बात 26 सितंबर के एक शाम की है। 38 वर्षीय शैलेश सोलंकी, जो खेड़ावाड़ा लक्ष्मीपुरा गाँव में दिहाड़ी मजदूरी कर अपना जीवनयापन करते हैं, अपने दिन भर के काम के बाद काल भैरव मंदिर जाने के लिए निकले थे। उनके मन में बस एक साधारण सी इच्छा थी – ईश्वर के दर्शन करने की। लेकिन उन्हें इस बात का ज़रा भी अंदाज़ा नहीं था कि मंदिर तक पहुँचने से पहले ही उनका सामना एक ऐसी सामाजिक हक़ीक़त से होगा जो संविधान में दिए गए समानता के अधिकार को खुलेआम चुनौती देती है।
हिम्मतनगर के पास बलोचपुर चौराहे पर जब शैलेश गाड़ी का इंतज़ार कर रहे थे, तभी स्कूटर पर सवार एक व्यक्ति उनके पास आकर रुका। धनपुरा गाँव के रहने वाले इस व्यक्ति, भरत पटेल ने शैलेश पर “संदिग्ध रूप से घूमने” का आरोप लगाया और उनकी पहचान पूछने लगा। शैलेश ने शांति से जवाब दिया कि वह मंदिर जा रहे हैं, लेकिन भरत को उनकी बात पर यकीन नहीं हुआ।
जब शैलेश ने अपना पूरा नाम बताया, तो भरत का अगला सवाल जाति पर केंद्रित था। उसने पूछा कि क्या वह सामान्य वर्ग से हैं या अनुसूचित जाति से। इस पर शैलेश ने पहचान के लिए अपना आधार कार्ड दिखाया। जैसे ही भरत पटेल की नज़र आधार कार्ड पर लिखे उपनाम ‘सोलंकी’ पर पड़ी, माहौल पूरी तरह बदल गया।
आधार कार्ड, जो एक नागरिक की पहचान का सरकारी दस्तावेज़ है, उस शाम शैलेश के लिए उत्पीड़न का कारण बन गया। उनकी दलित पहचान की पुष्टि होते ही भरत पटेल ने उन्हें जातिसूचक गालियाँ देनी शुरू कर दीं। उसकी आवाज़ में नफ़रत और आँखों में गुस्सा था।
उसने चिल्लाकर पूछा, “एक दलित होकर, तू अंधेरा होने के बाद मंदिर जाने की हिम्मत कैसे कर रहा है?” इसके बाद उसने शैलेश को कई थप्पड़ मारे।
यह हमला किसी व्यक्तिगत दुश्मनी का नतीजा नहीं था, बल्कि एक ऐसी गहरी और बीमार मानसिकता का प्रदर्शन था, जो मानती है कि दलितों का सार्वजनिक और धार्मिक स्थानों पर प्रवेश समय और सवर्णों की मर्ज़ी के अधीन है।
इस घटना के कुछ ही देर बाद, टिटपुर गाँव के रहने वाले नरेंद्रसिंह परमार और जगतसिंह परमार मोटरसाइकिल पर वहाँ पहुँचे और उन्होंने बीच-बचाव कर शैलेश को बचाया।
लेकिन भरत पटेल का दुस्साहस यहीं नहीं रुका। उसने शैलेश को ज़बरदस्ती अपने स्कूटर पर बिठाया, कुछ दूर ले जाकर घोरवाड़ा के पास छोड़ दिया और धमकी दी कि अगर वह दोबारा उस इलाके में दिखा तो उसे जान से मार दिया जाएगा।
अपने परिवार से बात करने और गवाहों के तौर पर नरेंद्रसिंह और जगतसिंह का समर्थन मिलने के बाद, शैलेश सोलंकी ने हिम्मतनगर ग्रामीण पुलिस में शिकायत दर्ज कराई।
पुलिस ने भरत पटेल के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता के तहत मारपीट और धमकी देने, और अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 की संबंधित धाराओं के तहत प्राथमिकी (FIR) दर्ज की है।
शैलेश सोलंकी की यह आपबीती गुजरात में किसी एक व्यक्ति की कहानी नहीं है, बल्कि यह उस व्यापक और चिंताजनक पैटर्न का एक हालिया उदाहरण है, जहाँ दलितों को उनके मौलिक अधिकारों का प्रयोग करने पर भी हिंसा का सामना करना पड़ता है। यह घटना एक ऐसे गहरे सामाजिक रोग का लक्षण है, जिसकी जड़ें गुजरात की ज़मीन में बहुत गहरी हैं।
गुजरता में जातिगत हिंसा: पहचान, जश्न और स्वाभिमान पर हमले
गुजरात में दलितों पर होने वाले अत्याचार केवल मंदिर जाने तक सीमित नहीं हैं। यह हिंसा उन सभी सामाजिक, सांस्कृतिक और व्यक्तिगत अभिव्यक्तियों को निशाना बनाती है, जिन्हें प्रमुख जातियाँ अपना विशेषाधिकार मानती हैं। चाहे शादी में घोड़ी पर चढ़ने का जश्न हो, मूंछ रखकर अपने स्वाभिमान का प्रदर्शन हो, या गरबा जैसे सामुदायिक उत्सव में शामिल होने की खुशी हो – ये सभी एक दलित के लिए जानलेवा साबित हो सकते हैं।
ये घटनाएँ अलग-अलग लग सकती हैं, लेकिन इनके पीछे की मानसिकता एक ही है: दलित समुदाय को यह याद दिलाना कि उनकी सामाजिक हैसियत आज भी प्रमुख जातियों द्वारा निर्धारित होती है।
जश्न की क़ीमत: जब दूल्हे की घोड़ी और गरबा के क़दम अपराध बन जाते हैं
किसी भी समाज में विवाह और त्योहार खुशी और सामाजिक मेलजोल के अवसर होते हैं। लेकिन गुजरात के कई हिस्सों में, दलितों के लिए यही अवसर अपमान और हिंसा का कारण बन जाते हैं। जब एक दलित परिवार अपनी खुशी का सार्वजनिक प्रदर्शन करता है, तो इसे अक्सर जातिगत पदानुक्रम को चुनौती के रूप में देखा जाता है।
शादी की बारात: इसी साल फरवरी 2024 में गांधीनगर जिले के चडासना गाँव में एक दलित दूल्हे, विकास चावड़ा के साथ जो हुआ, वह इसका एक भयावह उदाहरण है। विकास अपनी शादी में घोड़ी पर बैठकर बारात निकाल रहे थे, जो किसी भी दूल्हे के लिए एक गर्व का क्षण होता है। लेकिन उनकी यह खुशी ज़्यादा देर तक नहीं टिक सकी।
ओबीसी ठाकोर समुदाय के चार लोगों – शैलेश ठाकोर, जयेश ठाकोर, समीर ठाकोर और अश्विन ठाकोर – ने उनकी बारात रोक दी। उन्होंने विकास के साथ न केवल मारपीट की और जातिसूचक गालियाँ दीं, बल्कि यह भी कहा कि घोड़ी पर चढ़ना केवल उनके समुदाय के सदस्यों का अधिकार है।
हमलावरों ने दूल्हे को घोड़ी से उतरने पर मजबूर कर दिया और उसे अपनी ही शादी में दुल्हन के घर तक कार में जाना पड़ा। यह घटना सिर्फ एक व्यक्ति पर हमला नहीं थी, बल्कि एक पूरे समुदाय को यह संदेश देने की कोशिश थी कि सामाजिक प्रतिष्ठा के प्रतीक उन पर शोभा नहीं देते ।
गरबा में भागीदारी: सांस्कृतिक उत्सवों में भी दलितों की भागीदारी को बर्दाश्त नहीं किया जाता। अक्टूबर 2017 में आणंद जिले के भद्रानिया गाँव में 21 वर्षीय जयेश सोलंकी की हत्या सिर्फ इसलिए कर दी गई क्योंकि वह एक मंदिर के पास हो रहे गरबा कार्यक्रम को देख रहा था।
पटेल समुदाय के कुछ लोगों ने उसे और उसके चचेरे भाई को यह कहते हुए रोका कि दलितों को “गरबा देखने का कोई अधिकार नहीं है”। इसके बाद उन्होंने जयेश को बेरहमी से पीटा और उसका सिर एक दीवार से दे मारा। अस्पताल में जयेश ने दम तोड़ दिया । उसकी “गलती” सिर्फ इतनी थी कि वह एक ऐसे सांस्कृतिक कार्यक्रम का हिस्सा बनना चाहता था, जिसे प्रमुख जातियाँ अपनी बपौती समझती थीं ।
यह पैटर्न यहीं नहीं रुकता। अक्टूबर 2024 में कच्छ जिले में एक पूरे दलित परिवार पर इसलिए हमला किया गया क्योंकि वे गरबा कार्यक्रम में शामिल हुए थे। विशालभाई गोस्वामी, मनीषभाई गोस्वामी, अज्जू भाई जडेजा और रतन सिंह नामक आरोपियों ने परिवार के पिता, चाचा, भाई और यहाँ तक कि एक महिला सदस्य पर भी हमला किया ।
ये घटनाएँ स्पष्ट रूप से दर्शाती हैं कि यह हिंसा अचानक भड़का कोई गुस्सा नहीं, बल्कि एक सोची-समझी सामाजिक पुलिसिंग है। इसका उद्देश्य सांस्कृतिक और सार्वजनिक स्थानों पर एक अदृश्य लक्ष्मण रेखा खींचना है, जिसे दलित पार नहीं कर सकते।
एक दलित दूल्हे का घोड़ी पर चढ़ना सामाजिक प्रगति और समानता का एक शक्तिशाली प्रतीक है, जो सामंती मानसिकता को सीधे चुनौती देता है। इसी तरह, गरबा में दलितों की भागीदारी समान सांस्कृतिक नागरिकता का दावा है। इन दावों का जवाब हिंसा से दिया जाता है ताकि पूरे समुदाय में डर पैदा किया जा सके और उन्हें उनकी “जगह” याद दिलाई जा सके।
मूंछ रखने का ख़तरनाक अंजाम
जातिगत हिंसा का दायरा केवल सार्वजनिक समारोहों तक ही सीमित नहीं है, यह व्यक्ति की निजी पसंद और उसके शरीर तक पहुँच गया है। गुजरात में, एक दलित व्यक्ति के लिए मूंछ रखना भी अपने स्वाभिमान और पुरुषत्व का एक ऐसा प्रदर्शन माना जाता है, जो प्रमुख जातियों को नागवार गुजरता है। मूंछ, जिसे अक्सर सम्मान और बहादुरी का प्रतीक माना जाता है, जब एक दलित के चेहरे पर दिखाई देती है, तो इसे जातिगत व्यवस्था के लिए एक सीधी चुनौती के रूप में देखा जाता है।
समूह में हमला: मई 2021 में अहमदाबाद के विरमगाम तालुका के करथकल गाँव में 22 वर्षीय सुरेश वाघेला पर हुआ हमला इसकी क्रूरता को दर्शाता है। सुरेश ने सिर्फ लंबी मूंछें रखी थीं। इसी बात से नाराज़ होकर, धामा ठाकोर के नेतृत्व में ओबीसी समुदाय के 11 लोगों का एक समूह रात में उनके घर के बाहर इकट्ठा हुआ।
उन्होंने पहले सुरेश को जाति को लेकर गालियाँ दीं और फिर लाठियों और धारदार हथियारों से उन पर हमला कर दिया। इस हमले में उनकी बहन भी घायल हो गई । यह एक सुनियोजित हमला था, जिसका एकमात्र उद्देश्य एक दलित युवक को उसकी “अवज्ञा” के लिए दंडित करना था।
लगातार हमले: गांधीनगर के पास लिंबोदरा गाँव में अक्टूबर 2017 में हुई घटनाएँ इस बात का प्रमाण हैं कि यह कोई अकेली घटना नहीं है। यहाँ चचेरे भाई, 24 वर्षीय पीयूष परमार और 17 वर्षीय दिगंत महेरिया पर कुछ ही दिनों के अंतराल में अलग-अलग हमला किया गया। दोनों का “अपराध” एक ही था – मूंछ रखना। कथित तौर पर राजपूत समुदाय के हमलावरों ने स्पष्ट रूप से कहा कि “दलित मूंछें नहीं रख सकते”। दिगंत पर हमला तब हुआ जब वह स्कूल से घर लौट रहा था।
हमलावरों ने उसकी पीठ पर ब्लेड से वार किया। यह हमला इसलिए भी किया गया क्योंकि उसके बड़े भाई पीयूष ने पहले हुए हमले के खिलाफ FIR दर्ज कराई थी । इन हमलों के जवाब में, गुजरात के दलित युवाओं ने सोशल मीडिया पर ‘मिस्टर दलित’ अभियान चलाया, जिसमें वे अपनी मूंछों पर ताव देते हुए तस्वीरें पोस्ट कर रहे थे। यह उत्पीड़न के प्रतीक को गर्व और प्रतिरोध के प्रतीक में बदलने का एक शक्तिशाली प्रयास था ।
ये हमले केवल शारीरिक चोट पहुँचाने के लिए नहीं किए जाते। इनका एक गहरा मनोवैज्ञानिक उद्देश्य होता है। यह एक दलित व्यक्ति को यह महसूस कराने की कोशिश है कि उसका अपना शरीर भी उसका नहीं है; उसकी सूरत, उसकी पहचान, और उसका स्वाभिमान प्रमुख जातियों के नियंत्रण के अधीन है। जब एक दलित व्यक्ति मूंछ रखता है, तो वह अनजाने में ही उन गुणों पर अपना दावा पेश करता है जिन्हें प्रमुख जातियाँ ऐतिहासिक रूप से अपना मानती आई हैं – जैसे सम्मान, मर्दानगी और गौरव।
यह प्रतीकात्मक दावा हिंसक प्रतिक्रिया को जन्म देता है, जिसका लक्ष्य उस दलित व्यक्ति को शारीरिक और मानसिक रूप से “छोटा” करना होता है जो सिर उठाकर जीने की हिम्मत करता है।
निराशा के पीछे के आँकड़े: अत्याचार का एक सांख्यिकीय चित्र
गुजरात में दलितों पर हो रहे अत्याचार की ये कहानियाँ केवल अलग-अलग घटनाएँ नहीं हैं, बल्कि एक बड़े और भयावह पैटर्न का हिस्सा हैं। जब हम व्यक्तिगत आपबीतियों से आगे बढ़कर सरकारी आँकड़ों को देखते हैं, तो इस समस्या की गंभीरता और व्यापकता और भी स्पष्ट हो जाती है। ये आँकड़े इस बात का अकाट्य प्रमाण हैं कि ये घटनाएँ अपवाद नहीं, बल्कि एक नियमित और प्रणालीगत समस्या हैं।
राज्य स्तर पर, गृह मंत्रालय द्वारा लोकसभा में प्रस्तुत किए गए आँकड़े एक चिंताजनक तस्वीर पेश करते हैं। ये आँकड़े गुजरात में अनुसूचित जातियों के खिलाफ हर साल सैकड़ों आधिकारिक मामले दर्ज होने की पुष्टि करते हैं।
| वर्ष | गुजरात में अनुसूचित जातियों के खिलाफ दर्ज मामले |
| 2020 | 1,326 |
| 2021 | 1,201 |
| 2022 | 1,279 |
| स्रोत: गृह मंत्रालय, लोकसभा डेटा |
इन आँकड़ों का औसत निकालने पर पता चलता है कि गुजरात में हर महीने 100 से अधिक मामले दर्ज होते हैं, जिसका अर्थ है कि हर दिन तीन से चार दलित व्यक्ति आधिकारिक तौर पर अत्याचार का शिकार होते हैं।
प्रेस सूचना ब्यूरो (PIB) द्वारा जारी किए गए अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति अधिनियम के तहत दर्ज मामलों के आँकड़े भी इसी प्रवृत्ति की पुष्टि करते हैं, जिसमें 2020 में 1,258 मामले दर्ज किए गए थे।
यह समस्या केवल गुजरात तक ही सीमित नहीं है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) की नवीनतम ‘क्राइम इन इंडिया 2023’ रिपोर्ट के अनुसार, पूरे देश में 2023 में अनुसूचित जातियों के खिलाफ अपराध के कुल 57,789 मामले दर्ज किए गए। यह 2022 की तुलना में 0.4% की मामूली वृद्धि दर्शाता है। इन राष्ट्रीय आँकड़ों का मतलब है कि भारत में हर 9 मिनट में एक दलित के खिलाफ अपराध दर्ज किया जाता है।
हालांकि ये सरकारी आँकड़े अपने आप में चौंकाने वाले हैं, लेकिन वे शायद पूरी सच्चाई का केवल एक छोटा सा हिस्सा ही दिखाते हैं। सामाजिक कार्यकर्ता और विशेषज्ञ लंबे समय से यह तर्क देते रहे हैं कि आधिकारिक आँकड़े “हिमशैल का सिरा” मात्र हैं। कई मामले कभी भी पुलिस तक नहीं पहुँच पाते।
इसके पीछे कई कारण हैं, जिनमें प्रमुख जातियों के प्रतिशोध का डर, सामाजिक बहिष्कार की धमकी, पुलिस की उदासीनता या पूर्वाग्रह, और पीड़ितों के पास कानूनी लड़ाई लड़ने के लिए संसाधनों की कमी शामिल है।
एक दिहाड़ी मजदूर के लिए गाँव के शक्तिशाली लोगों के खिलाफ शिकायत दर्ज कराने का निर्णय लेना एक बहुत बड़ा और साहसी कदम होता है। इसलिए, इन आँकड़ों को समस्या की पूरी तस्वीर के रूप में नहीं, बल्कि प्रलेखित अत्याचारों की न्यूनतम आधार रेखा के रूप में देखा जाना चाहिए। असल में ज़मीनी हक़ीक़त इन संख्याओं से कहीं ज़्यादा गंभीर हो सकती है।
सम्मान के लिए अधूरा संघर्ष
शैलेश सोलंकी के मंदिर जाने की इच्छा से लेकर विकास चावड़ा के घोड़ी पर बैठने के सपने तक, और जयेश सोलंकी के गरबा देखने की मासूमियत से लेकर सुरेश वाघेला के मूंछ रखने के स्वाभिमान तक – ये सभी कहानियाँ एक ही कड़वी सच्चाई को बयां करती हैं।
गुजरात और भारत के कई हिस्सों में दलितों के लिए समानता और सम्मान आज भी एक दूर का सपना है। ये घटनाएँ केवल कानून और व्यवस्था की समस्या नहीं हैं, बल्कि एक गहरे सामाजिक रोग का लक्षण हैं, जो दलितों को बराबर का नागरिक मानने से इनकार करता है।
यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि लगभग हर मामले में, कानून ने अपना काम किया है। अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 जैसे कड़े कानूनों के तहत FIR दर्ज की गई हैं। लेकिन यहाँ एक महत्वपूर्ण सवाल उठता है: अगर कानून मौजूद है और उसका इस्तेमाल भी हो रहा है, तो फिर यह हिंसा रुक क्यों नहीं रही है?
इसका जवाब कानूनी किताबों में नहीं, बल्कि समाज की मानसिकता में छिपा है। कानून अपराधी को दंडित कर सकता है, लेकिन वह लोगों के मन में सदियों से बैठी जातिगत श्रेष्ठता की भावना को मिटा नहीं सकता। कानूनी सुरक्षा और सामाजिक वास्तविकता के बीच एक बहुत बड़ी खाई है।
यह लड़ाई केवल शारीरिक सुरक्षा की नहीं है, बल्कि यह सम्मान (samman) के लिए एक अंतहीन संघर्ष है। यह बिना किसी डर के जीने के अधिकार, अपनी खुशियों का जश्न मनाने के अधिकार, अपनी पहचान को व्यक्त करने के अधिकार, और देश के सांस्कृतिक और धार्मिक जीवन में स्वतंत्र रूप से भाग लेने के अधिकार की लड़ाई है।
ये वे अधिकार हैं जिनकी गारंटी भारत का संविधान हर नागरिक को देता है, लेकिन जिन्हें आज भी गुजरात की सड़कों, गाँवों और चौराहों पर हिंसा के माध्यम से चुनौती दी जा रही है। जब तक समाज अपनी इस मानसिकता को नहीं बदलता, तब तक शैलेश सोलंकी जैसे अनगिनत लोगों के लिए मंदिर का रास्ता अंधेरे और डर से भरा रहेगा, और संविधान में लिखा समानता का वादा अधूरा ही रहेगा।
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