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गुजरात: घोड़ी चढ़ने पर दलित दूल्हे पर तलवारों से हमला, पाटन में फिर शर्मसार हुई इंसानियत

| Updated: February 3, 2026 15:08

पाटन में शादी की खुशियों में घोला जहर: घोड़ी चढ़ने पर दलित दूल्हे पर तलवारों से हमला, जातिवाद का क्रूर चेहरा बेनकाब

पाटन: एक तरफ जहां भारत ‘डिजिटल इंडिया’ और वैश्विक महाशक्ति बनने का दम भर रहा है, वहीं गुजरात के पाटन जिले से आई एक खबर ने देश की सामाजिक प्रगति पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। यहां जातिवाद का ऐसा घिनौना चेहरा सामने आया है, जिसने साबित कर दिया है कि सदियों पुरानी कुप्रथाएं आज भी समाज की जड़ों में कितनी गहराई तक समाई हुई हैं।

सोमवार को पाटन के चंद्रूमाना गांव में जो हुआ, उसने खुशियों के माहौल को दहशत में बदल दिया। दलित समुदाय से आने वाले विशाल चावड़ा के लिए यह उनकी जिंदगी का सबसे खास दिन होना चाहिए था, लेकिन ‘जाति के पहरेदारों’ ने इसे एक बुरे सपने में तब्दील कर दिया। जैसे ही विशाल अपनी शादी की रस्म (वरघोड़ा) के लिए घोड़ी पर सवार हुए, वहां संगीत की जगह तलवारों की खनखनाहट गूंज उठी।

समानता बना ‘अपराध’

गांव के चश्मदीदों के मुताबिक, वरघोड़े के दौरान प्रभुत्वशाली समुदाय के कुछ लोगों ने बारात को रोक लिया। इन लोगों को एक दलित युवक का घोड़ी पर चढ़ना अपनी ‘शान’ के खिलाफ लगा। उनका मानना था कि घोड़ी पर चढ़ना केवल उनका विशेषाधिकार है।

आरोप है कि हमलावरों ने चिल्लाते हुए कहा, “इस गांव में एक दलित की घोड़ी पर चढ़ने की हिम्मत कैसे हुई?”

देखते ही देखते माहौल हिंसक हो गया। हाथों में नंगी तलवारें लिए भीड़ ने खुल्लम-खुल्ला गुंडागर्दी शुरू कर दी। न केवल दूल्हे को धमकाया गया, बल्कि बारातियों के साथ भी मारपीट की गई। शादी के जश्न को एक विद्रोह के रूप में देखा गया, मानो घोड़ी पर बैठना सामाजिक मर्यादा का उल्लंघन हो।

कानून के बावजूद नहीं बदला नजरिया

यह घटना गुजरात के लिए कोई नई नहीं है। गांधीनगर से लेकर बनासकांठा तक, दलित दूल्हों को घोड़ी चढ़ने से रोकने का एक सिलसिला सा चल पड़ा है। एससी/एसटी (SC/ST) एक्ट जैसे कड़े कानून मौजूद होने के बावजूद, समाज का एक वर्ग इसे अपने वर्चस्व की लड़ाई मानता है और हिंसा के जरिए दलितों को ‘दबाने’ की कोशिश करता है।

हालांकि, स्थानीय प्रशासन ने मुस्तैदी दिखाते हुए एफआईआर (FIR) दर्ज कर ली है और कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए पुलिस बल तैनात कर दिया है। लेकिन विशाल और उनके परिवार के मन पर लगे डर के घाव शायद ही इतनी जल्दी भर पाएं।

इतिहास खुद को दोहरा रहा है

यह नफरत की आग पहले भी कई बार सुलग चुकी है:

  • फरवरी 2024: गांधीनगर के चड़ासणा गांव में विकास चावड़ा नाम के एक अन्य दलित दूल्हे को घोड़ी से नीचे खींच लिया गया था और चार लोगों ने उन्हें सरेआम थप्पड़ मारे थे।
  • 2020: जातिगत नफरत का आलम यह था कि एक आर्मी जवान की बारात पर सिर्फ इसलिए पथराव किया गया क्योंकि वह घोड़ी पर सवार था।

पाटन की इस घटना ने एक बार फिर यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या हम वाकई 21वीं सदी में जी रहे हैं, या हमारी मानसिकता आज भी सामंती युग में कैद है?

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