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पाकिस्तान की जेल में दम तोड़ने वाले गुजरात के मछुआरे का शव भारत पहुंचा, शनिवार तक पैतृक गांव पहुंचेगा पार्थिव शरीर

| Updated: February 7, 2026 14:23

कागजों में रह गई रिहाई: सजा पूरी होने के एक साल बाद ताबूत में वतन लौटा गिर-सोमनाथ का बेटा, 200 और भारतीय मछुआरे अब भी पाकिस्तान की कैद में।

वाघा बॉर्डर/अहमदाबाद: पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान की जेल में कैद एक और भारतीय मछुआरे का सफर दुखद अंत के साथ समाप्त हुआ। पाकिस्तान ने शुक्रवार को 37 वर्षीय भारतीय मछुआरे भागाभाई बांभणिया का शव भारत को सौंप दिया। गुजरात के रहने वाले भागाभाई की पिछले महीने कराची की एक जेल में मौत हो गई थी। वतन वापसी तो हुई, लेकिन जिंदा नहीं, बल्कि एक ताबूत में।

गिर-सोमनाथ में शोक की लहर

मृतक की पहचान गिर-सोमनाथ जिले की उना तहसील के चिखली गांव निवासी भागाभाई बांभणिया के रूप में हुई है। गुजरात सरकार के मत्स्य विभाग की एक विशेष टीम ने शुक्रवार को पंजाब के वाघा बॉर्डर पर शव को अपने कब्जे में लिया।

मत्स्य विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी ने जानकारी देते हुए बताया, “शुक्रवार सुबह करीब 10:30 बजे शव हमें सौंपा गया। जरूरी आधिकारिक कागजी कार्रवाई पूरी करने के बाद, पार्थिव शरीर को हवाई मार्ग से अहमदाबाद लाया जाएगा। वहां से इसे सड़क मार्ग द्वारा गिर-सोमनाथ के उना स्थित उनके घर भेजा जाएगा।” अधिकारियों के अनुसार, शनिवार तक भागाभाई का शव उनके परिजनों तक पहुंचने की संभावना है।

फरवरी 2022 में पकड़े गए थे भागाभाई

मछुआरा समुदाय के नेता जीवन जुंगी ने बताया कि भागाभाई को फरवरी 2022 में समुद्र में मछली पकड़ते समय पाकिस्तानी अधिकारियों ने गिरफ्तार किया था। वे अपने पीछे भरा-पूरा परिवार छोड़ गए हैं, जिसमें उनकी मां, पत्नी, तीन बच्चे और एक भाई शामिल हैं। परिवार पर आए इस वज्रपात से पूरे गांव में मातम पसरा है।

सजा पूरी होने के बाद भी नहीं मिली थी रिहाई

शांति कार्यकर्ता और वरिष्ठ पत्रकार जतिन देसाई, जो लंबे समय से पाकिस्तान की जेलों में बंद भारतीय मछुआरों की रिहाई के लिए आवाज उठा रहे हैं, ने 18 जनवरी को एक बयान जारी कर इस दुखद घटना की जानकारी दी थी।

देसाई ने सिस्टम की खामियों को उजागर करते हुए कहा था, “मृतक मछुआरे की सजा साल 2022 में ही पूरी हो चुकी थी। यहां तक कि उनकी नागरिकता की पुष्टि भी हो गई थी। ‘कॉन्सुलर एक्सेस पर 2008 के द्विपक्षीय समझौते’ की धारा 5 स्पष्ट रूप से कहती है कि राष्ट्रीयता की पुष्टि और सजा पूरी होने के एक महीने के भीतर कैदियों को रिहा और प्रत्यावर्तित किया जाना चाहिए। लेकिन दुर्भाग्य से, यह नियम सिर्फ कागजों पर ही सिमट कर रह गया है। भागाभाई की तरह जेल में बंद अधिकांश मछुआरे अपनी सजा बहुत पहले पूरी कर चुके हैं और उनकी पहचान भी साबित हो चुकी है, फिर भी वे सलाखों के पीछे हैं।”

कराची की मलिर जेल: भारतीय मछुआरों के लिए काल

आंकड़ों पर गौर करें तो अभी भी लगभग 200 भारतीय मछुआरे कथित तौर पर समुद्री सीमा पार करने के आरोप में पाकिस्तान की कराची स्थित मलिर जेल में बंद हैं। इनमें से बहुतायत गुजरात और केंद्र शासित प्रदेश दीव के हैं, जबकि 19 मछुआरे महाराष्ट्र के रहने वाले हैं।

जतिन देसाई ने चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि हर साल मलिर जेल में औसतन 3 से 4 भारतीय मछुआरों की मौत हो जाती है। यह एक बेहद गंभीर मानवीय मुद्दा है। उन्होंने बताया कि जेल में बंद कई मछुआरों का स्वास्थ्य ठीक नहीं है और उन्हें बेहतर इलाज की सख्त जरूरत है। लंबे इंतजार के बाद अब वे वतन लौटने की उम्मीद खोते जा रहे हैं, जो बेहद चिंताजनक है।

विदेश मंत्री से लगाई थी गुहार

इस गंभीर स्थिति को देखते हुए, पिछले साल दिसंबर में मछुआरा परिवारों की महिलाओं के एक प्रतिनिधिमंडल ने नई दिल्ली में विदेश मंत्री एस. जयशंकर से मुलाकात की थी। उन्होंने सरकार से पाकिस्तानी जेलों में बंद भारतीय मछुआरों की रिहाई और उनकी वतन वापसी की प्रक्रिया में तेजी लाने का अनुरोध किया था।

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