नई दिल्ली/वाघा: भारत-पाकिस्तान सीमा पर शुक्रवार का दिन एक परिवार के लिए बेहद गमगीन और लंबा रहा। पाकिस्तान ने शुक्रवार को गुजरात के एक 37 वर्षीय मछुआरे का शव भारतीय अधिकारियों को सौंप दिया, जिनकी पिछले महीने कराची की जेल में मृत्यु हो गई थी। इस दुखद घटना ने एक बार फिर सीमा पार कैद भारतीय मछुआरों के लंबे समय से चले आ रहे मानवीय मुद्दे की ओर सभी का ध्यान खींचा है।
कौन थे भागाभाई बांभणिया?
मृतक की पहचान गिर सोमनाथ जिले की ऊना तहसील के चिखली गांव के निवासी भागाभाई बांभणिया के रूप में हुई है। अधिकारियों ने पुष्टि की कि उनके पार्थिव शरीर को शुक्रवार सुबह पंजाब के वाघा बॉर्डर पर भारतीय अधिकारियों के हवाले किया गया।
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, गुजरात सरकार के मत्स्य विभाग की एक टीम ने शव को अपने कब्जे में लिया और उसे घर वापस लाने की प्रक्रिया शुरू कर दी है।
एक वरिष्ठ मत्स्य अधिकारी ने जानकारी देते हुए बताया, “शव को सुबह करीब 10:30 बजे सौंपा गया। आवश्यक दस्तावेजी कार्रवाई पूरी करने के बाद, इसे हवाई मार्ग से अहमदाबाद भेजा जाएगा और वहां से सड़क के रास्ते उनके पैतृक गांव ले जाया जाएगा।” उम्मीद है कि शव शनिवार तक ऊना पहुंच जाएगा।
सजा पूरी होने के बाद भी नहीं मिली रिहाई
समुदाय के प्रतिनिधियों के अनुसार, बांभणिया को फरवरी 2022 में पाकिस्तानी अधिकारियों ने उस समय हिरासत में लिया था, जब उनकी नाव कथित तौर पर अरब सागर में समुद्री सीमा पार कर पाकिस्तानी जलक्षेत्र में चली गई थी। यह उस क्षेत्र में एक आम घटना है, जहां पानी पर कोई स्पष्ट लकीर नहीं है।
पीछे अपने परिवार में बांभणिया अपनी बूढ़ी मां, पत्नी, तीन बच्चों और एक भाई को छोड़ गए हैं, जिनका रो-रोकर बुरा हाल है।
इस मौत की खबर सबसे पहले जनवरी में शांति कार्यकर्ता और वरिष्ठ पत्रकार जतिन देसाई ने सार्वजनिक की थी। देसाई वर्षों से पाकिस्तान में कैद भारतीय मछुआरों की आवाज उठाते रहे हैं। उन्होंने एक कड़वी सच्चाई उजागर करते हुए बताया कि बांभणिया अपनी सजा पूरी कर चुके थे और उनकी राष्ट्रीयता की पुष्टि भी हो चुकी थी, लेकिन इसके बावजूद वे सलाखों के पीछे ही रहे।
समझौतों का उल्लंघन और सिस्टम की खामियां
‘कॉन्सुलर एक्सेस पर 2008 के द्विपक्षीय समझौते’ (2008 Bilateral Agreement on Consular Access) के तहत, भारत और पाकिस्तान दोनों को राष्ट्रीयता की पुष्टि और सजा पूरी होने के एक महीने के भीतर कैदियों को रिहा और प्रत्यावर्तित (वापस भेजना) करना होता है। लेकिन कार्यकर्ताओं का कहना है कि जमीनी हकीकत कागजों से बिल्कुल अलग है।
देसाई ने अपने पूर्व बयान में कहा था, “समझौता कागज पर तो मौजूद है, लेकिन हकीकत यह है कि ज्यादातर मछुआरे अपनी सजा खत्म होने के बहुत बाद तक जेल में ही रहते हैं।”
कराची की जेलों में बदतर हालात
इस घटना ने कराची की मलिर जेल में बंद लगभग 200 अन्य भारतीय मछुआरों के परिवारों की चिंताएं बढ़ा दी हैं। इनमें से अधिकांश गुजरात और केंद्र शासित प्रदेश दीव के रहने वाले हैं, जबकि अधिकारियों और कार्यकर्ताओं के अनुसार कम से कम 19 मछुआरे महाराष्ट्र से हैं।
कार्यकर्ताओं ने मलिर जेल के अंदर की स्थितियों पर भी चिंता व्यक्त की है। उनका दावा है कि कई मछुआरे खराब स्वास्थ्य से जूझ रहे हैं और उन्हें पर्याप्त चिकित्सा देखभाल नहीं मिल रही है।
जतिन देसाई ने चेतावनी देते हुए कहा था, “हर साल मलिर जेल में तीन से चार भारतीय मछुआरों की मौत हो जाती है।” लंबी कैद और अनिश्चितता ने परिवारों को तोड़ दिया है और कैदी घर लौटने की उम्मीद खो रहे हैं।
सरकार से गुहार और उम्मीद की किरण
हिरासत में लिए गए मछुआरों के परिवार लगातार भारतीय अधिकारियों से अपने प्रियजनों की जल्द वापसी की गुहार लगा रहे हैं। इसी कड़ी में, पिछले साल दिसंबर में मछुआरा परिवारों की महिलाओं के एक प्रतिनिधिमंडल ने नई दिल्ली में विदेश मंत्री एस. जयशंकर से मुलाकात की थी।
उन्होंने सरकार से पाकिस्तानी हिरासत में बंद भारतीय मछुआरों की रिहाई में तेजी लाने का आग्रह किया था।
शांति कार्यकर्ताओं और नागरिक समाज समूहों द्वारा वर्षों से ऐसी याचिकाएं और अपीलें की जा रही हैं, जो इस मुद्दे के मानवीय पहलू को उजागर करती हैं।
एक स्थायी समाधान की जरूरत
जैसे-जैसे भागाभाई बांभणिया का शव उनके गांव चिखली की ओर अपने अंतिम सफर पर है, उनकी मौत ने एक बार फिर इस बात को रेखांकित कर दिया है कि जो मछुआरे अपनी सजा पूरी कर चुके हैं, उन्हें बिना किसी देरी के घर लाने के लिए एक स्थायी तंत्र की सख्त जरूरत है।
गुजरात के मछुआरा नेताओं का कहना है कि बांभणिया की मौत ने लंबी हिरासत की मानवीय कीमत को उजागर किया है। इनमें से अधिकांश गरीब दिहाड़ी मजदूर होते हैं जो अनजाने में सीमा पार कर जाते हैं।
हालांकि, भारत समय-समय पर पाकिस्तान के साथ कैदियों की सूची साझा करता है और राजनयिक चैनलों के माध्यम से उनकी रिहाई की मांग करता है, लेकिन कार्यकर्ताओं का मानना है कि एक नियमित और समयबद्ध प्रक्रिया के अभाव में, परिवारों का इंतजार सजा पूरी होने के बाद भी सालों तक खत्म नहीं होता।
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