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गुजरात: ‘अशांत क्षेत्र अधिनियम’ में संशोधन की तैयारी, अब कहलाएंगे ‘निर्दिष्ट क्षेत्र’

| Updated: March 20, 2026 14:02

संपत्ति हस्तांतरण के नियमों में बड़ा बदलाव: अब 'अशांत' नहीं बल्कि 'निर्दिष्ट क्षेत्र' कहलाएंगे इलाके, अनैच्छिक विस्थापन रोकने के लिए बनेगी नई कमेटी।

गुजरात सरकार ने 1991 के ‘अशांत क्षेत्र अधिनियम’ (Disturbed Areas Act) में कई अहम बदलावों का प्रस्ताव रखा है। इन बदलावों के तहत एक नई निगरानी और सलाहकार समिति के गठन की बात कही गई है। यह समिति सरकार को उन क्षेत्रों के बारे में सलाह देगी जहां सांप्रदायिक अशांति के कारण स्थानीय निवासियों के ‘अनैच्छिक विस्थापन’ का खतरा हो सकता है।

इसके अलावा संपत्ति से जुड़े विवादों में ‘पीड़ित व्यक्तियों’ की परिभाषा का दायरा भी बढ़ाया जा रहा है। अब इसमें केवल संपत्ति के खरीदार और विक्रेता ही नहीं, बल्कि उस इलाके में रहने वाले अन्य निवासियों को भी शामिल किया जाएगा। साथ ही, ऐसे मामलों में ‘अशांत क्षेत्र’ शब्द को बदलकर ‘निर्दिष्ट क्षेत्र’ (specified area) करने का प्रस्ताव रखा गया है।

अचल संपत्ति के हस्तांतरण पर रोक और किरायेदारों को बेदखली से बचाने वाले इस कानून को मुख्य रूप से अशांत क्षेत्र अधिनियम के रूप में जाना जाता है। इस नए संशोधन विधेयक को अगले सप्ताह विधानसभा के मौजूदा बजट सत्र में पेश किए जाने की उम्मीद है।

इससे पहले साल 2020 में भी राज्य सरकार ने कुछ संशोधन प्रस्तावित किए थे, जिन पर गुजरात उच्च न्यायालय ने रोक लगा दी थी। उन संशोधनों में विशेष रूप से ‘जनसांख्यिकीय असंतुलन’ के आधार पर कानून का दायरा बढ़ाने की कोशिश की गई थी। इसके तहत सांप्रदायिक रूप से संवेदनशील माने जाने वाले क्षेत्रों में संपत्ति हस्तांतरण के नियमों को बेहद सख्त कर दिया गया था।

साथ ही विभिन्न धार्मिक समुदायों के बीच संपत्ति के लेन-देन को रोकने के लिए जिला कलेक्टर के अधिकार भी बढ़ाए गए थे। बाद में अक्टूबर 2023 में राज्य सरकार ने अदालत को सूचित किया था कि वह उन संशोधनों पर पुनर्विचार कर रही है।

मूल रूप से यह अधिनियम राज्य के अशांत क्षेत्रों में अचल संपत्ति के हस्तांतरण पर पूरी तरह से रोक लगाता है। मौजूदा विधेयक में इस बात का जिक्र किया गया है कि कानून लागू होने के दौरान कई ऐसे मामले देखे गए जहां नियमों का उल्लंघन करके संपत्तियों का हस्तांतरण किया गया और असामाजिक तत्वों ने उन पर अवैध कब्जा कर लिया।

नए मसौदे में जहां ‘अशांत क्षेत्र’ शब्दों को ‘निर्दिष्ट क्षेत्र’ से बदलने का प्रस्ताव है, वहीं ‘व्यथित या पीड़ित व्यक्ति’ की मौजूदा परिभाषा को भी नया विस्तार दिया गया है। पहले यह केवल संपत्ति देने वाले और लेने वाले (transferor and transferee) तक सीमित था, लेकिन अब राज्य सरकार द्वारा घोषित ऐसे निर्दिष्ट क्षेत्र में रहने वाले किसी भी व्यक्ति को इसका हिस्सा माना जाएगा।

नए मसौदे के अनुसार किसी इलाके को अशांत क्षेत्र घोषित करने के मौजूदा प्रावधानों की जगह कुछ नई स्थितियां जोड़ी जाएंगी। अब उन इलाकों को भी इस कानून के दायरे में लाया जाएगा जहां समुदायों के बीच तनाव के कारण सार्वजनिक व्यवस्था बिगड़ने की आशंका है। इसका मुख्य उद्देश्य उस इलाके में रहने वाले लोगों के अनैच्छिक विस्थापन को रोकना है।

इसी कड़ी में प्रस्तावित निगरानी और सलाहकार समिति की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है। यह समिति राज्य के किसी भी हिस्से में अध्ययन करके सरकार को समय-समय पर यह सलाह देगी कि क्या वहां दंगों या भीड़ की हिंसा के कारण लंबे समय तक शांति भंग हुई है। इसके साथ ही समिति यह भी आकलन करेगी कि क्या सांप्रदायिक तनाव के कारण भविष्य में वहां से लोगों के पलायन का खतरा बन रहा है।

अगर मौजूदा कानून की बात करें, तो गुजरात सरकार मुख्य रूप से तीन स्थितियों में किसी इलाके को अशांत क्षेत्र घोषित कर सकती है। पहली स्थिति वह है जब दंगों या भीड़ की हिंसा की तीव्रता को देखते हुए किसी क्षेत्र में लंबे समय तक सार्वजनिक व्यवस्था बाधित रही हो।

दूसरी स्थिति में अगर किसी एक समुदाय के लोगों का ध्रुवीकरण हो गया है या होने की संभावना है, जिससे वहां रहने वाले विभिन्न समुदायों का जनसांख्यिकीय संतुलन बिगड़ता हो। तीसरी और आखिरी स्थिति तब बनती है जब किसी एक समुदाय के लोगों का अनुचित जमावड़ा होता है, जिससे आपसी सद्भाव बिगड़ने का डर हो या उस इलाके में अशांति फैलने की आशंका हो।

नए संशोधनों के तहत जिला कलेक्टर निर्दिष्ट क्षेत्रों में अचल संपत्तियों के हस्तांतरण को मंजूरी देना जारी रखेंगे। हालांकि, अब किसी भी आवेदन पर फैसला लेते समय कलेक्टर को इस बात का खास ध्यान रखना होगा कि क्या समुदायों के बीच तनाव के कारण सार्वजनिक व्यवस्था भंग होने की कोई आशंका तो नहीं है। इसी आधार पर वे अपना अंतिम निर्णय लेंगे।

संपत्ति हस्तांतरित करने वाले व्यक्ति के हितों की रक्षा के लिए भी एक अहम प्रस्ताव पेश किया गया है। यदि संपत्ति सौंपने वाला व्यक्ति किसी कारणवश अपनी संपत्ति पर कब्जा नहीं ले पाता है, तो कलेक्टर स्वतः संज्ञान लेकर या किसी पीड़ित व्यक्ति के आवेदन पर अस्थायी रूप से उस संपत्ति को अपने कब्जे में ले सकते हैं।

वर्तमान में 1991 के अधिनियम और इसके 2020 के संशोधनों से जुड़े कई मामले गुजरात उच्च न्यायालय में लंबित हैं, जिनमें विशेषकर संपत्ति हस्तांतरण पर लगे प्रतिबंधों और इसकी संवैधानिक वैधता को चुनौती दी गई है। इसे ध्यान में रखते हुए विधेयक में यह स्पष्ट किया गया है कि निर्दिष्ट क्षेत्र में स्थित किसी भी अचल संपत्ति को वित्तीय संस्थान के पास गिरवी रखकर ऋण लेने वाले लोगों को अनावश्यक कठिनाई से बचाने के लिए भी यह संशोधन किए जा रहे हैं।

प्रस्तावित कानून के मसौदे में कलेक्टर की सहायता के लिए एक विशेष जांच दल (SIT) के गठन का भी स्पष्ट प्रावधान किया गया है। यह जांच दल उन क्षेत्रों की पहचान करने में कलेक्टर की मदद करेगा जहां सांप्रदायिक तनाव के कारण भविष्य में शांति भंग होने की संभावना हो सकती है।

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