नई दिल्ली: सोमवार को लोकसभा की कार्यवाही के दौरान उस समय भारी हंगामा देखने को मिला, जब विपक्ष के नेता (LoP) राहुल गांधी को पूर्व सेना प्रमुख जनरल एम.एम. नरवणे के अप्रकाशित संस्मरण (Memoir) का हवाला देने से रोक दिया गया। सरकार ने संसदीय नियमों का हवाला देते हुए इसे अस्वीकार्य बताया, जिसके बाद सदन में तीखी नोकझोंक हुई।
यह पूरा विवाद जनरल नरवणे की आगामी पुस्तक ‘फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी’ (Four Stars of Destiny) के इर्द-गिर्द घूमता है। राहुल गांधी, भाजपा सांसद तेजस्वी सूर्या द्वारा कांग्रेस की “देशभक्ति पर सवाल उठाने” का जवाब दे रहे थे।
इस दौरान वे ‘द कारवां’ पत्रिका में छपे एक लेख के जरिए जनरल नरवणे की किताब के अंश पढ़ना चाहते थे, जिसमें 2019 से 2022 तक सेना प्रमुख रहे जनरल ने पूर्वी लद्दाख में चीन के साथ हुए तनावपूर्ण क्षणों का जिक्र किया है।
किताब पर ‘समीक्षा’ का पहरा
जनवरी 2024 में इस किताब को बाजार में आना था, लेकिन रिपोर्टों के मुताबिक, इसे भारतीय सेना द्वारा समीक्षा (Review) के लिए रोक दिया गया। प्रकाशक ‘पेंगुइन रैंडम हाउस’ को निर्देश दिए गए थे कि जब तक समीक्षा पूरी नहीं हो जाती, तब तक किताब के अंश या सॉफ्ट कॉपी साझा न की जाए। माना जा रहा है कि रक्षा मंत्रालय भी इस प्रक्रिया में शामिल है।
तब से लेकर अब तक, प्रकाशक, लेखक या रक्षा मंत्रालय की ओर से किताब की स्थिति पर कोई आधिकारिक बयान नहीं आया है। यह संस्मरण फिलहाल प्रकाशन की अनुमति के इंतजार में अटका हुआ है।
31 अगस्त, 2020 की वो तनावपूर्ण रात: क्या हुआ था?
दिसंबर 2023 में समाचार एजेंसी पीटीआई ने इस संस्मरण के कुछ अंश प्रकाशित किए थे, जिससे उस रात की गंभीरता का पता चलता है। जनरल नरवणे ने अपनी किताब में 31 अगस्त, 2020 की रात रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के साथ हुए संवाद का विस्तार से वर्णन किया है। यह वह समय था जब पूर्वी लद्दाख में वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर रेचिन ला (Rechin La) के पास चीनी पीएलए के टैंक और सैनिक आगे बढ़ रहे थे।
जनरल नरवणे लिखते हैं कि सबसे पहले उनके पास उत्तरी कमान के प्रमुख, लेफ्टिनेंट जनरल वाई.के. जोशी का फोन आया।
उन्होंने लिखा, “31 अगस्त की शाम 20:15 बजे, जो (लेफ्टिनेंट जनरल जोशी) ने मुझे फोन किया, वे काफी चिंतित थे। उन्होंने बताया कि इन्फैंट्री के समर्थन के साथ चार टैंक धीरे-धीरे ट्रैक पर रेचिन ला की ओर बढ़ने लगे हैं… उन्होंने एक इल्युमिनेटिंग राउंड (रोशनी वाला गोला) फायर किया था, लेकिन इसका कोई असर नहीं हुआ। मेरे पास स्पष्ट आदेश थे कि जब तक ‘ऊपर से मंजूरी’ न मिल जाए, तब तक फायर नहीं खोलना है।”
“मेरे लिए क्या आदेश हैं?”
इसके बाद, जनरल नरवणे ने रक्षा मंत्री, विदेश मंत्री एस. जयशंकर, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSA) अजीत डोभाल और चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (CDS) जनरल बिपिन रावत को फोन किया। नरवणे लिखते हैं, “हर किसी से मेरा एक ही सवाल था, ‘मेरे लिए क्या आदेश हैं?’ रात 21:10 बजे, उत्तरी कमान का फिर फोन आया, टैंक लगातार आगे बढ़ रहे थे और अब चोटी से एक किलोमीटर से भी कम दूरी पर थे।”
उन्होंने आगे लिखा, “मैंने 21:25 बजे रक्षा मंत्री (RM) को फिर फोन किया, उन्हें ताज़ा हालात बताए और एक बार फिर स्पष्ट निर्देशों की मांग की। स्थिति बेहद तनावपूर्ण थी। टेलीफोन की लाइनें लगातार बज रही थीं।”
इसी बीच, हॉटलाइन पर संदेशों का आदान-प्रदान हुआ और पीएलए कमांडर, मेजर जनरल लियू लिन ने सुझाव दिया कि दोनों पक्षों को आगे की गतिविधियों को रोक देना चाहिए और दोनों स्थानीय कमांडरों को अगली सुबह 9:30 बजे पास पर मिलना चाहिए। जनरल नरवणे ने रात 10 बजे रक्षा मंत्री और एनएसए डोभाल को यह जानकारी दी।
जब सिर्फ 500 मीटर दूर रह गए थे टैंक
तनाव कम होने का नाम नहीं ले रहा था। जनरल नरवणे लिखते हैं, “मैंने अभी फोन रखा ही था कि 22:10 बजे ‘जो’ (जोशी) का फिर फोन आया। उन्होंने कहा कि टैंक फिर से आगे बढ़ने लगे हैं और अब केवल 500 मीटर दूर हैं।”
“मैंने रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह को स्थिति की गंभीरता से अवगत कराया, जिस पर उन्होंने कहा कि वे मुझे वापस कॉल करेंगे। उन्होंने लगभग 22:30 बजे मुझे वापस फोन किया।”
“जो उचित समझो, वो करो”
रक्षा मंत्री के साथ उस आखिरी कॉल का जिक्र करते हुए पूर्व सेना प्रमुख ने लिखा: “उन्होंने कहा कि उन्होंने प्रधानमंत्री से बात कर ली है और यह पूरी तरह से एक सैन्य निर्णय है। ‘जो उचित समझो वो करो’। मुझे एक ‘हॉट पोटैटो’ (बेहद कठिन और जोखिम भरी स्थिति) थमा दिया गया था। इस ‘कार्ट ब्लैंच’ (पूरी छूट) के साथ, अब सारी जिम्मेदारी पूरी तरह मुझ पर थी। मैंने एक गहरी सांस ली और कुछ मिनटों तक चुपचाप बैठा रहा। दीवार घड़ी की टिक-टिक के अलावा सब कुछ शांत था।”
गौरतलब है कि भारत और चीन के बीच यह सैन्य गतिरोध अप्रैल 2020 में शुरू हुआ था और अक्टूबर 2024 तक जारी रहा, जब दोनों देशों ने कई दौर की सैन्य और कूटनीतिक बातचीत के बाद पूर्वी लद्दाख में पुराने घर्षण बिंदुओं (friction points) से पीछे हटने पर सहमति व्यक्त की। हालांकि, सैनिकों की कुल संख्या में कमी (de-escalation) अभी पूरी तरह से होना बाकी है।
किताब और प्रकाशन के नियम
जनरल नरवणे ने पहले कहा था, “मुझे यह किताब लिखने में मज़ा आया और यही मायने रखता है। लिखने से मुझे संतुष्टि मिली है।”
अक्टूबर 2025 में कसौली में खुशवंत सिंह लिटरेचर फेस्टिवल के दौरान उन्होंने स्पष्ट किया था कि उनका काम किताब लिखना और प्रकाशक को सौंपना था। मंजूरी लेना प्रकाशक का काम था।
उन्होंने कहा, “गेंद अब प्रकाशक और रक्षा मंत्रालय के पाले में है।”
सेवारत अधिकारियों और नौकरशाहों के लिए किताब प्रकाशित करने के सख्त नियम हैं, लेकिन सेवानिवृत्त अधिकारियों के लिए मामला थोड़ा अस्पष्ट (grey area) रहता है। आर्मी रूल्स, 1954 की धारा 21 के तहत, कोई भी व्यक्ति सरकार की पूर्व मंजूरी के बिना सैन्य या राजनीतिक विषयों पर कुछ भी प्रकाशित नहीं कर सकता।
हालांकि, यह नियम उन मामलों में लागू नहीं हो सकता जहां एक सशस्त्र बल कर्मी अपने काम से असंबंधित या साहित्यिक प्रकृति की किताब लिख रहा हो। वहीं, जून 2021 में संशोधित केंद्रीय सिविल सेवा (पेंशन) नियम, 1972 के तहत, खुफिया या सुरक्षा संगठनों में काम कर चुके सेवानिवृत्त अधिकारियों को संगठन से संबंधित जानकारी प्रकाशित करने से पहले मंजूरी लेनी होती है।
रक्षा सूत्रों का कहना है कि यद्यपि तीनों सेनाएं इन नियमों के सीधे दायरे में नहीं आतीं, लेकिन सेवानिवृत्त सैन्य कर्मियों से भी ऐसी ही अपेक्षा की जाती है क्योंकि वे संवेदनशील जानकारी के जानकार होते हैं।
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