नई दिल्ली: भारत में बच्चों के बीच मोटापे की समस्या एक गंभीर रूप ले चुकी है। एक नई वैश्विक रिपोर्ट के अनुसार, अधिक वजन से प्रभावित बच्चों की सबसे अधिक संख्या वाले दुनिया के शीर्ष तीन देशों में भारत भी शामिल हो गया है। ‘वर्ल्ड ओबेसिटी एटलस 2026’ के ताजा आंकड़ों के मुताबिक, देश में 5 से 19 वर्ष की आयु के लगभग 41 मिलियन (4.1 करोड़) बच्चों का बॉडी मास इंडेक्स (BMI) काफी अधिक है। इनमें से करीब 14 मिलियन (1.4 करोड़) बच्चे मोटापे का शिकार हैं।
इस रिपोर्ट से यह बात सामने आई है कि वैश्विक स्तर पर मोटापे की समस्या में भारत, चीन और अमेरिका की हिस्सेदारी सबसे ज्यादा है। यह आंकड़े इस बात की भी गवाही देते हैं कि हमारा देश अब कुपोषण के साथ-साथ बच्चों में तेजी से बढ़ते मोटापे की दोहरी चुनौती का सामना कर रहा है। दुनिया भर में बच्चों के मोटापे में भारी उछाल देखा गया है। साल 1975 में यह दर लगभग 4 प्रतिशत थी, जो हाल के वर्षों में बढ़कर करीब 20 प्रतिशत तक पहुंच गई है।
स्वास्थ्य के क्षेत्र में यह एक बहुत बड़ा बदलाव है। इतिहास में पहली बार ऐसा होने जा रहा है जब दुनिया भर में कम वजन वाले बच्चों की तुलना में मोटापे से ग्रस्त बच्चों की संख्या अधिक होगी।
हालांकि कई देशों ने इस समस्या से निपटने के लिए कदम उठाए हैं, लेकिन रिपोर्ट चेतावनी देती है कि ये प्रयास संकट के पैमाने को देखते हुए नाकाफी हैं। इस समस्या को हल करने के लिए खाद्य पदार्थों के नियमों को सख्त करने, शारीरिक गतिविधियों को बढ़ावा देने और बेहतर स्वास्थ्य देखभाल तक पहुंच सुनिश्चित करने की तत्काल आवश्यकता है।
स्वास्थ्य विशेषज्ञ इस स्थिति को केवल शारीरिक बनावट का मामला नहीं, बल्कि एक बेहद गंभीर स्वास्थ्य चिंता मानते हैं। अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS) के एंडोक्रिनोलॉजी विभाग के प्रोफेसर डॉ. राजेश खड़गावत बताते हैं कि बच्चों में मोटापा उनके आहार और शारीरिक गतिविधियों के बीच असंतुलन का सीधा परिणाम है। आज के बच्चे जरूरत से ज्यादा कैलोरी ले रहे हैं और शारीरिक श्रम बहुत कम कर रहे हैं।
डॉ. खड़गावत के अनुसार, यह कोई कॉस्मेटिक समस्या नहीं है, बल्कि एक ऐसी बीमारी है जो भविष्य में मधुमेह, हृदय रोग और जीवनशैली से जुड़ी अन्य गंभीर बीमारियों का जोखिम बढ़ाती है।
बच्चों में इस बढ़ती प्रवृत्ति के पीछे आसानी से मिलने वाले उच्च-कैलोरी वाले खाद्य पदार्थ, मीठे पेय और अत्यधिक प्रसंस्कृत (ultra-processed) उत्पाद मुख्य रूप से जिम्मेदार हैं। इसके साथ ही बच्चों की कम होती शारीरिक गतिविधियां और स्क्रीन पर बिताया जाने वाला बढ़ता समय भी इसे और खतरनाक बना रहा है।
शहरी जीवनशैली, खेलने के लिए खुले मैदानों की कमी और डिजिटल उपकरणों पर बढ़ती निर्भरता ने हालात को और बिगाड़ दिया है। चिंताजनक बात यह है कि यह चलन पांच साल से कम उम्र के छोटे बच्चों में भी देखने को मिल रहा है।
विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि बचपन का यह मोटापा अक्सर वयस्क होने पर भी बना रहता है, जिससे लंबे समय के स्वास्थ्य जोखिम तो बढ़ते ही हैं, साथ ही भविष्य में गैर-संचारी रोगों (non-communicable diseases) का बोझ भी देश पर काफी बढ़ जाता है।
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