अहमदाबाद: गुजरात के कई हिस्सों में एलपीजी (LPG) सिलेंडरों की लगातार हो रही किल्लत ने राज्य के आभूषण उद्योग को बुरी तरह प्रभावित किया है। इस संकट का सबसे ज्यादा खामियाजा छोटे सुनारों और कारीगरों को भुगतना पड़ रहा है। सोने, चांदी और आर्टिफिशियल (इमिटेशन) ज्वेलरी बनाने वाले सभी कारोबारी इस समस्या से जूझ रहे हैं।
गहनों की सोल्डरिंग (टांका लगाने), उन्हें पिघलाने और मरम्मत करने के लिए कारीगर मुख्य रूप से एलपीजी से चलने वाले फ्लेम टॉर्च पर निर्भर होते हैं। सिलेंडरों की आपूर्ति में आई इस कमी के कारण कई छोटी वर्कशॉप्स ने गैस का उपयोग सीमित कर दिया है या अपना उत्पादन ही घटा दिया है।
श्री माणेक चौक चोकसी महाजन के महासचिव हेमंत चोकसी ने इस संकट पर चिंता जताते हुए कहा कि इसका सीधा असर धातु के काम के मूल ढांचे पर पड़ रहा है। उनके मुताबिक, आभूषणों को जोड़ने के लिए सोल्डरिंग जरूरी है और इसके लिए गोंद का इस्तेमाल कोई विकल्प नहीं है।
उन्होंने आगे बताया कि फ्लेम टॉर्च और सोल्डरिंग गन पूरी तरह से गैस पर निर्भर हैं। बहुत कम लोग ही इलेक्ट्रिक टॉर्च का उपयोग करते हैं, इसलिए गैस की यह कमी कारीगरों की कमर तोड़ रही है। उन्होंने चेतावनी दी कि अगर यह किल्लत लंबी खिंची, तो आभूषणों के मेकिंग चार्ज (बनवाई) में भारी उछाल आ सकता है।
इस स्थिति के चलते पूरी वैल्यू चेन में उत्पादन का शेड्यूल बिगड़ गया है। स्वतंत्र डिजाइनरों और ब्रांड्स को भी भारी दबाव का सामना करना पड़ रहा है। अहमदाबाद में एक ज्वेलरी ब्रांड की संस्थापक निर्झरी शाह ने बताया कि उत्पादन भले ही जारी है, लेकिन मुश्किलें साफ नजर आ रही हैं।
निर्झरी के मुताबिक, उनके कोलकाता स्थित कारीगरों को अक्सर बिचौलियों के जरिए ऊंची कीमतों पर गैस सिलेंडर खरीदने पड़ रहे हैं। उत्पादन घटने की वजह से अब वे अपनी इन्वेंट्री को व्यवस्थित कर रहे हैं और सिर्फ जरूरत के हिसाब से ही ऑर्डर दे रहे हैं।
अहमदाबाद की एक अन्य ज्वेलरी ब्रांड संस्थापक प्रियंका देसाई के अनुसार, ज्वेलरी डिलीवरी का समय पहले ही काफी बढ़ चुका है। उनके ज्यादातर वेंडर गैस यूनिट्स पर निर्भर हैं और सिलेंडर न मिलने पर उनका काम ठप हो जाता है।
प्रियंका ने बताया कि वेंडर्स को सिलेंडर दिलाने में मदद करने के कारण निर्माण लागत में मामूली बढ़ोतरी हुई है। जो डिलीवरी पहले 6-7 दिनों में हो जाती थी, उसमें अब 10-12 दिन तक का समय लग रहा है।
इस हालात के बीच उद्यमियों को इस बात का डर सता रहा है कि अगर यह स्थिति लंबे समय तक बनी रही, तो स्थिर सप्लाई वाले बड़े खिलाड़ियों और छोटे, असंगठित कारीगरों के बीच की खाई और ज्यादा गहरी हो जाएगी।
माणेक चौक इमिटेशन ज्वेलरी एसोसिएशन के अध्यक्ष संजय सोनी ने बताया कि इस किल्लत का असर इमिटेशन (आर्टिफिशियल) ज्वेलरी के निर्माण पर भी पड़ रहा है। हालांकि, मौसमी मंदी के कारण फिलहाल इसका तुरंत प्रभाव थोड़ा कम है। उन्होंने ध्यान दिलाया कि हाथ से बनने वाली 30-40 प्रतिशत ज्वेलरी का काम आज भी एलपीजी पर ही निर्भर है।
संजय सोनी ने स्पष्ट किया कि करीब 60 प्रतिशत पीतल की ज्वेलरी बनाने में कास्टिंग मशीनों का उपयोग होता है और कुछ लोग इलेक्ट्रिक सोल्डरिंग की तरफ भी गए हैं। इसके बावजूद, आभूषणों के बारीकी वाले काम के लिए कई कारीगरों को अभी भी एलपीजी की ही जरूरत होती है।
यह समूचा उद्योग 12,000 से अधिक परिवारों का भरण-पोषण करता है और पहले से ही कमजोर मांग तथा बढ़ती लागत के संकट से जूझ रहा है। अकेले माणेक चौक और कालूपुर इलाके में ही कम से कम 500 इमिटेशन ज्वेलरी व्यापारी काम करते हैं।
सोनी ने चेतावनी दी है कि यदि गैस की यह कमी लगातार बनी रही, तो मेकिंग चार्ज बढ़ सकता है और आने वाले समय में कुल लागत में 20-25 प्रतिशत तक का इजाफा हो सकता है।
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