अहमदाबाद: भारत में जेड प्लस (Z+) सुरक्षा आमतौर पर उन वीवीआईपी लोगों को दी जाती है जिनकी जान को अत्यधिक खतरा हो, और इसमें 55 सुरक्षाकर्मी 24 घंटे तैनात रहते हैं। लेकिन गुजरात के कच्छ स्थित अबडासा के घास के मैदानों में यह सर्वोच्च सुरक्षा किसी राजनेता को नहीं, बल्कि एक नन्हे पक्षी को दी जा रही है।
26 मार्च को जन्मा ग्रेट इंडियन बस्टर्ड का यह चूजा पूरे राज्य के लिए एक अनमोल तोहफा है, क्योंकि करीब एक दशक बाद गुजरात के जंगलों में इस दुर्लभ प्रजाति का कोई बच्चा पैदा हुआ है।
महज 150 ग्राम वजनी इस नन्ही जान को वन विभाग ने ‘वेरी वेरी इम्पोर्टेंट चिक’ (VVIC) का दर्जा दिया है। इसकी सुरक्षा के लिए 50 वन रक्षकों की एक बड़ी टीम दिन-रात निगरानी कर रही है। इसके लिए इलाके में खास तौर पर वॉचटावर बनाए गए हैं, जहां से ट्राइपॉड, स्पॉटिंग स्कोप और हाई-टेक दूरबीन की मदद से इस वीवीआईसी चूजे पर पैनी नजर रखी जा रही है।
ये अधिकारी तीन अलग-अलग शिफ्ट में काम करते हैं और पल-पल की रिपोर्ट गांधीनगर में बैठे वरिष्ठ अधिकारियों को भेजते हैं। एहतियात के तौर पर इस इलाके से आवारा कुत्तों और मवेशियों को दूर रखा जा रहा है।
गांव की अंदरूनी सड़कों को चुपचाप बंद कर दिया गया है और टूटी हुई तारों की बाड़ को युद्ध स्तर पर ठीक किया जा रहा है। यहां तक कि शिकारियों को दूर रखने के लिए आसपास मौजूद कृत्रिम पानी के स्रोतों को भी जानबूझकर सूखा छोड़ दिया गया है।
दुनिया के सबसे गंभीर रूप से लुप्तप्राय पक्षियों में से एक के लिए, इस चूजे का जन्म किसी ऐतिहासिक उपलब्धि से कम नहीं है। हालांकि, अधिकारियों का मानना है कि असली चुनौती तो अब शुरू हुई है।
अंडे सेने की प्रक्रिया में जहां तकनीकी विशेषज्ञता की जरूरत थी, वहीं अब इस चूजे को उसके पहले महीने तक सुरक्षित रखना सबसे बड़ा लक्ष्य है। जब तक यह अपनी पहली उड़ान भरने लायक मजबूत नहीं हो जाता, तब तक भारी जनशक्ति और असाधारण सतर्कता की जरूरत होगी।
इस पूरे ऑपरेशन की निगरानी जैसलमेर और कच्छ के भारतीय वन्यजीव संस्थान (Wildlife Institute of India) के विशेषज्ञों की एक टीम कर रही है। प्रधान मुख्य वन संरक्षक (वन्यजीव) जयपाल सिंह के अनुसार, वन विभाग इस नवजात के जीवित रहने को सुनिश्चित करने में कोई कसर नहीं छोड़ रहा है। सुरक्षा और देखभाल के लिए कई टीमें गठित की गई हैं और चौबीसों घंटे कड़ी निगरानी की जा रही है।
मादा पक्षी फिलहाल लगभग 3 वर्ग किलोमीटर के घास के मैदान में अपने बच्चे के साथ घूम रही है। अधिकारियों का मानना है कि उसने यह सुरक्षित जगह अपने छिपने और पर्याप्त भोजन की उपलब्धता के कारण चुनी है।
पिछले साल अक्टूबर में मादा पक्षी को एक टैग लगाया गया था, जिसके जरिए उसकी हर हरकत पर नजर रखी जा रही है। उसके छोटे और शांत सफर यह बताते हैं कि सब ठीक है, जबकि किसी भी तेज या असामान्य हरकत को खतरे का संकेत माना जाता है, जिससे अलर्ट होकर वनकर्मी कुछ ही मिनटों में मौके पर पहुंच सकते हैं।
कच्छ के वन संरक्षक धीरज मित्तल ने बताया कि मैदानी कर्मचारियों के अलावा, सहायक वन संरक्षक (ACF) और उप वन संरक्षक (DCF) भी लगातार मौके पर मौजूद हैं। स्थिति की संवेदनशीलता को देखते हुए वन विभाग ने उन पुराने कर्मचारियों को भी वापस बुलाया है, जो पहले यहां अपनी सेवाएं दे चुके हैं और इस इलाके को बहुत अच्छी तरह से समझते हैं।
वन विभाग इस चुनौतीपूर्ण काम में स्थानीय समुदाय का भी पूरा सहयोग ले रहा है। हाल ही में अधिकारियों ने ग्रामीणों के साथ बैठक कर उनसे अपने मवेशियों को अभयारण्य के करीब चराने के लिए न ले जाने का अनुरोध किया। ग्रामीणों को यह भी सूचित किया गया है कि इस क्षेत्र से गुजरने वाले उनके रास्तों को फिलहाल अस्थायी रूप से रोक दिया गया है।
गांधीनगर के एक वरिष्ठ अधिकारी ने इस पूरे अभियान की भावना को स्पष्ट करते हुए कहा कि इस समय लगभग पूरा स्टाफ इस चूजे की देखभाल बिल्कुल वैसे ही कर रहा है, जैसे वे अपने घर के किसी छोटे बच्चे की करते हैं। विभाग का हर व्यक्ति एक-दूसरे के संपर्क में है और इस नन्ही जान को बचाने के लिए अपनी तरफ से हर संभव मदद करने के लिए पूरी तरह से समर्पित है।
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