मंगलवार को गुजरात विधानसभा में समान नागरिक संहिता (UCC) विधेयक को बहुमत से पारित कर दिया गया। इसके साथ ही राज्य में एक समान कानून लागू करने का रास्ता साफ हो गया है।
इस बिल के पास होने के दौरान विपक्षी दलों ने जमकर हंगामा किया। मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस के सदस्यों ने तो मतदान से ठीक पहले सदन से वॉकआउट कर दिया। करीब आठ घंटे तक चली लंबी और मैराथन चर्चा के बाद इसे पारित किया गया, जिसमें विधानसभा के 16 सदस्यों ने अपने विचार रखे।
सदन के 182 सदस्यों में कांग्रेस के एकमात्र मुस्लिम विधायक इमरान खेड़ावाला ने इस विधेयक का कड़ा विरोध किया। उन्होंने कहा कि यह कानून मुसलमानों को शरियत से दूर कर देगा और उन्हें “नास्तिक” बना देगा। इस कदम के साथ ही, उत्तराखंड के बाद गुजरात देश का दूसरा ऐसा राज्य बन गया है जिसने यूसीसी बिल पास किया है।
यह नया कानून मुख्य रूप से उत्तराखंड के यूसीसी पर आधारित है। इसका उद्देश्य गुजरात के निवासियों के विवाह, तलाक, उत्तराधिकार, गोद लेने और लिव-इन रिलेशनशिप जैसे व्यक्तिगत दीवानी मामलों को विनियमित करना है। सुप्रीम कोर्ट की पूर्व न्यायाधीश रंजना देसाई की अध्यक्षता वाली समिति द्वारा अपनी रिपोर्ट सौंपने के बाद राज्य सरकार ने इसे पेश किया है।
राज्य सरकार के एक बयान के अनुसार, रंजना देसाई समिति ने काफी विस्तृत अध्ययन किया है। ऐतिहासिक शाहबानो मामले के साथ-साथ मुस्लिम, ईसाई और पारसी धर्म के विवाह व तलाक कानूनों के अलावा, समिति ने फ्रांस, अजरबैजान, नेपाल, जर्मनी और तुर्की के नागरिक संहिताओं का भी गहराई से विश्लेषण किया।
विधेयक पेश करते हुए मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल ने स्पष्ट किया कि यह कानून धर्म या जाति के आधार पर किसी भी तरह के भेदभाव की नीति या प्रथा को खारिज करेगा। उन्होंने जोर देकर कहा कि यूसीसी बिना किसी धार्मिक पहचान के सभी नागरिकों पर समान रूप से लागू होगा। मुख्यमंत्री के अनुसार, यह बिल गुजरात की जनता की समान न्याय की आकांक्षाओं और इच्छाओं को दर्शाता है।
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर इसे एक ऐतिहासिक कदम बताते हुए सीएम ने इसे ‘दादा’ (मुख्यमंत्री के लिए इस्तेमाल होने वाला उपनाम) की ओर से राज्य की बहनों और बेटियों के लिए एक उपहार करार दिया। उन्होंने कहा कि इस मसौदे में महिलाओं के समान अधिकारों और सुरक्षा को विशेष प्राथमिकता दी गई है।
मुख्यमंत्री ने कानून के उल्लंघन पर सजा के प्रावधानों का भी जिक्र किया, जिसमें अलग-अलग अवधि की जेल शामिल है। उन्होंने साफ किया कि यदि कोई मामला किसी नाबालिग लड़की के साथ लिव-इन रिलेशनशिप का है, तो उसमें पॉक्सो (POCSO) एक्ट के तहत कार्रवाई का प्रावधान है।
बदलते समय का हवाला देते हुए सीएम ने कहा कि हमारी बेटियों को ‘श्रद्धा वालकर’ जैसे मामलों से बचाना सरकार का कर्तव्य है। लिव-इन रिलेशनशिप के नियम किसी की आजादी छीनने के लिए नहीं, बल्कि बेटियों की कानूनी सुरक्षा के लिए हैं। पहचान छिपाकर शादी करने या धोखाधड़ी करने वालों के लिए गुजरात में कोई जगह नहीं है।
कुछ समुदायों में फैली गलतफहमियों को दूर करते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि यदि किसी अल्पसंख्यक समुदाय की परंपरा चचेरे भाई-बहनों से शादी की अनुमति देती है, तो इस बिल में यह स्पष्ट है कि उसे कानूनी माना जाएगा।
उन्होंने यह भी बताया कि यह बिल उन सभी आदिवासी समुदायों पर लागू नहीं होगा जो संवैधानिक प्रावधानों के अंतर्गत आते हैं। उनका स्पष्ट कहना था कि यह कानून केवल भेदभाव मिटाने के लिए है, संस्कृतियों को खत्म करने के लिए नहीं।
इस विधेयक को राज्य भर के लोगों के सुझावों, उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालय के विभिन्न फैसलों और दुनिया के अन्य देशों के मॉडल कानूनों को ध्यान में रखते हुए तैयार किया गया है।
दूसरी ओर, विपक्षी दल कांग्रेस ने इस बिल पर कड़ी आपत्ति जताई। कांग्रेस के वरिष्ठ विधायक अमित चावड़ा ने आरोप लगाया कि राज्य सरकार ने आगामी चुनावों को ध्यान में रखते हुए राजनीतिक स्वार्थ के लिए इस बिल को जल्दबाजी में पेश किया है।
उन्होंने सवाल उठाया कि जब कुछ समुदायों को इस बिल से बाहर रखा गया है, तो इसे ‘समान’ नागरिक संहिता कैसे कहा जा सकता है। चावड़ा की यह भी मांग थी कि बिल लाने से पहले सरकार को रंजना देसाई समिति की रिपोर्ट सार्वजनिक करनी चाहिए थी।
कांग्रेस विधायक इमरान खेड़ावाला ने गुजरात के पूरे मुस्लिम समुदाय की ओर से बिल का विरोध किया। कांग्रेस नेता शैलेश परमार ने भी इस कदम के खिलाफ आवाज उठाई और सभी कांग्रेस विधायकों ने विधेयक को पारित करने से पहले एक प्रवर समिति (सेलेक्ट कमेटी) के पास भेजने की मांग की।
चर्चा में भाग लेते हुए उपमुख्यमंत्री हर्ष सांघवी ने बिल का पुरजोर बचाव किया और इसे ऐतिहासिक बताया। सांघवी ने कहा कि यूसीसी लाना भाजपा के वादे का हिस्सा था और उन्होंने इसे पूरा किया है। उन्होंने फ्रांस, जर्मनी, तुर्की, नेपाल और अजरबैजान जैसे देशों का उदाहरण देते हुए कहा कि रंजना देसाई समिति को बिल का मसौदा तैयार करने से पहले 20 लाख से अधिक सुझाव मिले थे।
जब बिल को मतदान के लिए रखा गया, तो कांग्रेस विधायकों ने इसे प्रवर समिति के पास भेजने की अपनी मांग दोहराई। जब यह मांग खारिज कर दी गई, तो सदन में मौजूद तीन कांग्रेस विधायकों—तुषार चौधरी, शैलेश परमार और अनंत पटेल—ने वॉकआउट किया।
वहीं, आम आदमी पार्टी (AAP) के विधायक चैतर वसावा ने अनुसूचित जनजाति समुदायों को इस बिल के दायरे से बाहर रखने के लिए सरकार को धन्यवाद दिया।
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