अहमदाबाद: गुजरात हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि किसी व्यक्ति को विदेश यात्रा करने का अधिकार है या नहीं, यह तय करने का अधिकार क्षेत्र (Jurisdiction) पासपोर्ट अधिकारियों के पास नहीं है। अदालत ने साफ शब्दों में कहा कि किसी आरोपी को विदेश जाने की अनुमति देनी है या नहीं, यह निर्णय केवल ट्रायल कोर्ट ही ले सकता है।
जस्टिस अनिरुद्ध पी. माई की पीठ ने यह व्यवस्था धवल सुरेशभाई मकवाना नामक एक याचिकाकर्ता के मामले की सुनवाई के दौरान दी। मकवाना ने हाई कोर्ट में याचिका दायर कर अधिकारियों को नया पासपोर्ट जारी करने का निर्देश देने की मांग की थी, जिसके बाद अदालत ने अधिकारियों को उन्हें 10 साल के लिए वैध पासपोर्ट जारी करने का आदेश दिया।
पासपोर्ट ऑफिस और कोर्ट के अधिकारों में अंतर
5 जनवरी के अपने आदेश में, जस्टिस माई ने कहा, “इस अदालत का स्पष्ट मत है कि पासपोर्ट अधिकारियों के पास यह तय करने का कोई अधिकार नहीं है कि आरोपी के पास विदेश यात्रा का अधिकार है या नहीं। यह शक्ति केवल ट्रायल कोर्ट में निहित है।”
कोर्ट ने व्यवस्था दी कि:
- पासपोर्ट कार्यालय की शक्ति केवल वैधानिक नियमों और न्यायिक आदेशों के अनुसार पासपोर्ट जारी करने या रिन्यू करने तक सीमित है।
- यदि कोई आरोपी विदेश जाना चाहता है, तो उसे संबंधित ट्रायल कोर्ट में आवेदन करना होगा।
- ट्रायल कोर्ट ही यह तय करेगा कि यात्रा की अनुमति दी जाए या नहीं और वह इसके लिए आवश्यक शर्तें भी लगा सकता है।
क्या है पूरा मामला? (Background)
याचिकाकर्ता धवल सुरेशभाई मकवाना ने नया पासपोर्ट जारी करवाने के लिए हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। उनके खिलाफ आपराधिक कार्यवाही लंबित होने के कारण पासपोर्ट जारी करने में बाधा आ रही थी।
- दर्ज केस: साल 2022 में मकवाना के खिलाफ भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 323 (स्वेच्छा से चोट पहुंचाना), 504 (शांति भंग करने के इरादे से अपमान करना), 506(2) (आपराधिक धमकी) और 114 (अपराध के वक्त दुष्प्रेरक की उपस्थिति) के तहत मामला दर्ज किया गया था।
- पुलिस रिपोर्ट: जांच के बाद पुलिस ने एक रिपोर्ट दाखिल की थी जिसमें निष्कर्ष निकाला गया कि कोई अपराध नहीं बनता है।
- निचली अदालत का रुख: 9 नवंबर, 2022 को मजिस्ट्रेट कोर्ट ने पुलिस की इस रिपोर्ट को स्वीकार कर लिया था। हालांकि, बाद में इस आदेश को चुनौती दी गई और सेशंस कोर्ट ने आपराधिक पुनरीक्षण (Criminal Revision) की अनुमति दे दी।
वकीलों की दलीलें
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के वकील, एडवोकेट धर्नेश आर. पटेल ने तर्क दिया कि केवल आपराधिक कार्यवाही लंबित होने के आधार पर पासपोर्ट प्राधिकरण पासपोर्ट जारी करने से इनकार नहीं कर सकता। उन्होंने कहा कि याचिकाकर्ता विदेश यात्रा करना चाहता है और वर्तमान में पासपोर्ट जारी करने पर रोक लगाने वाला कोई भी न्यायिक आदेश मौजूद नहीं है।
दूसरी ओर, राज्य सरकार की तरफ से पेश हुए एडवोकेट प्रदीप डी. भाते ने दलील दी कि आपराधिक कार्यवाही का सामना कर रहे व्यक्तियों को पासपोर्ट जारी होने से पहले संबंधित अदालत से अनुमति लेनी चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि याचिकाकर्ता ने अभी तक पासपोर्ट प्राधिकरण के समक्ष औपचारिक आवेदन नहीं किया है।
कानूनी प्रावधान और बॉम्बे हाई कोर्ट का संदर्भ
गुजरात हाई कोर्ट ने अपने फैसले में 25 अगस्त, 1993 की अधिसूचना का हवाला दिया, जो पासपोर्ट अधिनियम, 1967 की धारा 6(2)(f) के साथ धारा 22 के तहत जारी की गई थी। यह अधिसूचना उन लोगों को पासपोर्ट जारी करने की शर्तों और छूट का प्रावधान करती है जिनके खिलाफ आपराधिक मामले लंबित हैं।
इसके अलावा, कोर्ट ने बॉम्बे हाई कोर्ट के 13 मार्च, 2014 के एक फैसले का भी जिक्र किया। उस फैसले में स्पष्ट किया गया था कि एक बार जब सक्षम अदालत पासपोर्ट जारी करने या रिन्यू करने की अनुमति दे देती है, तो पासपोर्ट अधिकारियों को अधिनियम और नियमों के अनुसार कार्य करना चाहिए और वे अपनी तरफ से स्वतंत्र प्रतिबंध नहीं लगा सकते।
जस्टिस माई ने माना कि बॉम्बे हाई कोर्ट के दिशा-निर्देशों का इस मामले में मजबूत महत्व है।
फैसला: 4 सप्ताह में निर्णय लेने का निर्देश
तमाम दलीलों को सुनने के बाद हाई कोर्ट ने अधिकारियों को निर्देश दिया कि वे याचिकाकर्ता को पासपोर्ट अधिनियम और नियमों के अनुसार 10 साल की अवधि के लिए पासपोर्ट जारी करें।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि याचिकाकर्ता विदेश यात्रा करना चाहता है, तो उसे अनुमति के लिए उचित ट्रायल कोर्ट में आवेदन करना होगा, जहाँ कोर्ट अपनी शर्तों पर निर्णय लेने के लिए स्वतंत्र होगा। साथ ही, पासपोर्ट जारी करने के किसी भी आवेदन का निपटारा आवेदन की तारीख से चार सप्ताह के भीतर तेजी से किया जाना चाहिए।
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