साल 1962 में जब रिलीफ रोड पर कैलिको डोम का निर्माण हुआ, तो यह सिर्फ एक छत नहीं थी। यह इस बात का प्रमाण था कि बिना किसी खंभे या भारी-भरकम ढांचे के, केवल ज्यामिति (ज्योमेट्री) के दम पर एक इमारत खड़ी रह सकती है। आज, छह दशक बाद, यह ऐतिहासिक गुंबद एक नई बहस के केंद्र में आ गया है।
सवाल यह उठ रहा है कि क्या इसके जीर्णोद्धार (रेस्टोरेशन) की प्रक्रिया इसके उस मूल ढांचे को ही नष्ट कर रही है, जिस पर यह टिका हुआ है।
भारत के पहले प्रयोगात्मक जिओडेसिक ढांचे के रूप में पहचाने जाने वाले इस गुंबद के चल रहे जीर्णोद्धार पर गंभीर सवाल उठे हैं। जानकारी के अनुसार, अहमदाबाद नगर निगम (AMC) 15 पन्नों के एक तकनीकी डॉजियर (रिपोर्ट) की समीक्षा कर रहा है, जिसमें कई खामियां गिनाई गई हैं। एएमसी के वरिष्ठ अधिकारियों का कहना है कि इन निष्कर्षों की जांच की जा रही है और सुधार के लिए बातचीत के दरवाजे खुले हैं।
इस डोम का इतिहास काफी दिलचस्प है। इसे कैलिको मिल्स के लिए एक प्रदर्शनी स्थल के रूप में बनाया गया था। इसके निर्माण की सोच मिल्स के तत्कालीन अध्यक्ष गौतम साराभाई और नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ डिजाइन (NID) की सह-संस्थापक उनकी बहन गिरा साराभाई की थी।
दिलचस्प बात यह है कि इसी जगह पर अहमदाबाद की पहली गगनचुंबी इमारत बनने वाली थी, लेकिन नगर पालिका ने उस प्रस्ताव को खारिज कर दिया और फिर इस प्रतिष्ठित गुंबद का निर्माण हुआ।
इस ढांचे का डिज़ाइन अमेरिकी वास्तुकार और भविष्यवादी बकमिंस्टर फुलर के विचारों से प्रेरित था, जिन्हें जिओडेसिक डोम का आविष्कारक माना जाता है। यह डोम 380 डायमंड के आकार वाले प्लाईवुड पैनलों से बना एक हल्का और अपने आप में टिका हुआ शेल (खोल) है। इसे बिना किसी बाहरी सहारे के सिर्फ ज्यामितीय सटीकता के आधार पर जोड़ा गया था।

विवाद तब शुरू हुआ जब नियुक्त प्रोजेक्ट मैनेजमेंट कंसल्टेंट ‘वडोदरा डिजाइन एकेडमी’ की जानकारी या मंजूरी के बिना ही निर्माण कार्य शुरू कर दिया गया। इसके बाद 24 मार्च को साइट के निरीक्षण के आदेश दिए गए। इसी जांच के बाद 15 पन्नों की रिपोर्ट सामने आई और जीर्णोद्धार कार्य पर तत्काल रोक लगाने की मांग की गई।
रिपोर्ट में कई गंभीर आरोप लगाए गए हैं। ऐसा कहा गया है कि किसी ने नियुक्त विशेषज्ञों की जगह एक अनधिकृत सलाहकार को रख लिया और बिना मंजूरी के नए नक्शों (ड्राइंग) का इस्तेमाल शुरू कर दिया।
डोम के जॉइंट्स को सुरक्षित रखने वाले रबर गास्केट और स्ट्रक्चरल स्लीव्स का उपयोग ही नहीं किया गया है। सबसे ऊपरी हिस्सा, जो पूरे ढांचे को लॉक करता है (एपेक्स कैप), वह भी गायब है। रिपोर्ट के मुताबिक, इसके बिना यह ढांचा अधूरा और कमजोर है।
सामने आई जानकारी के अनुसार, रिपोर्ट में डोम के ऊपर एक स्टील पाइप फ्रेमवर्क लगाने के प्रस्ताव पर भी सवाल उठाया गया है। यह तर्क दिया गया है कि इस तरह का कोई भी बाहरी हस्तक्षेप एक सेल्फ-सपोर्टिंग (स्वयं-समर्थित) ढांचे के मूल सिद्धांत के बिल्कुल विपरीत है।
कैलिको मिल्स के लिक्विडेशन (दिवालियापन) के बाद, गुजरात उच्च न्यायालय के निर्देश पर 2009 में यह गुंबद एएमसी के अधिकार में आ गया। इससे पहले यह ढांचा दशकों की उपेक्षा, 2001 के भूकंप में आंशिक पतन और 2003 में मानसून के कारण हुए नुकसान को झेल चुका था। एएमसी ने इसे एक औद्योगिक विरासत स्थल के रूप में संरक्षित करने के लक्ष्य के साथ अपने हाथ में लिया था।
अधिकारियों का स्पष्ट कहना है कि यह निरीक्षण एएमसी ने अपनी पहल पर किया था। उनका उद्देश्य यह समझना था कि चल रहा काम मूल डिजाइन के अनुरूप है या नहीं। यदि कोई विचलन पाया जाता है, तो उस पर चर्चा करके सुधार किया जाएगा।
इस गुंबद की ताकत इसके भारीपन या खंभों में नहीं, बल्कि इसके घुमाव (कर्व) में है। इसे इस तरह डिजाइन किया गया था कि वजन पूरी सतह पर समान रूप से बंटे। जानकारी रखने वाले एक अधिकारी ने इसे अंडे के छिलके की तरह बताया है—हल्का, खोखला, लेकिन जब बल सही ढंग से काम करते हैं तो यह अविश्वसनीय रूप से मजबूत होता है।
यह पूरा विज्ञान निरंतरता पर निर्भर करता है। बीच में कोई भी रुकावट, बाहरी सपोर्ट, असमान मोटाई या घुमाव में बदलाव इसके संतुलन को बिगाड़ सकता है। ऐसा होने पर तनाव उन जगहों पर पड़ने लगेगा जो इसके लिए नहीं बने हैं। इस डिजाइन को समझने वाले इंजीनियरों का कहना है कि साराभाई ने जानबूझकर इसमें लोहे या अन्य वजन उठाने वाले तत्वों का कम से कम इस्तेमाल किया था।
जीर्णोद्धार का मतलब ही ढांचे में हस्तक्षेप होता है। लेकिन इतने सटीक ढांचे के साथ, छोटे बदलावों के भी बड़े परिणाम हो सकते हैं। अगर गलत जगह पर कठोरता जोड़ी गई, या यह शेल एक सतत सतह के रूप में काम नहीं कर पाया, तो नुकसान भले ही तुरंत न दिखे, लेकिन भविष्य में इसका असर जरूर पड़ेगा।
आलोचकों का कहना है कि रिपोर्ट में कमियां तो बताई गई हैं, लेकिन उन्हें ठीक करने का तरीका स्पष्ट नहीं किया गया है। एएमसी ने इस बात से इनकार नहीं किया है और प्रशासन सकारात्मक बातचीत के लिए पूरी तरह तैयार है।
अधिकारियों ने स्पष्ट किया है कि यदि विशेषज्ञ मूल डिजाइन का सम्मान करते हुए इस प्रोजेक्ट को सही दिशा देने में मदद करने के लिए आगे आते हैं, तो नगर निगम उनकी सुनने को तैयार है। उनका मानना है कि कोई भी बदलाव ढांचे के हित में होना चाहिए, न कि उसके खिलाफ।
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