गुजरात में किशोरियों के स्वास्थ्य को लेकर हुए एक हालिया अध्ययन ने काफी चिंताजनक तस्वीर पेश की है। राज्य के पांच जिलों में 10 से 19 वर्ष की 750 लड़कियों पर किए गए एक विस्तृत सर्वे में 39.6 प्रतिशत किशोरियां एनीमिया यानी खून की कमी से पीड़ित पाई गई हैं। एनीमिया एक ऐसा रक्त विकार है जिसमें शरीर के अंदर पर्याप्त मात्रा में स्वस्थ लाल रक्त कोशिकाएं या हीमोग्लोबिन नहीं बन पाता है, जिससे शरीर के ऊतकों तक ऑक्सीजन का प्रवाह कम हो जाता है।
इस रिपोर्ट के अनुसार, खराब खान-पान और भोजन में जरूरी सूक्ष्म पोषक तत्वों (माइक्रोन्यूट्रिएंट्स) की कमी इस गंभीर स्थिति के मुख्य कारण हैं।
यह महत्वपूर्ण शोध हाल ही में ‘इंडियन जर्नल ऑफ कम्युनिटी मेडिसिन’ में ‘एनीमिया प्रिवेलेंस एंड इट्स डिटर्मिनेंट्स अमंग एडोलसेंट गर्ल्स इन गुजरात, इंडिया: ए क्रॉस-सेक्शनल स्टडी’ शीर्षक से प्रकाशित हुआ है।
इस अध्ययन को इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक हेल्थ (IIPH) गांधीनगर और राज्य स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग के स्टेट हेल्थ सिस्टम रिसोर्स सेंटर के विशेषज्ञों ने मिलकर किया है। इसके प्रमुख लेखकों में शालू चौधरी, वर्षा गढ़वी, सोमेन साहा, एएम कादरी और दीपक सक्सेना शामिल हैं।
अपने इस विश्लेषण के लिए शोधकर्ताओं ने राज्य के अलग-अलग भौगोलिक क्षेत्रों का चयन किया। इनमें दो ग्रामीण जिले कच्छ और जूनागढ़, दो आदिवासी बहुल जिले वलसाड और बनासकांठा के साथ-साथ एक प्रमुख शहरी केंद्र के रूप में अहमदाबाद को शामिल किया गया।
लड़कियों की स्वास्थ्य समस्याओं की वास्तविक जड़ तक पहुंचने के लिए विशेषज्ञों ने भोजन की विविधता, वॉश (पानी, साफ-सफाई और स्वच्छता) और रक्त के नमूनों के विश्लेषण जैसे अहम मापदंडों का बारीकी से अध्ययन किया।
जांच और सर्वे के नतीजे काफी चौंकाने वाले रहे हैं। रिपोर्ट में पाया गया कि लगभग 70 प्रतिशत मामलों में एनीमिया का मुख्य कारण शरीर में आयरन की कमी थी। वहीं, 18.7 प्रतिशत लड़कियों में फेरिटिन का स्तर बिल्कुल सामान्य होने के बावजूद एनीमिया की शिकायत देखी गई।
इसके अलावा, शरीर में विटामिन डी, ए और बी12 जैसे जरूरी सूक्ष्म पोषक तत्वों की भारी कमी भी एक बड़ी समस्या बनकर सामने आई। सर्वे में शामिल 56 प्रतिशत लड़कियों में जिंक का स्तर निर्धारित मानक से कम था, जबकि 49 प्रतिशत किशोरियों में फोलेट की कमी पाई गई।
अगर इस समस्या को क्षेत्रीय आधार पर देखा जाए, तो आदिवासी इलाकों में स्थिति तुलनात्मक रूप से अधिक गंभीर है। इन क्षेत्रों में एनीमिया का प्रसार 50 प्रतिशत दर्ज किया गया, जबकि शहरी क्षेत्रों में यह आंकड़ा 46.3 प्रतिशत और ग्रामीण इलाकों में 30 प्रतिशत रहा।
इसके साथ ही, शोध के निष्कर्षों से यह भी साफ हुआ कि लगभग 62 प्रतिशत लड़कियां अपने दैनिक भोजन में आवश्यक आहार विविधता के निर्धारित मानकों को पूरा नहीं कर पाती हैं।
पोषण विशेषज्ञ और इस अध्ययन के सह-लेखकों में से एक प्रोफेसर सोमेन साहा ने बताया कि ऐतिहासिक रूप से एनीमिया की रोकथाम के लिए हमेशा से आयरन की कमी को दूर करने पर ही सबसे ज्यादा जोर दिया जाता रहा है। उन्होंने कहा कि अब प्रमुख सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी को दूर करने की दिशा में भी ठोस और निर्णायक कदम उठाने की जरूरत है।
प्रोफेसर साहा के अनुसार इसे हमारी व्यापक रणनीति का एक अभिन्न हिस्सा होना चाहिए ताकि एनीमिया की रोकथाम में एक स्थायी और सकारात्मक बदलाव लाया जा सके।
अहमदाबाद के जाने-माने बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. चेतन त्रिवेदी ने इस विषय पर गहरी चिंता जताते हुए कहा कि बचपन से ही एनीमिया की समस्या होने पर महिलाओं को वयस्क होने पर कई तरह की स्वास्थ्य जटिलताओं का सामना करना पड़ सकता है।
इस कमी का सीधा और नकारात्मक असर उनके समग्र स्वास्थ्य के साथ-साथ गर्भावस्था पर भी पड़ता है। उन्होंने जोर देकर कहा कि प्राकृतिक खाद्य पदार्थों के माध्यम से शरीर में आयरन की पर्याप्त आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए लोगों के बीच जागरूकता बढ़ाना आज के समय का सबसे प्राथमिक कदम होना चाहिए।
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