अहमदाबाद: एक पूर्व क्लास वन अधिकारी को पच्चीस साल के लंबे इंतजार और हाईकोर्ट के आदेश के बाद आखिरकार एक विभागीय कार्यवाही में क्लीन चिट मिल गई है। हैरानी की बात यह है कि इस अधिकारी को बहुत पहले ही मुख्यमंत्री द्वारा दोषमुक्त कर दिया गया था, लेकिन कुछ अधिकारियों ने जानबूझकर फाइल पर मौजूद सीएम के हस्ताक्षर को व्हाइटनर लगाकर मिटा दिया था।
इस मामले में सजा को रद्द करते हुए उच्च न्यायालय ने पुलिस जांच की विफलता पर गहरी चिंता व्यक्त की। सीआईडी क्राइम ने मुख्यमंत्री की फाइल नोटिंग के साथ हुई इस छेड़छाड़ की जांच की थी, लेकिन वह किसी भी दोषी का पता लगाने में पूरी तरह नाकाम रही।
यह पूरा मामला रोजगार एवं प्रशिक्षण निदेशालय में सहायक निदेशक रहे एफ एच शेख से जुड़ा है। उनके और तीन अन्य अधिकारियों के खिलाफ साल 1990 में हुई सामान की खरीद को लेकर एक विभागीय जांच चल रही थी।
जांच अधिकारी ने शुरुआत में ही शेख को निर्दोष पाया था, लेकिन अनुशासनात्मक प्राधिकारी ने इस रिपोर्ट से असहमति जताते हुए 1998 से उनकी एक वेतन वृद्धि (इंक्रीमेंट) रोकने का आदेश दे दिया। इसके बाद साल 2000 में विभाग ने शेख की समीक्षा अपील को भी सिरे से खारिज कर दिया था।
शेख के पुनर्विचार के अनुरोध पर उनकी फाइल सर्वोच्च प्राधिकारी के समक्ष पेश की गई। अगस्त 2001 में संबंधित मंत्री और तत्कालीन मुख्यमंत्री दोनों ने यह स्पष्ट राय दी कि जांच अधिकारी की रिपोर्ट को स्वीकार किया जाना चाहिए और शेख को दोषमुक्त कर देना चाहिए।
इसके बावजूद श्रम विभाग ने इस संबंध में कोई औपचारिक आदेश जारी नहीं किया। मुख्यमंत्री का फैसला फाइल में ही दबा रहा और याचिकाकर्ता को कभी इसकी जानकारी नहीं दी गई।
शेख के खिलाफ कार्यवाही लंबित रही और जब इसे दोबारा खोला गया, तो पता चला कि रिकॉर्ड के साथ भारी छेड़छाड़ की गई है। फाइल में सीएम के हस्ताक्षर सहित कुछ महत्वपूर्ण शब्दों को व्हाइटनर से छिपा दिया गया था।
सीआईडी क्राइम ने इस गंभीर छेड़छाड़ की जांच की, लेकिन मामला बेनतीजा रहा। बाद में साल 2010 में विभाग ने सजा को बरकरार रखने का आदेश पारित कर दिया।
इसके खिलाफ शेख ने यह तर्क देते हुए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया कि यह स्पष्ट रूप से उन्हें प्रताड़ित करने का मामला है। उनके वकील ने दलील दी कि जब मंत्री और सीएम ने एक बार फैसला ले लिया था, तो किसी अन्य प्राधिकारी को इसके विपरीत निर्णय लेने का कोई अधिकार नहीं था।
अदालत में यह भी बताया गया कि अनुशासनात्मक प्राधिकारी ने खरीद समिति के तीन अन्य सदस्यों को दोषमुक्त कर दिया था, लेकिन उनके मामले में अलग रुख अपनाया गया, जो कि स्पष्ट रूप से भेदभाव को दर्शाता है।
सभी रिकॉर्ड की जांच करने के बाद जस्टिस एम जे शेलट ने निष्कर्ष निकाला कि फाइल नोटिंग से साफ पता चलता है कि तत्कालीन मुख्यमंत्री के हस्ताक्षर पर व्हाइटनर लगाया गया था। अदालत ने कहा कि वह इन तथ्यों से बेहद विचलित है, क्योंकि यह दिखाता है कि संबंधित विभाग की एक महत्वपूर्ण आधिकारिक फाइल कितनी असुरक्षित हो सकती है।
अदालत ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि ऐसा लगता है जैसे कोई भी अपनी मर्जी से फाइल नोटिंग में हेरफेर कर सकता है। न्यायालय राज्य सरकार को संबंधित विभाग के दोषी अधिकारियों के खिलाफ जांच करने और फाइल रखने वाले अधिकारियों पर आपराधिक मामला दर्ज करने का निर्देश देने पर गंभीरता से विचार कर रहा था।
हालांकि, राज्य सरकार के अनुरोध के बाद हाईकोर्ट ने ऐसा कोई निर्देश नहीं दिया, क्योंकि संबंधित अधिकारी पहले ही सेवानिवृत्त हो चुके हैं। इसके साथ ही सरकार ने अदालत को भविष्य में ऐसी फाइलों को पूरी तरह सुरक्षित रखने का आश्वासन भी दिया।
अंततः हाईकोर्ट ने शेख को जारी 1998 के नोटिस और 2010 के सजा आदेश को रद्द कर दिया। न्यायालय ने सीएम के फैसले की जानकारी शेख को न देने में विभाग की विफलता पर भी कड़ा रुख अपनाया।
अदालत ने अपने फैसले में कहा कि विभाग का यह रवैया याचिकाकर्ता के इस तर्क को मजबूत करता है कि पूरी जांच के दौरान उन्हें जानबूझकर निशाना बनाया गया था।
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