पश्चिम एशिया में चल रहे युद्ध के कारण गुजरात के कई औद्योगिक क्षेत्रों में एक बार फिर से श्रम संकट गहराने लगा है। कोविड-19 महामारी के दौरान हुए पलायन की डरावनी यादें एक बार फिर ताज़ा हो गई हैं। औद्योगिक गैस की आपूर्ति में भारी कटौती के कारण मोरबी, सूरत और अहमदाबाद जैसे प्रमुख विनिर्माण केंद्रों में उत्पादन बुरी तरह प्रभावित हुआ है।
सिरेमिक, रसायन, कपड़ा और प्लास्टिक जैसे उद्योगों पर निर्भर रहने वाले कारखाने या तो उत्पादन कम कर रहे हैं या अस्थायी रूप से बंद हो रहे हैं।
काम के घंटे कम होने और रसोई गैस (LPG) की बढ़ती कीमतों के कारण प्रवासी मजदूर अपने गृह राज्यों की ओर लौटने लगे हैं। मुख्य रूप से ओडिशा, बिहार, राजस्थान और उत्तर प्रदेश के श्रमिकों का पलायन शुरू हो गया है।
गुजरात चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री (GCCI) के पूर्व सचिव सचिन पटेल का कहना है कि छह साल बाद फिर से वैसी ही स्थिति दिख रही है और एक बार श्रमिक वापस चले जाते हैं, तो उन्हें वापस लाना बहुत मुश्किल हो जाता है।
कपड़ा उद्योग में महंगे रसोई गैस की मार
देश के सबसे बड़े मानव निर्मित कपड़ा केंद्र सूरत में पिछले कुछ हफ्तों से श्रमिकों की भारी कमी देखी जा रही है। फेडरेशन ऑफ गुजरात वीवर्स वेलफेयर एसोसिएशन (FOGWA) के अध्यक्ष अशोक जीरावाला ने बताया कि 500 से 600 रुपये प्रतिदिन कमाने वाले श्रमिकों को रसोई गैस सिलेंडर के लिए एक बड़ी रकम खर्च करनी पड़ रही है।
स्थानीय स्तर पर गैस 200 रुपये प्रति किलोग्राम तक बिक रही है। इससे परेशान होकर मजदूर बिहार, उत्तर प्रदेश और ओडिशा लौट रहे हैं।
SGCCI के अध्यक्ष निखिल मद्रासी ने चेतावनी दी है कि यदि इस समस्या का समाधान नहीं हुआ, तो सूरत के कपड़ा और हीरा उद्योगों के लिए गंभीर चुनौतियां खड़ी हो सकती हैं। GCCI कपड़ा समिति के अध्यक्ष मिराज शाह के अनुसार, वर्तमान में लगभग 30% मजदूर अनुपस्थित हैं, जिसका सीधा असर परिधान इकाइयों पर पड़ा है।
रसायन क्षेत्र से मजदूरों का पलायन
अहमदाबाद के वटवा और नरोदा जैसे रसायन हब में भी स्थिति बेहद चिंताजनक है। कारखानों को उनकी कुल आवश्यकता की मात्र 40% गैस मिल रही है, जिससे उनकी उत्पादन क्षमता काफी घट गई है।
एलपीजी की कमी और कालाबाजारी ने समस्या को और बढ़ा दिया है। वटवा इंडस्ट्रीज एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष भूपेंद्र पटेल के अनुसार, अहमदाबाद में लगभग 700 रासायनिक कारखाने हैं जिनमें 50,000 श्रमिक काम करते हैं। गैस की कमी के कारण ये इकाइयाँ वर्तमान में केवल 40% क्षमता पर चल रही हैं।
GCCI के पूर्व अध्यक्ष नटू पटेल ने भी चिंता जताई है कि कई श्रमिक होली की छुट्टी के बाद काम पर नहीं लौटे हैं और अगर स्थिति में सुधार नहीं हुआ, तो और भी मजदूर वापस जा सकते हैं।
निर्माण क्षेत्र में होली के बाद सन्नाटा
निर्माण क्षेत्र में श्रमिकों की कमी सीधे तौर पर युद्ध का परिणाम नहीं है, बल्कि यह होली के त्योहार और वर्तमान अनिश्चितताओं का मिला-जुला असर है। क्रेडाई (CREDAI) गुजरात के अध्यक्ष तेजस जोशी के मुताबिक, निर्माण क्षेत्र के लगभग 80% श्रमिक प्रवासी हैं और उनमें से 50% होली के बाद काम पर नहीं लौटे हैं। इसके साथ ही कच्चे माल की कमी भी एक समस्या बनी हुई है।
एक रियल एस्टेट कंपनी के प्रबंध निदेशक तरल शाह ने बताया कि सिरेमिक और एल्यूमीनियम पाइप जैसे कच्चे माल की आपूर्ति बाधित होने से फिनिशिंग स्टेज की परियोजनाओं में देरी हो रही है। अहमदाबाद में क्रेडाई के सचिव अंकुर देसाई का कहना है कि डेवलपर्स श्रमिकों को बेहतर आवास और सुविधाएं देकर उन्हें रोकने की हर संभव कोशिश कर रहे हैं।
सिरेमिक उद्योग सतर्क लेकिन आशान्वित
गुजरात के सबसे अधिक श्रम-गहन क्षेत्रों में से एक, मोरबी का सिरेमिक उद्योग भी वर्तमान हालातों से जूझ रहा है। इस उद्योग में लगभग चार लाख कर्मचारी काम करते हैं, जिनमें से ज्यादातर उत्तर प्रदेश, बिहार, ओडिशा और झारखंड से हैं।
मोरबी सिरेमिक मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष नरेंद्र संघत ने बताया कि प्रोपेन गैस पर निर्भर 50% इकाइयां उत्पादन रोक चुकी हैं। वहीं, गुजरात गैस पर चलने वाली बाकी 45% इकाइयां काम कर रही हैं, लेकिन उन्हें अपनी औसत खपत का केवल 80% ही मिल पा रहा है।
कठिन परिस्थितियों के बावजूद, उद्योग अपने कार्यबल को बनाए रखने के लिए लगातार वेतन का भुगतान कर रहे हैं। एक सिरेमिक फर्म के प्रमोटर हरेश बोपालिया ने उम्मीद जताई है कि कोविड के विपरीत, इस बार स्थिति जल्द ही स्थिर हो जाएगी और उद्योग अपने श्रमिकों को रोकने में सक्षम होंगे।
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