अहमदाबाद: कहते हैं कानून के हाथ बहुत लंबे होते हैं और देर-सवेर मुजरिम तक पहुंच ही जाते हैं। ऐसा ही कुछ हुआ है अहमदाबाद के 50 वर्षीय ईश्वरजी ठाकोर के साथ। ईश्वरजी फिलहाल लकवाग्रस्त (paralytic) हैं, वे न तो खुद से चल सकते हैं और न ही अपने रोजमर्रा के काम कर सकते हैं। लेकिन, करीब 25 साल पहले किए गए एक अपराध की सजा उन्हें अब भुगतनी होगी।
गुजरात हाईकोर्ट ने एक अहम फैसला सुनाते हुए उन्हें अपनी पत्नी की हत्या का दोषी करार दिया है और भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 302 के तहत आजीवन कारावास की सजा सुनाई है।
अदालत ने सजा सुनाते हुए यह भी स्पष्ट किया कि जेल अधिकारी कानून के मुताबिक उनकी समय से पहले रिहाई (premature release) के मामले की जांच करने के लिए स्वतंत्र होंगे।
क्या था पूरा मामला?
यह घटना साल 2000 के अक्टूबर महीने की है। बनासकांठा जिले के दियोदर तालुका में ईश्वरजी ठाकोर ने अपनी पत्नी वर्षा की जान ले ली थी। उस समय मामला निचली अदालत (ट्रायल कोर्ट) में चला। साल 2002 में ट्रायल कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि यह सुनियोजित हत्या (premeditated murder) नहीं थी। इसके आधार पर, कोर्ट ने उन्हें IPC की धारा 304 पार्ट-I (गैर-इरादतन हत्या) के तहत दोषी माना और सात साल की सजा सुनाई।
ईश्वरजी ने 2002 में ही इस सजा को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी, जहां उन्हें जमानत मिल गई थी। दूसरी ओर, राज्य सरकार ने भी निचली अदालत के फैसले के खिलाफ अपील दायर की। सरकार का तर्क था कि यह अपराध सीधे तौर पर ‘हत्या’ की श्रेणी में आता है, इसलिए दोषी को सख्त से सख्त सजा मिलनी चाहिए।
हाईकोर्ट ने बदला फैसला: चाकू का होना साबित करता है इरादा
राज्य सरकार की अपील पर सुनवाई करते हुए जस्टिस अनिरुद्ध मायी और जस्टिस एल जे ओडेड्रा की पीठ ने मामले की बारीकी से जांच की। जजों ने पाया कि घटना के समय ईश्वरजी के पास पहले से ही चाकू मौजूद था। कोर्ट ने कहा कि यह दावा करना गलत है कि हत्या की पहले से कोई योजना नहीं थी।
बेंच ने इस बात पर जोर दिया कि आरोपी ने अपनी पत्नी के शरीर के नाजुक अंगों पर चाकू से 8 से 9 वार किए थे, जो साफ तौर पर हत्या के इरादे को दर्शाता है।
इसी सप्ताह जारी अपने आदेश में बेंच ने कहा, “आरोपी की धारा 304 पार्ट-I के तहत सजा को रद्द किया जाता है और हम उसे भारतीय दंड संहिता की धारा 302 (हत्या) के तहत दोषी करार देते हैं।”
आरोपी की दलील: ‘मैं लकवाग्रस्त हूँ’
सजा पर बहस के दौरान हाईकोर्ट को बताया गया कि ईश्वरजी के शरीर का दाहिना हिस्सा लकवे (paralysis) से प्रभावित है। उनकी हालत ऐसी है कि वे बिना सहारे के चल नहीं सकते और उन्हें दिनचर्या के कामों के लिए भी मदद की जरूरत पड़ती है। उन्हें नियमित फिजियोथेरेपी और दवाओं की आवश्यकता है।
जब कोर्ट ने ईश्वरजी से सजा की मात्रा पर कुछ कहने को कहा, तो उन्होंने सिर्फ इतना कहा कि वह लकवाग्रस्त हैं। उनके वकील ने उनकी शारीरिक स्थिति का हवाला देते हुए जेल के बजाय ‘होम कस्टडी’ (घर पर हिरासत) की मांग की।
31 मार्च तक करना होगा सरेंडर
हालाँकि, हाईकोर्ट ने अपराध की गंभीरता को देखते हुए होम कस्टडी की मांग खारिज कर दी और उम्रकैद की सजा सुनाई। लेकिन, कोर्ट ने मानवीय आधार पर एक राहत भी दी।
आदेश में कहा गया, “उक्त सजा इस शर्त के अधीन रहेगी कि सक्षम प्राधिकारी लागू कानून के तहत आरोपी की सजा माफी (remission) के मामले की जांच करने के लिए स्वतंत्र होंगे।”
ईश्वरजी ठाकोर को जेल अधिकारियों के सामने सरेंडर करने के लिए 31 मार्च तक का समय दिया गया है।
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