मुंबई: महाराष्ट्र में भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने एक बार फिर अपनी राजनीतिक ताकत का लोहा मनवाया है। राज्य की 29 नगर निगमों में से 19 में सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरना कोई छोटी उपलब्धि नहीं है। इसमें मुंबई की प्रतिष्ठित बीएमसी (BMC) भी शामिल है, जिसे जीतना हर पार्टी का सपना होता है। शुक्रवार को जैसे ही नतीजों की तस्वीर साफ हुई, पार्टी के गलियारों में एक ही नाम गूंजने लगा—मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस।
अंदरूनी सूत्रों का कहना है कि इस शानदार जीत के असली नायक फडणवीस ही हैं, जिन्होंने मोर्चा संभालते हुए चुनाव प्रचार का पूरा भार अपने कंधों पर उठाया।
राज्य के सियासी दिग्गजों के बीच सीएम फडणवीस सबसे बड़े विजेता बनकर उभरे हैं। मुंबई में बीजेपी ने अपने 2017 के प्रदर्शन (82 सीटें) को पीछे छोड़ते हुए नया रिकॉर्ड कायम किया है। पार्टी पदाधिकारियों का मानना है कि यह सफलता रातों-रात नहीं मिली, बल्कि इसके पीछे फडणवीस की सूक्ष्म योजना और वार्ड स्तर पर किए गए लगातार काम का हाथ है। उन्होंने बीएमसी चुनाव की रणनीति तैयार करने में व्यक्तिगत रुचि ली थी।
जीत के बाद फडणवीस का संदेश
जीत के बाद प्रदेश मुख्यालय में कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए फडणवीस ने कहा, “बीजेपी ने जनता के सामने विकास का एजेंडा रखा और लोगों ने उस पर अपनी मुहर लगाई है। कई नगर निगमों में हमें रिकॉर्ड तोड़ जनादेश मिला है, जो साबित करता है कि जनता ईमानदारी और विकास को प्राथमिकता देती है। यही वजह है कि लोगों ने बीजेपी को चुना।”
शिवसेना के संस्थापक बाल ठाकरे की विरासत पर दावा करते हुए सीएम ने कहा कि ‘बालासाहेब के आशीर्वाद’ की बदौलत ही सत्ताधारी पार्टी और एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना को यह जीत मिली है। गौरतलब है कि मुंबई में बीजेपी और शिंदे गुट का मुख्य मुकाबला बालासाहेब के बेटे उद्धव ठाकरे और उनकी पार्टी शिवसेना (यूबीटी) से था।
फडणवीस ने आगे कहा, “यह फैसला प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बीजेपी गठबंधन की नीतियों में महाराष्ट्र की जनता के अटूट विश्वास का प्रतीक है।”
स्थानीय मुद्दों और जमीनी पकड़ पर जोर
मुंबई बीजेपी के नेताओं के मुताबिक, सीएम की रणनीति स्पष्ट थी—ऐसे उम्मीदवारों को चुनना जिनकी स्थानीय स्तर पर पकड़ मजबूत हो। साथ ही, उन्होंने पूरे अभियान को भावनात्मक मुद्दों के बजाय सड़क, सफाई और बुनियादी ढांचे जैसे नागरिक मुद्दों पर केंद्रित रखा।
इस सधी हुई चाल ने उन इलाकों के वोटरों को भी अपनी ओर खींचा जहां शिवसेना (यूबीटी) का आधार कमजोर पड़ गया था। नतीजे बताते हैं कि मतदाताओं ने उस पार्टी का साथ दिया जो स्थिर, संगठित और शहर को चलाने में सक्षम नजर आई।
अमित शाह का ‘शत-प्रतिशत’ मंत्र और बीजेपी की रणनीति
बीजेपी के इस वर्चस्व की पटकथा बेहद बारीकी से लिखी गई थी। इसके केंद्र में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह का “शत-प्रतिशत बीजेपी” का लक्ष्य था, जो महाराष्ट्र की राजनीति में पार्टी के विस्तारवादी मंसूबों को दर्शाता है।
इस लक्ष्य को हासिल करना आसान नहीं था। राज्य के जटिल राजनीतिक समीकरणों और गठबंधन सहयोगियों के साथ स्थानीय हितों के टकराव को साधना बड़ी चुनौती थी। शिंदे गुट के साथ जमीनी नेताओं को अपने पाले में करने को लेकर कई बार तनातनी भी हुई, लेकिन हर बार फडणवीस ने हस्तक्षेप कर गठबंधन की नैया को डूबने से बचाया।
फडणवीस ने स्थानीय चुनावों को भी विधानसभा या लोकसभा चुनाव जैसी गंभीरता से लिया। उन्होंने हर दिन कई रैलियां कीं और एक जिले से दूसरे जिले का तूफानी दौरा किया, जिसमें सुशासन और विकास ही उनका मुख्य हथियार रहा।
रणनीतिक दांव: मोदी-शाह को रखा दूर
एक वरिष्ठ बीजेपी पदाधिकारी ने बताया, “फडणवीस ने जिम्मेदारी अपने कंधों पर लेने का जोखिम उठाया। वे जानते थे कि उद्धव और राज ठाकरे के साथ आने से ‘मराठी अस्मिता’ का भावनात्मक मुद्दा उछल सकता है। इसलिए, एक सोची-समझी रणनीति के तहत पीएम नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह या यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ जैसे केंद्रीय नेताओं को मुंबई में प्रचार के लिए नहीं बुलाया गया। यह ठाकरे को ‘गुजरात विरोधी’ या ‘उत्तर भारत विरोधी’ अभियान चलाने का मौका न देने का एक टेक्टिकल मूव था।”
विपक्ष में सेंधमारी और बहुकोणीय मुकाबला
प्रदेश अध्यक्ष रवींद्र चव्हाण की देखरेख में पार्टी ने विस्तार अभियान चलाया। बीजेपी ने विपक्ष के जिताऊ उम्मीदवारों के लिए अपने दरवाजे खोल दिए। ‘तोड़-फोड़ की राजनीति’ का यह फार्मूला पहले राज्य स्तर पर शिवसेना और एनसीपी को तोड़ने में सफल रहा था, और अब इसे तालुका स्तर पर भी अपनाया गया। इससे विपक्षी खेमे कमजोर हुए।
इसके अलावा, बहुकोणीय मुकाबलों (multi-cornered contests) ने भी बीजेपी की राह आसान की। संसाधनों और मैनपावर में बीजेपी अपने विरोधियों से कहीं आगे थी, जिससे वह मतभेदों से पार पाने में सफल रही।
जहां शिवसेना (यूबीटी) ने मनसे (MNS) के साथ हाथ मिलाया, वहीं कांग्रेस ने वंचित बहुजन अघाड़ी के साथ गठबंधन किया। इसी तरह, अजित पवार की एनसीपी ने दो निकायों में शरद पवार की एनसीपी (एसपी) के साथ तालमेल किया। इस बिखराव ने किसी भी बड़े बीजेपी-विरोधी गठबंधन को बनने ही नहीं दिया।
हिंदुत्व का समावेशी कार्ड
अंत में, बीएमसी में ठाकरे बंधुओं की ‘मराठी अस्मिता’ की काट के लिए बीजेपी और फडणवीस ने बहुत चतुराई से हिंदुत्व के मुद्दे को आगे बढ़ाया। उनका मानना था कि यह जाति और समुदाय की दीवारों को तोड़ देगा। इस रणनीति ने न केवल मुंबई में, बल्कि नासिक, धुले, छत्रपति संभाजीनगर, अकोला और नांदेड़ जैसे शहरों में भी हिंदू वोटों को एकजुट किया, जहां अल्पसंख्यक आबादी भी काफी संख्या में है।
अपने विजय भाषण में फडणवीस ने इसका जिक्र करते हुए कहा, “हमारा एजेंडा हमेशा विकास रहेगा और हम इस जीत का उपयोग लोगों के जीवन को बदलने के लिए करेंगे। हिंदुत्व हमेशा हमारी आत्मा रहा है और कोई भी हमारे हिंदुत्व को विकास से अलग नहीं कर सकता। हमारा हिंदुत्व समावेशी है।”
यह भी पढ़ें-









