नई दिल्ली: भारत के सकल घरेलू उत्पाद (GDP) के आंकड़े दुनिया भर में सुर्खियां बटोर रहे हैं, लेकिन क्या यह चमकती हुई तस्वीर पूरी कहानी बयां कर रही है? रॉकफेलर इंटरनेशनल के चेयरमैन और प्रसिद्ध निवेशक व लेखक रुचिर शर्मा ने ‘फाइनेंशियल टाइम्स’ में लिखे अपने हालिया लेख में भारतीय अर्थव्यवस्था की एक अलग ही तस्वीर पेश की है।
उनका मानना है कि विदेशी निवेशकों का मोहभंग हो रहा है और देश से पूंजी और प्रतिभा, दोनों का पलायन चिंता का विषय है।
रुचिर शर्मा ने अपने विश्लेषण में तर्क दिया है कि 8 प्रतिशत से अधिक की जीडीपी वृद्धि दर के पीछे कई कमजोरियां छिपी हुई हैं, जिन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
कंपनियों की कमाई और GDP में अंतर
रुचिर शर्मा ने एक बेहद चौंकाने वाले तथ्य की ओर इशारा किया है। सामान्यतः किसी भी देश में कॉरपोरेट जगत की आय अर्थव्यवस्था की गति के साथ बढ़ती या घटती है। लेकिन भारत में पिछले साल एक अजीब विरोधाभास देखने को मिला। जहां जीडीपी तेज गति से बढ़ी, वहीं सूचीबद्ध कंपनियों (Listed Companies) की आय वृद्धि दर जीडीपी की रफ्तार से बमुश्किल आधी रही।
नीति निर्माताओं के लिए यह चिंता का संकेत होना चाहिए। केवल हेडलाइन में दिखने वाले जीडीपी के आंकड़ों से तसल्ली करने के बजाय—जो अक्सर मुद्रास्फीति के समायोजन और तकनीकी कारकों से बढ़े हुए दिखते हैं—उन्हें जमीनी हकीकत पर ध्यान देने की जरूरत है।
प्रतिभा पलायन: ब्रेन ड्रेन का बढ़ता संकट
अर्थव्यवस्था की कमजोरी का सबसे बड़ा संकेत यह है कि भारत अब लोगों को रोक नहीं पा रहा है। इस दशक में हर साल औसतन 6,75,000 लोग देश छोड़कर गए हैं, जबकि 2010 के दशक में यह आंकड़ा 3,25,000 था। यानी देश छोड़ने वालों की संख्या लगभग दोगुनी हो गई है।
आंकड़ों पर गौर करें तो केवल पाकिस्तान, बांग्लादेश और यूक्रेन ही ऐसे देश हैं जहां से भारत से ज्यादा लोगों का पलायन हुआ है। यहां तक कि चीन से भी सालाना 3,00,000 लोग ही निकल रहे हैं, जो उनके पिछले दशक के औसत के बराबर है।
भारत के लिए चिंता की बात यह है कि जाने वालों में एक बड़ा हिस्सा कुशल कामगारों (Skilled Workers) का है, जिसे हम ‘ब्रेन ड्रेन’ कहते हैं। ये वही लोग हैं जिनकी जरूरत देश को उन्नत क्षेत्रों में प्रतिस्पर्धा करने के लिए है। इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि आज सिलिकॉन वैली (Silicon Valley) की तकनीकी वर्कफोर्स का एक-तिहाई हिस्सा भारतीय है।
रोजगार का संकट और IIT की स्थिति
देश में रोजगार की स्थिति भी नाजुक बनी हुई है। इसका सबसे सटीक उदाहरण भारत के प्रतिष्ठित संस्थान ‘आईआईटी’ (IIT) हैं। 2024 में, आईआईटी से पास होने वाले 38 प्रतिशत छात्रों को कैंपस प्लेसमेंट में एक भी नौकरी का ऑफर नहीं मिला। यही कारण है कि कई भारतीय अब उन चुनिंदा देशों का रुख कर रहे हैं जो प्रवासियों के लिए खुले हैं, जैसे कि यूएई (UAE) और सऊदी अरब, जहां निर्माण क्षेत्र में बूम है।
विदेशी निवेश: 1.5% से गिरकर 0.1% पर
विदेशी पूंजी का प्रवाह भी भारत की सीमाओं को लेकर एक नई कहानी कह रहा है। लंबे समय तक ‘लाइसेंस राज’ के कारण भारत विदेशी पूंजी को आकर्षित करने में पीछे रहा है, क्योंकि यहां जमीन खरीदना या कर्मचारियों की नियुक्ति और छंटनी करना बेहद महंगा और जटिल था।
अगर हम एशिया की अन्य उभरती अर्थव्यवस्थाओं, जैसे चीन और हाल ही में वियतनाम को देखें, तो उनके विकास के चरम दौर में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) जीडीपी के 4 प्रतिशत से ऊपर चला गया था। इसके विपरीत, भारत में यह आंकड़ा कभी भी 1.5 प्रतिशत को पार नहीं कर पाया और अब तो यह गिरकर मात्र 0.1 प्रतिशत रह गया है।
पिछले एक दशक में, 25 सबसे बड़े उभरते देशों की सूची में शुद्ध एफडीआई/जीडीपी (Net FDI/GDP) रैंकिंग में भारत 12वें स्थान से फिसलकर 19वें स्थान पर आ गया है। हालांकि हालिया गिरावट का एक कारण विदेशियों द्वारा पुराना मुनाफा वापस अपने देश ले जाना भी है, लेकिन सकल प्रवाह (Gross Flows) भी काफी कम है।
तकनीक और बाजार में पिछड़ता भारत
भारत में कारोबार करने की पुरानी मुश्किलों के अलावा, विदेशी निवेशकों के मन में नए जोखिम भी घर कर गए हैं। इनमें पड़ोसियों के साथ नई दिल्ली के बिगड़ते संबंध, वाशिंगटन के साथ टैरिफ को लेकर खींचतान और भारत की तकनीकी क्षमता पर संदेह शामिल है।
अनुसंधान और विकास (R&D) पर खर्च के मामले में भी हम पीछे हैं। जहां चीन और दक्षिण कोरिया अपनी जीडीपी का 2.5 प्रतिशत से ज्यादा आर-एंड-डी पर खर्च करते हैं, वहीं भारत ने पिछले साल महज 0.65 प्रतिशत खर्च किया। शायद यही वजह है कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के क्षेत्र में भारत का कोई भी बड़ा खिलाड़ी मौजूद नहीं है।
इन कमियों का असर शेयर बाजार पर भी दिखा है। पिछले साल जब उभरते बाजारों (Emerging Markets) में विदेशी निवेश वापस आ रहा था, तब भारत ने 19 अरब डॉलर (19 billion dollars) की रिकॉर्ड निकासी (Outflow) देखी। हालांकि, घरेलू निवेशकों ने इस बिक्री का मुकाबला किया, लेकिन फिर भी भारतीय शेयर बाजार अपने वैश्विक साथियों की तुलना में काफी पीछे रह गया।
आगे की राह: सुधार और निवेश
भारत की घरेलू बचत इतनी पर्याप्त नहीं है कि वह अकेले दम पर तेज विकास की रफ्तार को बनाए रख सके, इसलिए उसे विदेशी पूंजी की सख्त जरूरत है। पूर्वी एशियाई देशों के विपरीत, भारत का विनिर्माण (Manufacturing) क्षेत्र कमजोर है, जिसके कारण हम कभी भी ‘एक्सपोर्ट पावरहाउस’ नहीं बन पाए और हमारा चालू खाता घाटा (Current Account Deficit) हमेशा बना रहा।
रुचिर शर्मा का मानना है कि भारत की मौजूदा कमजोरियां ही आगे का रास्ता दिखाती हैं। पिछले एक साल में, सरकार ने लेबर कोड को सुव्यवस्थित करने, दिवालियापन के नियमों को सरल बनाने और लालफीताशाही (Red Tape) को कम करने के लिए महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं। उम्मीद है कि ये सुधार निवेश को बढ़ावा देंगे।
अंततः, भारत सही मायने में ‘आर्थिक चमत्कार’ की राह पर तब माना जाएगा, जब हम अधिक पूंजी का आयात करना शुरू करेंगे और कम श्रमिकों का निर्यात करेंगे। जीडीपी के आंकड़े तकनीकी हो सकते हैं, लेकिन असली सफलता तब होगी जब प्रतिभाएं देश में रुकेंगी और दुनिया का पैसा भारत पर भरोसा जताएगा।
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