीय तस्वीर पेश की है। अप्रैल 2025 तक, भरूच पुलिस द्वारा 1995 से मार्च 2024 के बीच मादक पदार्थों की जब्ती के कुल 148 मामले दर्ज किए गए थे। इनमें से 41 मामलों में अप्रैल 2025 तक दवाओं का निपटान किया जा चुका था। भरूच एसपी कार्यालय ने बचे हुए 107 में से 33 मामलों की स्थिति का विवरण ऑडिट टीम को सौंपा।
ऑडिट के विश्लेषण में पाया गया कि 1995 से मार्च 2024 के बीच भरूच के नौ पुलिस स्टेशनों में 788.656 किलोग्राम ड्रग्स और 22 बोतलें जब्त की गई थीं। लेकिन अप्रैल 2025 के आंकड़ों के अनुसार, जब्ती के 19 से 21 साल बीत जाने के बाद भी केवल दो मामलों में महज सात किलोग्राम ड्रग्स का ही दिसंबर 2024 तक निपटान किया गया। इस तरह जब्ती के बाद एक से 30 साल का लंबा समय बीत जाने के बावजूद 31 मामले बिना किसी फैसले के लटके रहे।
आगे की जांच में यह भी सामने आया कि तीन मामलों में पुलिस स्टेशन को 24.550 किलोग्राम चरस या गांजे के ठिकाने की कोई जानकारी ही नहीं थी। वहीं 12 मामलों में एक से 23 साल का वक्त गुजर जाने के बाद भी एफएसएल की रिपोर्ट लंबित पड़ी थी। इसी वजह से अप्रैल 2025 तक ड्रग्स के निपटान के लिए मजिस्ट्रेट को आवेदन तक नहीं किया जा सका था। 20.961 किलोग्राम गांजे के एक अन्य मामले में तो एफएसएल रिपोर्ट मिलने के 17 महीने बाद भी निपटान के लिए आवेदन नहीं दिया गया।
रिपोर्ट में विस्तार से बताया गया है कि 13 मामलों में मजिस्ट्रेट के समक्ष आवेदन एफएसएल रिपोर्ट के एक महीने से अधिक समय बीत जाने के बाद जुलाई 2024 से फरवरी 2025 के बीच किए गए। यह देरी एक से 63 महीने तक की थी और ये आवेदन भी तभी किए गए जब मई 2023 में ऑडिट टीम ने इस मुद्दे को उठाया।
इसके अलावा नवंबर 2013 में जब्त किया गया लगभग 515 किलोग्राम गांजा पुलिस स्टेशन के ‘मुद्दमाल’ (सबूत) कक्ष में रखा गया था, क्योंकि वहां कोई सेफ या वॉल्ट नहीं था और इसकी फोरेंसिक रिपोर्ट अप्रैल 2025 तक लंबित थी।
गुजरात में दवाओं के भंडारण और निपटान की इस खस्ताहाल स्थिति पर ऑडिट ने अपनी कड़ी टिप्पणी दर्ज की है। रिपोर्ट के अनुसार इस तरह की कमियां आपराधिक न्याय प्रक्रिया की अखंडता से सीधा समझौता करती हैं और इन दवाओं के अवैध रास्तों से वापस बाजार में जाने का जोखिम बढ़ाती हैं। यह सार्वजनिक धन और लोगों की सुरक्षा दोनों के लिए एक निरंतर खतरा है।
इतनी गंभीर खामियों के बावजूद गृह विभाग ने कैग को कोई संतोषजनक जवाब नहीं दिया। रिपोर्ट में बताया गया है कि विभाग को जुलाई 2025 में सूचित किया गया था और सितंबर तथा अक्टूबर 2025 में लगातार रिमाइंडर भी भेजे गए, इसके बावजूद नवंबर 2025 तक उनकी प्रतिक्रिया का केवल इंतजार ही किया जा रहा था।
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