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दिल्ली हाईकोर्ट का फैसला: बच्चे से प्राइवेट पार्ट टच कराना ‘गंभीर यौन हमला’, POCSO एक्ट के तहत दोषी की सजा बरकरार

| Updated: January 6, 2026 14:20

जस्टिस नीना बंसल कृष्णा का अहम फैसला: बच्चे की गवाही में मामूली अंतर से आरोपी बरी नहीं हो सकता, 7 साल की सजा बरकरार

नई दिल्ली: दिल्ली उच्च न्यायालय ने बच्चों के खिलाफ होने वाले अपराधों पर कड़ा रुख अपनाते हुए एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि यदि कोई व्यक्ति यौन मंशा के साथ किसी नाबालिग बच्चे से अपना प्राइवेट पार्ट (गुप्त अंग) स्पर्श करवाता है, तो यह पोक्सो (POCSO) अधिनियम, 2012 के तहत ‘गंभीर यौन हमले’ (Aggravated Sexual Assault) की श्रेणी में आएगा।

जस्टिस नीना बंसल कृष्णा की पीठ ने धर्मेंद्र कुमार बनाम राज्य (Dharmendra Kumar vs. State) मामले की सुनवाई करते हुए यह व्यवस्था दी। कोर्ट ने उस व्यक्ति की दोषसिद्धि को बरकरार रखा, जिसने एक तीन साल की बच्ची के साथ यह घिनौनी हरकत की थी।

क्या है पूरा मामला?

यह घटना साल 2022 की है। मामले के अनुसार, एक तीन साल की बच्ची ने अपनी मां को बताया कि उनकी बिल्डिंग में रहने वाले एक किरायेदार ने उसे अपना प्राइवेट पार्ट दिखाया और उसे छूने के लिए मजबूर किया। बच्ची की बात सुनकर मां ने तुरंत पुलिस में आपराधिक मामला दर्ज करवाया।

निचली अदालत (ट्रायल कोर्ट) ने सुनवाई के बाद आरोपी को भारतीय दंड संहिता (IPC) और पोक्सो एक्ट के तहत दोषी करार देते हुए सात साल की कैद की सजा सुनाई थी। इसके बाद, दोषी (अपीलकर्ता) ने अपनी सजा को चुनौती देते हुए दिल्ली हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।

दोषी की दलील और कोर्ट का जवाब

हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान अपीलकर्ता ने तर्क दिया कि बच्ची के बयानों में विरोधाभास है। उसने कहा कि बच्ची ने पहले सिर्फ गलत तरीके से छूने की बात कही थी, लेकिन बाद में अपने बयान को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया। दोषी ने दावा किया कि बयानों में इस तरह के बदलाव बच्ची की गवाही को अविश्वसनीय बनाते हैं।

हालांकि, जस्टिस नीना बंसल कृष्णा ने इस दलील को सिरे से खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि पीड़ित की कम उम्र को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

कोर्ट ने अपनी टिप्पणी में कहा, “घटना के समय पीड़िता की उम्र महज 3 साल 11 महीने थी और उसकी गवाही लगभग एक साल बाद दर्ज की गई, जब वह करीब 5 साल की थी। इतनी कम उम्र के बच्चे की शब्दावली बहुत सीमित होती है। बयानों में अभिव्यक्ति का मामूली अंतर गवाह की विश्वसनीयता को प्रभावित नहीं करता है। मुख्य आरोप यह है कि उसके साथ यौन हमला हुआ है और वह अपनी बात पर कायम रही है।”

अदालत ने यह भी माना कि मां की गवाही और पुलिस को दिए गए बयान बच्ची के आरोपों की पुष्टि करते हैं।

शराब के नशे में था आरोपी

अदालत ने यह भी पाया कि घटना के समय आरोपी नशे की हालत में था, जैसा कि शिकायत में आरोप लगाया गया था। यह परिस्थिति उस माहौल को स्पष्ट करती है जिसके कारण यह यौन हमला हुआ। दूसरी ओर, कोर्ट ने पाया कि आरोपी के अपने बयानों में ही असंगति थी, जो उसके बचाव को झूठा साबित करती है।

फैसले का निष्कर्ष

हाईकोर्ट ने माना कि ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को पोक्सो एक्ट की धारा 10 (गंभीर यौन हमला) के तहत सही दोषी ठहराया है। कोर्ट ने कहा, “यौन इरादे से छोटे बच्चे से प्राइवेट पार्ट टच कराना गंभीर यौन हमला है।”

हालांकि, हाईकोर्ट ने एक तकनीकी आधार पर आईपीसी की धारा 354 (महिला की लज्जा भंग करना), 354A (यौन उत्पीड़न) और 354B के तहत दी गई सजा को रद्द कर दिया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि चूंकि ट्रायल कोर्ट ने इन धाराओं के तहत औपचारिक रूप से आरोप तय नहीं किए थे, इसलिए इनके तहत सजा नहीं दी जा सकती। लेकिन, पोक्सो एक्ट के तहत उसकी सजा और दोषसिद्धि कायम रहेगी।

कोर्ट में किसने रखा पक्ष?

इस मामले में अपीलकर्ता (दोषी) की ओर से वकील प्रतीक कुमार, अंकिता, प्रशांत कुमार शर्मा और चेतन चरित्र पेश हुए। वहीं, राज्य सरकार का पक्ष लोक अभियोजक उत्कर्ष ने रखा। शिकायतकर्ता की ओर से वकील तान्या अग्रवाल और कृष्ण कुमार केशव ने पैरवी की।

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