अहमदाबाद: पिछले 15 वर्षों से भी कम समय में नौ नए नगर निगमों का गठन और शहरों की बदलती सीमाएं गुजरात की एक नई तस्वीर पेश कर रही हैं। इसके अलावा सैटेलाइट टाउनशिप की योजनाएं भी इस बात का साफ संकेत हैं कि यह राज्य अब अपनी ग्रामीण पहचान से तेजी से आगे निकल रहा है।
आंकड़ों के सामने आने से पहले ही प्रशासनिक स्तर पर हो रहे इन बदलावों ने इस नई वास्तविकता को उजागर कर दिया है। अगले साल तक गुजरात के मुख्य रूप से एक शहरी राज्य बन जाने की पूरी संभावना है। अनुमान है कि इतिहास में पहली बार राज्य की आधी से अधिक आबादी शहरों में निवास करेगी।
राज्य सरकार के सामाजिक-आर्थिक समीक्षा 2025-26 के अनुमानों के अनुसार, वर्ष 2027 तक गुजरात की कुल जनसंख्या 7.48 करोड़ तक पहुंचने की उम्मीद है। इनमें से 3.79 करोड़ लोग शहरी क्षेत्रों में और 3.69 करोड़ लोग ग्रामीण इलाकों में रह रहे होंगे। इस तरह राज्य में शहरी आबादी का हिस्सा 50.69% हो जाएगा, जो जनसांख्यिकीय विकास में एक बहुत बड़ा ऐतिहासिक पड़ाव है।
शहरी योजनाकारों का मानना है कि यह बदलाव कई दशकों की प्रक्रिया का परिणाम है। 2011 की जनगणना के आंकड़ों पर नजर डालें तो उस वक्त भी गुजरात की शहरी आबादी 42.6% थी, जो 31.14% के राष्ट्रीय औसत से काफी अधिक थी। 2011 से 2027 के बीच शहरी आबादी में लगभग 8 प्रतिशत अंकों का यह अनुमानित उछाल इसी अवधि के राष्ट्रीय रुझानों से कहीं ज्यादा है।
शहरी विकास और शहरी आवास विभाग के प्रमुख सचिव एम. थेन्नारसन ने स्पष्ट किया कि शहरीकरण ही गुजरात के आर्थिक भविष्य का मुख्य केंद्र है। विश्व बैंक के एक अध्ययन का हवाला देते हुए उन्होंने बताया कि 2050 तक राज्य की 67% से 70% के बीच आबादी शहरी क्षेत्रों में निवास कर सकती है।
उन्होंने शहरों को आर्थिक विकास का इंजन करार दिया, जो सेवाओं, शिक्षा, बुनियादी ढांचे और नियोजित विकास से संचालित होते हैं। इस दिशा में कदम बढ़ाते हुए राज्य सरकार ने वर्तमान वर्ष को “शहरी वर्ष” भी घोषित किया है। साथ ही, बेहतर सुविधाओं, सैटेलाइट टाउनशिप और ट्रांजिट-ओरिएंटेड विकास पर ध्यान केंद्रित करते हुए शहरी विकास बजट को बढ़ाकर 33,500 करोड़ रुपये कर दिया गया है।
इस बढ़ती आबादी के साथ शहरी प्रशासन का दायरा भी उसी तेजी से बढ़ा है। 2011 में गुजरात में केवल आठ नगर निगम थे, जिनकी संख्या अब बढ़कर 17 हो गई है। नवसारी, वापी, आणंद, मोरबी और गांधीधाम जैसे कई नए नाम इस सूची में शामिल हुए हैं।
नगर निगमों के अंतर्गत आने वाला कुल क्षेत्रफल 2011 के 466 वर्ग किलोमीटर से बढ़कर अब 481 वर्ग किलोमीटर हो गया है। उम्मीद है कि अहमदाबाद का और विस्तार होगा, क्योंकि इसके बाहरी इलाके में स्थित एक प्रमुख औद्योगिक केंद्र साणंद तक शहर की सीमा बढ़ाने की योजनाएं चल रही हैं।
सीईपीटी (CEPT) विश्वविद्यालय के शहरी योजनाकार रुतुल जोशी ने कहा कि इस रुझान की उम्मीद काफी पहले से थी। उनके अनुसार अपने गठन के समय से ही गुजरात एक औद्योगिक राज्य रहा है और औद्योगीकरण के साथ शहरीकरण का आना स्वाभाविक है।
उन्होंने बताया कि 1980 में अहमदाबाद, वडोदरा, सूरत और राजकोट में शहरी आबादी अपने चरम पर थी। योजनाकारों को पहले से ही यह अनुमान था कि 2025 तक शहरी आबादी ग्रामीण आबादी को पीछे छोड़ देगी।
राज्य सरकार के दीर्घकालिक अनुमान बताते हैं कि 2036 तक गुजरात की लगभग 55% आबादी शहरी क्षेत्रों में रहने लगेगी। इसके विपरीत, भारत के मुख्य रूप से तब भी ग्रामीण ही रहने की उम्मीद है, जिसमें 39.06% आबादी शहरों में और 60.94% आबादी ग्रामीण इलाकों में होगी।
गुजरात की शहरी आबादी सालाना लगभग 0.5% की दर से बढ़ रही है, जो करीब 0.3% की राष्ट्रीय दर से काफी आगे है। अगले 10 वर्षों में राज्य की शहरी हिस्सेदारी में 4.3 प्रतिशत अंकों की वृद्धि होने का अनुमान है, जबकि पूरे भारत के लिए यह आंकड़ा लगभग 2.7 प्रतिशत अंक है। यह शहरों की ओर तेजी से हो रहे पलायन, औद्योगिक विस्तार और शहरी बुनियादी ढांचे के व्यापक प्रसार का सीधा परिणाम है।
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