गुजरात विधानसभा ने 25 मार्च, 2026 को समान नागरिक संहिता (UCC) विधेयक पारित किया। इसके साथ ही सभी धार्मिक समुदायों के लिए एक समान पारिवारिक कानून लागू हो गया है। फरवरी 2024 में उत्तराखंड के बाद ऐसा करने वाला गुजरात दूसरा राज्य बन गया है। यह लेख संवैधानिक अधिकारों और लैंगिक न्याय के नजरिए से गुजरात के समान नागरिक संहिता के प्रमुख प्रावधानों का परीक्षण करता है।
परिवार की संकीर्ण कल्पना
भारत में पारिवारिक कानून मुख्य रूप से ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन और विक्टोरियन नैतिकता से प्रभावित हैं। ये कानून परिवार की विषमलैंगिक (heteronormative), एकविवाही और पितृसत्तात्मक अवधारणा पर आधारित हैं। ऐसे देश के लिए जो कानूनों को औपनिवेशिक प्रभाव से मुक्त करना चाहता है, परिवार को केवल पति, पत्नी और उनके बच्चों तक सीमित रखना पूरी तरह से अतार्किक है।
यह संकीर्ण सोच कई गैर-विषमलैंगिक और गैर-जैविक पारिवारिक व्यवस्थाओं के अस्तित्व को मिटा देती है। ये व्यवस्थाएं ऐतिहासिक रूप से मौजूद रही हैं और आज भी कानूनी दायरे से बाहर अस्तित्व में हैं। इनमें गुजरात में ‘मैत्री करार’, राजस्थान में ‘नाता’, केरल में ‘संबंधम’, हरियाणा में ‘करेवा’ या ‘चादर अंदाजी’, झारखंड में ‘ढुकू’, हिजड़ा घराने, क्वीर (queer) रिश्ते, स्वेच्छा से चुने गए परिवार और पॉलीअमरी (बहुपतित्व/बहुपत्नीत्व) शामिल हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने इन्हें “असामान्य परिवार” (atypical families) कहा है। इनमें से इलियास (1989, मध्य प्रदेश) और स्वीटी (2016, हिमाचल प्रदेश) जैसे फैसलों के माध्यम से हिजड़ा घरानों को संपत्ति के हस्तांतरण के संदर्भ में सीमित कानूनी मान्यता मिली है। हालांकि इंटरसेक्स और नॉन-बाइनरी समुदायों के बीच मौजूद इसी तरह के चुने हुए परिवारों को कोई कानूनी मान्यता नहीं मिली है।
साल 2022 के दीपिका सिंह फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने मातृत्व अवकाश के एक मामले में परिवार की पारंपरिक परिभाषा का विस्तार किया था। अदालत ने इसमें घरेलू, अविवाहित साझेदारियों और क्वीर रिश्तों को शामिल किया। कोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा कि कानून का इस्तेमाल उन परिवारों को नुकसान पहुंचाने के लिए नहीं होना चाहिए जो पारंपरिक परिवारों से अलग हैं। ‘एक्स बनाम प्रमुख सचिव’ (2022) मामले में भी सुप्रीम कोर्ट ने जोर देकर कहा कि परिवार की असामान्य अभिव्यक्तियां भी कानून के तहत समान सुरक्षा की हकदार हैं।
साल 2025 में ‘एम.ए. बनाम पुलिस अधीक्षक’ मामले में मद्रास उच्च न्यायालय ने इन फैसलों का हवाला देते हुए एक बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका के संदर्भ में परिवार की कानूनी समझ को और व्यापक बनाया। यह याचिका एक महिला द्वारा दायर की गई थी जिसकी समलैंगिक पार्टनर को उसके जैविक परिवार ने कथित तौर पर बंधक बना लिया था।
अदालत ने कहा कि परिवार की कानूनी परिभाषा केवल शादी, खून के रिश्तों या बच्चों तक सीमित नहीं होनी चाहिए। विवाह ही परिवार बनाने का एकमात्र तरीका नहीं है। अदालत ने ‘चुने हुए परिवारों’ की अवधारणा को स्वीकार किया, जहां लोग आपसी प्रेम, देखभाल और समर्थन के आधार पर अपनी पसंद के व्यक्तियों के साथ परिवार जैसे बंधन बनाते हैं।
यह ट्रांसजेंडर और क्वीर व्यक्तियों के लिए विशेष रूप से प्रासंगिक है जिन्हें उनके जैविक परिवार अस्वीकार कर सकते हैं। यह उन लोगों तक भी विस्तारित हो सकता है जो अपनी मर्जी से सिंगल रहना चुनते हैं। संविधान के अनुच्छेद 21 द्वारा गारंटीकृत जीवन के मौलिक अधिकार का हवाला देकर अदालत ने परिवार की परिभाषा के विस्तार के लिए एक बेहद मजबूत आधार तैयार किया है।
उत्तराखंड यूसीसी की तरह ही गुजरात यूसीसी ने भी इन महत्वपूर्ण अदालती फैसलों पर कोई संज्ञान नहीं लिया है। जहां न्यायिक फैसले विविध प्रकार के परिवारों को मान्यता देने की दिशा में कदम बढ़ा रहे हैं, वहीं गुजरात यूसीसी शादी और परिवार के रूढ़िवादी और प्रतिबंधात्मक सामाजिक-कानूनी रूपों की ओर वापस लौटता है।
यह अन्य सभी पारिवारिक रूपों को अदृश्य कर देता है और ऐसे रिश्तों में रहने वाले लोगों को कानूनी सुरक्षा से पूरी तरह बाहर कर देता है। परिवार की कानूनी परिभाषा को यौन और लैंगिक पहचान, रोमांस, विवाह और सेक्स से अलग करके आपसी देखभाल और निर्भरता के आधार पर अधिक व्यापक और समावेशी बनाया जा सकता था।
विवाह में जेंडर विविध व्यक्तियों के अधिकारों का बहिष्कार
परिवार की संकीर्ण अवधारणा के कारण सभी पारिवारिक कानून जेंडर बाइनरी (पुरुष, महिला, पति, पत्नी, दूल्हा, दुल्हन) की भाषा बोलते हैं। जो लोग खुद को इस जेंडर बाइनरी से परे मानते हैं, वे पारिवारिक कानूनों के भीतर किसी भी अधिकार से वंचित रह जाते हैं। साल 2019 में मद्रास उच्च न्यायालय की मदुरै पीठ ने एक ऐतिहासिक फैसले में हिंदू विवाह अधिनियम में ‘दुल्हन’ शब्द की व्याख्या की। इसमें न केवल सिस महिला (जन्म से महिला) बल्कि ट्रांस महिला को भी शामिल किया गया। साल 2023 में सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले की पुष्टि की, जिससे यह पूरे देश में लागू हो गया।
नाज़ फाउंडेशन, नालसा और नवतेज सिंह जौहर जैसे फैसलों ने जेंडर पहचान के आत्म-निर्धारण के महत्व पर जोर दिया था। मद्रास उच्च न्यायालय के फैसले के साथ पढ़े जाने पर यह स्पष्ट था कि खुद को ट्रांस महिला मानने वाले व्यक्ति को हिंदू विवाह अधिनियम के तहत ‘दुल्हन’ माना जाएगा।
हालांकि 25 और 26 मार्च, 2026 को लोकसभा और राज्यसभा द्वारा क्रमशः ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) संशोधन अधिनियम, 2026 पारित किया गया। यह अधिनियम ट्रांसजेंडर होने के लिए मेडिकल बोर्ड के प्रमाणन को अनिवार्य बनाता है। इस संशोधन ने गरिमा, निजता और शारीरिक स्वायत्तता के मौलिक अधिकारों पर आधारित पुराने फैसलों की दिशा को गंभीर झटका दिया है।
इस बदले हुए कानूनी परिदृश्य में यह स्पष्ट नहीं है कि हिंदू विवाह अधिनियम के तहत ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के सिस (cis) पार्टनर से शादी करने के मौजूदा अधिकार भविष्य में सीमित होंगे या नहीं। गुजरात यूसीसी हमें इस जटिल स्थिति के बारे में कोई संकेत नहीं देता है।
साल 2023 में दिए गए सुप्रीम कोर्ट के सुप्रियो फैसले ने समान-लिंग वाले विवाहों को वैध नहीं बनाया और LGBTQIA+ समुदायों को शादी करने के अधिकार से वंचित कर दिया। लेकिन इसने संसद या राज्य विधानसभाओं को ऐसे विवाहों को मान्यता देने से नहीं रोका। फैसले में दोहराया गया कि समान-लिंग वाले विवाहों पर कानून बनाने की शक्ति विधायिका के पास है।

साल 2025 में मद्रास उच्च न्यायालय ने उस महिला से मुलाकात की जिसे उसके परिवार ने हिरासत में रखा था, और पुष्टि की कि वह एक सहमति वाले समान-लिंग संबंध में थी। अदालत ने बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका की अनुमति देकर उसे मुक्त कर दिया। अदालत ने दीपिका सिंह फैसले के आधार पर यह भी कहा कि समान-लिंग वाले जोड़ों को परिवार बनाने का अधिकार है।
जब तक पारिवारिक कानूनों में समान-लिंग वाले जोड़ों के अधिकार स्पष्ट नहीं किए जाते, तब तक परिवार बनाने का अधिकार खोखला ही रहेगा। यह राज्य विधानसभाओं के अधिकार क्षेत्र में आता है। चूंकि गुजरात यूसीसी इन फैसलों के बाद अधिनियमित किया गया था, इसलिए यह समान-लिंग वाले रिश्तों को मान्यता देने और पारिवारिक कानूनों के भीतर उनके अधिकारों को स्पष्ट करने का एक सही अवसर था।
दिसंबर 2005 में दक्षिण अफ्रीकी संवैधानिक न्यायालय ने माना था कि विवाह की सामान्य कानून परिभाषा असंवैधानिक है यदि वह समान-लिंग वाले जोड़ों को विषमलैंगिक जोड़ों के समान अधिकार नहीं देती। साल 2023 में नेपाल के सुप्रीम कोर्ट ने भी समान-लिंग वाले विवाहों के पंजीकरण का निर्देश दिया। इन फैसलों से सीख लेना गुजरात विधानसभा के लिए एक बड़ी उपलब्धि साबित हो सकता था।
विवाह, तलाक और शून्यता की डिक्री का पंजीकरण
गुजरात यूसीसी की धारा 4 में विवाह के लिए शर्तें निर्धारित की गई हैं। इनमें एकविवाह, मानसिक क्षमता, आयु सीमा (पुरुषों के लिए न्यूनतम 21 वर्ष और महिलाओं के लिए 18 वर्ष) और निषिद्ध रिश्ते शामिल हैं। ये शर्तें विशेष विवाह अधिनियम 1954, हिंदू विवाह अधिनियम 1955 और भारतीय ईसाई विवाह अधिनियम 1872 जैसी वर्तमान विधियों के समान हैं। भारत के विधि आयोग ने अपनी 205वीं रिपोर्ट (2008) में पुरुषों और महिलाओं के लिए अलग-अलग आयु मानदंड को हटाने और दोनों पक्षों के लिए 18 वर्ष की समान आयु का सुझाव दिया था। इसे गुजरात और उत्तराखंड दोनों यूसीसी द्वारा नजरअंदाज कर दिया गया है।
गुजरात यूसीसी की धारा 6 और 7 के तहत विवाह का पंजीकरण अनिवार्य कर दिया गया है और धारा 10 में इसकी प्रक्रिया निर्धारित की गई है। इसके अलावा धारा 9 के तहत तलाक और शून्यता की डिक्री को पंजीकृत करना भी आवश्यक है। धारा 35 के तहत यूसीसी के शुरू होने से पहले या बाद में हुए विवाहों को केवल यूसीसी प्रावधानों के अनुसार ही भंग किया जा सकता है। यह प्रथागत तलाक और गैर-न्यायिक मंचों के माध्यम से होने वाले तलाक को रोकता है।
विवाह पंजीकृत न करने पर उसे अमान्य नहीं माना जाएगा (धारा 20 के अनुसार)। लेकिन जानबूझकर जानकारी न देने या लापरवाही बरतने पर धारा 17 के तहत 10,000 रुपये तक के जुर्माने का प्रावधान है। यह दंडात्मक प्रावधान नई दुल्हनों को असमान रूप से प्रभावित करेगा, जिनकी पंजीकरण के फैसलों में बहुत कम भागीदारी हो सकती है, लेकिन उन्हें इसका समान परिणाम भुगतना होगा।
धारा 6, 7 और 10 के संयुक्त पठन से विवाह के पंजीकरण के लिए तीन संदर्भ और विशिष्ट प्रक्रियाएं सामने आती हैं। पहला, जहां विवाह यूसीसी के लागू होने से पहले गुजरात के भीतर हुआ था और गुजरात विवाह पंजीकरण अधिनियम (GRMA) 2006 के तहत पंजीकृत था। दूसरा, जहां विवाह जीआरएमए शुरू होने से पहले हुआ था और कम से कम एक पक्ष गुजरात का निवासी था। तीसरा, जहां विवाह यूसीसी लागू होने के बाद गुजरात में हुआ हो।
धारा 7 के परंतुक के अनुसार जीआरएमए के तहत संपन्न और पंजीकृत विवाह को यूसीसी के तहत पंजीकृत माना जाएगा। ये प्रावधान दर्शाते हैं कि गुजरात यूसीसी गुजरात के सभी निवासियों के सभी वैवाहिक अधिकारों को नियंत्रित करने वाला एकमात्र स्वतंत्र पारिवारिक कानून नहीं होगा।
फरवरी 2026 में गुजरात विधानसभा में पेश किए गए एक विधेयक का उद्देश्य विवाहों के पंजीकरण से संबंधित जीआरएमए के प्रावधानों में संशोधन करना है। इसमें रजिस्ट्रार के लिए यह अनिवार्य करना शामिल है कि वह विवाह प्रमाण पत्र जारी करने से पहले स्थानीय समाचार पत्रों, सोशल मीडिया और पंजीकृत डाक के माध्यम से दोनों पक्षों के रक्त संबंधियों को सूचित करे या सार्वजनिक डोमेन में 30 दिनों के लिए नोटिस जारी करे।
इस संशोधन का सीधा उद्देश्य विवाह के लिए कानूनी उम्र पूरी कर चुके वयस्क व्यक्तियों के लिए अपने विवाह के पंजीकरण हेतु माता-पिता या परिवार की सहमति मांगना अनिवार्य बनाना है। हालांकि इसे कमजोर लोगों की सुरक्षा के उपाय के रूप में उचित ठहराया जाता है, लेकिन यह मूल रूप से अंतर-जातीय, अंतर-धार्मिक और अंतर-वर्गीय पसंद के विवाहों को हतोत्साहित करता है जिन पर परिवार आपत्ति कर सकता है।
विशेष विवाह अधिनियम (SMA) के तहत अनिवार्य नोटिस व्यवस्था की आलोचना यहां भी लागू होती है। सफिया सुल्ताना फैसले (2021) में इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने माना था कि एसएमए के तहत नोटिस का प्रकाशन और आपत्तियां आमंत्रित करना जोड़े की निजता के मौलिक अधिकार का उल्लंघन है।
अदालत ने इसे क्रूर और अनैतिक बताया था। प्रस्तावित संशोधन एसएमए के तहत नोटिस व्यवस्था के ही समान है, और एक कदम आगे जाता है।
इस प्रस्तावित संशोधन और संवैधानिक अधिकारों के संभावित उल्लंघन पर चर्चा होती रही है। जो बात कानूनी स्थिति को अधिक जटिल बनाती है, वह है गुजरात यूसीसी पर इस संशोधन का प्रभाव। यूसीसी की धारा 10 में पक्षों को शादी के साठ दिनों के भीतर एक “निर्धारित तरीके” से ज्ञापन प्रस्तुत करने की आवश्यकता है।
हालांकि यह प्रारूप यूसीसी की किसी भी अनुसूची में नहीं दिया गया है। यह स्पष्ट नहीं है कि क्या भविष्य में अधिसूचित होने वाले नियमों के माध्यम से पेश किया गया ज्ञापन जीआरएमए के प्रस्तावित संशोधन के अनुरूप होगा या नहीं।
लिव-इन रिलेशनशिप का अनिवार्य पंजीकरण
लिव-इन रिलेशनशिप को न केवल जन्म देने वाले परिवार द्वारा अस्वीकार किया जाता है, बल्कि कई मामलों में परिवार, समुदाय के नेता और स्वयंभू समूह जोड़े के खिलाफ ‘ऑनर किलिंग’ जैसे अपराध करने के लिए मिलीभगत करते हैं। जब कोई जोड़ा शादी किए बिना एक साथ रहने का विकल्प चुनता है, तो वे पारिवारिक कानूनों द्वारा शासित न होने की अपनी स्वायत्तता का प्रयोग करते हैं।
इसके विपरीत, लिव-इन रिलेशनशिप के अनिवार्य पंजीकरण की आवश्यकता वाले प्रावधान उन पर पारिवारिक कानून थोपते हैं।
ऐसे प्रावधान पहली बार उत्तराखंड यूसीसी की धारा 378-389 में शामिल किए गए थे और इनकी काफी आलोचना हुई थी। आलोचकों का तर्क था कि यह युवाओं की कामुकता को नियंत्रित करने का प्रयास है, युवा जोड़ों को राज्य की ताकत के खिलाफ खड़ा करता है, यौन स्वायत्तता को खत्म करता है और महिलाओं की एजेंसी के खिलाफ एक युद्ध है।
कड़ी आलोचना के बावजूद इन प्रावधानों को गुजरात यूसीसी की धारा 384-395 में लगभग उसी भाषा में दोहराया गया है। इसमें लिव-इन रिलेशनशिप में बल, जबरदस्ती या धोखाधड़ी से किसी की सहमति प्राप्त करने पर दंड निर्धारित करने वाला एक नया प्रावधान [धारा 393(4)] जोड़ा गया है।
इसके अलावा एक नाबालिग के साथ लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाले एक वयस्क को POCSO अधिनियम, 2012 के तहत दंडित करने का प्रावधान भी है [धारा 393(6)]।
पिछले कुछ दशकों में उच्च न्यायपालिका ने अंतरंग संबंधों में एक वयस्क व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वतंत्रता, निजता और निर्णयात्मक स्वायत्तता के मौलिक अधिकार के इर्द-गिर्द एक मजबूत न्यायशास्त्र का निर्माण किया है।
इसमें लता सिंह (2006), अरुमुगम सर्वई (2011), आशा रंजन (2017), शफीन जहां (2018) और शक्ति वाहिनी (2018) जैसे सुप्रीम कोर्ट के फैसले शामिल हैं। खुशबू (2010) के फैसले में सुप्रीम कोर्ट की तीन-न्यायाधीशों की पीठ ने स्पष्ट कहा था कि लिव-इन रिलेशनशिप और विवाह पूर्व सेक्स को अपराध की दृष्टि से नहीं देखा जाना चाहिए।
उत्तराखंड यूसीसी के प्रावधान महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा के नाम पर समय को पीछे मोड़ने का प्रयास करते हैं। इनकी संवैधानिकता को उत्तराखंड उच्च न्यायालय में रिट याचिकाओं के माध्यम से चुनौती दी गई है। ऐसे समय में जब रिट याचिकाएं लंबित हैं, गुजरात यूसीसी के माध्यम से उन्हें दोहराने का कार्य सुप्रीम कोर्ट के स्थापित संवैधानिक न्यायशास्त्र का खुला उल्लंघन दर्शाता है।
वैवाहिक अधिकारों की बहाली को बाहर करने में विफलता
गुजरात यूसीसी ने धारा 26 के माध्यम से वैवाहिक अधिकारों की बहाली (Restitution of Conjugal Rights – RCR) को बरकरार रखा है। यह एक ऐसा वैवाहिक उपाय है जो एक अनिच्छुक पति या पत्नी को अपने साथी के साथ रहने के लिए मजबूर करता है। पारिवारिक कानून के इस पुराने और प्रतिगामी स्वरूप की अक्सर इसके महिलाओं पर पड़ने वाले असंगत प्रभाव के लिए भारी आलोचना की जाती रही है।
साल 1983 में आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय ने कहा था कि हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 9, जो आरसीआर का प्रावधान करती है, ‘जंगली और बर्बर’ है। अदालत ने कहा कि यह महिला को यह चुनने से रोकती है कि उसका शरीर कब और कैसे प्रजनन का माध्यम बनेगा।
इसे असंवैधानिक माना गया था। हालांकि बाद में सरोज रानी फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने इसे पलट दिया था। साल 2015 में महिलाओं की स्थिति पर एक उच्च स्तरीय समिति ने सभी पारिवारिक कानूनों से आरसीआर प्रावधानों को हटाने की सिफारिश की थी।
साल 2017 में सुप्रीम कोर्ट की नौ-न्यायाधीशों की पीठ ने कहा कि निजता का अधिकार संविधान द्वारा गारंटीकृत जीवन के अधिकार (अनुच्छेद 21) के तहत एक मौलिक अधिकार है, जिसमें शारीरिक स्वायत्तता शामिल है। भारत के विधि आयोग ने 2018 में पारिवारिक कानूनों से इस उपाय को निरस्त करने की सिफारिश की थी।
2021 में ओजस्व पाठक के मामले में सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की गई थी, जिसमें आरसीआर की संवैधानिकता को एक बार फिर चुनौती दी गई है, जो अभी लंबित है।
साल 2022 में ‘एक्स बनाम प्रमुख सचिव’ मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि प्रजनन अधिकारों के दायरे में केवल बच्चे पैदा करने या न करने का अधिकार शामिल नहीं है। इसमें वे सभी स्वतंत्रताएं शामिल हैं जो एक महिला को अपने यौन और प्रजनन स्वास्थ्य से संबंधित मामलों पर स्वतंत्र रूप से निर्णय लेने में सक्षम बनाती हैं।
यह स्पष्ट रूप से एक ऐसा अधिकार है जिसका उल्लंघन आरसीआर के उपाय के माध्यम से पत्नी को पति के साथ जबरन सहवास के लिए मजबूर करके किया जाता है। गुजरात विधायिका को यूसीसी से इस वैवाहिक उपाय को बाहर रखना चाहिए था ताकि विवाह के भीतर महिलाओं के समानता के अधिकारों के प्रति उसकी सच्ची प्रतिबद्धता प्रदर्शित हो सके।
निर्वसीयत और वसीयती उत्तराधिकार
मृतक की संपत्तियों के वितरण के लिए कोई वैध वसीयत मौजूद न होने पर निर्वसीयत (Intestate) उत्तराधिकार से संबंधित प्रावधान लागू होते हैं। भारत में मौजूद किसी भी उत्तराधिकार कानून ने लैंगिक भेदभाव को पूरी तरह से समाप्त नहीं किया है। हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम (HSA), जिसे अक्सर एक मॉडल कानून माना जाता है, में भी संपत्ति के हस्तांतरण में लैंगिक भेदभाव वाले प्रावधान हैं।
गुजरात यूसीसी सभी धार्मिक समुदायों के सभी व्यक्तियों पर लागू होने वाली निर्वसीयत उत्तराधिकार की एक समान योजना बनाता है। धारा 55 और अनुसूची 2 में बताई गई वरीयता और संपत्ति के वितरण के इसके प्रावधान काफी हद तक एचएसए के समान हैं।
इसमें दो अपवाद हैं: एचएसए के विपरीत, माता-पिता को वर्ग 1 (Class 1) के उत्तराधिकारियों के रूप में समान माना जाता है; इसके अलावा, मृत पुरुषों और मृत महिलाओं की संपत्तियों के लिए कोई अलग योजना नहीं है। इसके बावजूद गुजरात यूसीसी में एचएसए के समान ही वर्ग 2 (Class 2) के उत्तराधिकारियों के लिए लैंगिक भेदभाव वाले प्रावधान मौजूद हैं।
उदाहरण के लिए, पिता के माता-पिता को वर्ग 2 की प्रविष्टि III (Entry III) में रखा गया है और इसलिए उन्हें मां के माता-पिता पर वरीयता दी जाती है जिन्हें वर्ग 2 की प्रविष्टि VI में रखा गया है। इसी तरह, पिता के भाई-बहनों को वर्ग 2 की प्रविष्टि V में रखा गया है, और उन्हें मां के भाई-बहनों पर वरीयता दी जाती है जिन्हें प्रविष्टि VII में रखा गया है।
वसीयती उत्तराधिकार में, मुस्लिम कानून को छोड़कर कोई भी अन्य पारिवारिक कानून वसीयतकर्ता पर उस संपत्ति की मात्रा के रूप में सीमा नहीं लगाता है जिसे वसीयत में दिया जा सकता है। इसके परिणामस्वरूप कोई भी व्यक्ति कानूनी रूप से अपनी पूरी संपत्ति किसी को भी सौंप सकता है, जिससे परिवार के तत्काल सदस्यों को कोई हिस्सा नहीं मिलता।
एक पितृसत्तात्मक समाज में जहां बेटों को प्राथमिकता दी जाती है और बेटियों का अवमूल्यन होता है, इसका परिणाम यह हो सकता है कि पूरी संपत्ति बेटे के पक्ष में कर दी जाए और बेटी के पास विवाह खर्च के अलावा कुछ न बचे। भारत के विधि आयोग की 2018 की सिफारिश के अनुसार गुजरात यूसीसी संपत्ति के वसीयती स्वभाव पर एक सीमा शामिल कर सकता था ताकि महिलाओं को बेदखल होने से बचाया जा सके।
गहरी खामोशी और स्पष्ट अनुपस्थिति
विविध मुद्दों पर चर्चा के बावजूद गुजरात यूसीसी व्यापक होने से कोसों दूर है। उदाहरण के लिए, यह गोद लेने पर चुप है, इसलिए हिंदू दत्तक ग्रहण और भरण-पोषण अधिनियम, 1956 और किशोर न्याय अधिनियम, 2015 लागू होते रहेंगे। यह अभिभावक कानूनों पर भी चुप है, इसलिए हिंदू अल्पसंख्यक और अभिभावक अधिनियम 1956 और संरक्षक और प्रतिपाल्य अधिनियम 1890 लागू होते रहेंगे।
चूंकि अनुसूचित जनजातियों को यूसीसी के दायरे से बाहर रखा गया है, इसलिए उनके प्रथागत कानून लागू होते रहेंगे जहां भारी लैंगिक अन्याय मौजूद है।
अधिकांश पारिवारिक कानूनों की तरह गुजरात यूसीसी में भी वैवाहिक संपत्ति से निपटने वाले प्रावधान अनुपस्थित हैं। केवल गोवा के पारिवारिक कानूनों में संपत्तियों के सहभागिता की एक डिफ़ॉल्ट प्रणाली है। यद्यपि आलोचकों का मानना है कि ये अधिकार व्यवहार की तुलना में सिद्धांत में अधिक हैं, फिर भी वे उपयोगी दिशा-निर्देश प्रदान करते हैं।
महिलाओं के अधिकारों की रक्षा और संवर्धन के लिए एक वास्तविक प्रयास के रूप में गुजरात यूसीसी में वैवाहिक संपत्ति पर प्रावधान शामिल करके एक ठोस शुरुआत की जा सकती थी।
इसके अतिरिक्त भारतीय पारिवारिक कानून विवाहित महिलाओं द्वारा किए गए घरेलू और देखभाल कार्य को स्पष्ट रूप से स्वीकार करने में विफल रहते हैं। राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय के 2024 के ‘टाइम यूज़ सर्वे’ से पता चलता है कि महिलाएं अभी भी घर के अधिकांश अवैतनिक कार्यों का बोझ उठाती हैं।
साल 2023 में मद्रास उच्च न्यायालय ने एक पत्नी के अवैतनिक घरेलू श्रम को उसके पति द्वारा शादी के बाद अर्जित संपत्तियों में उसके वित्तीय योगदान के रूप में माना था। 2025 में दिल्ली उच्च न्यायालय ने राय दी कि एक गृहिणी खाली नहीं बैठती है और भरण-पोषण के दावों पर निर्णय लेते समय उसके काम की अनदेखी करना अन्यायपूर्ण होगा।
हालांकि ये महत्वपूर्ण निर्णय हैं, लेकिन वे अपवाद ही बने हुए हैं। गुजरात यूसीसी महिलाओं के आर्थिक अधिकारों की अधिक व्यापक रूप से रक्षा करने का एक खोया हुआ अवसर है।
उत्तराखंड और गुजरात यूसीसी के बीच दो साल के अंतराल के साथ यह उम्मीद की जा रही थी कि उत्तराखंड यूसीसी के संबंध में चिंताओं, आलोचनाओं और कानूनी कमियों को दूर करके एक बेहतर और जेंडर न्यायपूर्ण पारिवारिक कानून बनाया जाएगा।
चूंकि भारत सरकार महिलाओं के खिलाफ भेदभाव के उन्मूलन पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन (CEDAW) की एक राज्य पार्टी है, इसलिए इसके मानक बाध्यकारी प्रकृति के हैं। CEDAW का अनुच्छेद 16 विशेष रूप से देशों को विवाह और पारिवारिक संबंधों से संबंधित सभी मामलों में महिलाओं के खिलाफ भेदभाव को खत्म करने के लिए उचित उपाय करने का निर्देश देता है। यह राज्य के दायित्व भारतीय संसद और राज्य विधानसभाओं सहित राज्य के सभी अंगों पर लागू होते हैं।
उच्च न्यायपालिका के हालिया फैसलों ने पारिवारिक कानून से संबंधित मुद्दों की व्याख्या करते हुए संवैधानिक अधिकारों को प्राथमिकता दी है। विधि आयोग की सिफारिशें अधिकारों पर आधारित दृष्टिकोण के माध्यम से लिखित कानून और बदलती सामाजिक वास्तविकताओं के बीच की खाई को पाटने के प्रयास का संकेत देती हैं।
गुजरात यूसीसी की यह जिम्मेदारी थी कि वह इन्हें शामिल करे। इस दृष्टिकोण से देखा जाए तो गुजरात यूसीसी संवैधानिक अधिकारों और लैंगिक न्याय के प्रति केवल दिखावा मात्र ही प्रतीत होता है।
(डॉ. सौम्या उमा ओ.पी. जिंदल ग्लोबल यूनिवर्सिटी के जिंदल ग्लोबल लॉ स्कूल में प्रोफेसर हैं और सेंटर फॉर विमेंस राइट्स की प्रमुख हैं। लिंग, मानवाधिकार और कानून के विषयों पर उनकी गहरी पकड़ है। इस लेख में व्यक्त विचार उनके अपने हैं। उक्त लेख मूल रूप से द वायर वेबसाइट पर प्रकाशित की जा चुकी है.)
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