प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली भारत सरकार ऑनलाइन असहमति पर सख्त कार्रवाई करने की दिशा में लगातार कदम उठा रही है। इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय की “कानूनी मांगों” के जवाब में भारत में कई सोशल मीडिया हैंडल्स को ब्लॉक कर दिया गया है। हालांकि, इस कार्रवाई के पीछे कोई स्पष्टीकरण नहीं दिया गया है।
प्रतिबंधित किए गए पोस्ट्स की कोई आधिकारिक संख्या मौजूद नहीं है। इसके बावजूद ये पाबंदियां इतनी व्यापक हो चुकी हैं कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर एक यूजर ने शिकायत करते हुए कहा कि हर दसवें पोस्ट को प्रतिबंधित किया जा रहा है।
निशाना बनाए गए ज्यादातर अकाउंट्स और पोस्ट्स में एक बात समान थी कि वे सभी मोदी सरकार के आलोचक थे। पत्रकारों, नागरिक अधिकार कार्यकर्ताओं और समाचार आउटलेट्स के साथ-साथ कॉमेडियंस, कार्टूनिस्टों और लेखकों के व्यंग्यात्मक पोस्ट्स को भी ब्लॉक किया गया।
इसमें कॉमेडियन पुलकित मणि की वह रील भी शामिल है, जिसमें विदेशी नेताओं से मिलते समय प्रधानमंत्री की अत्यधिक खुशी और गंभीरता की कमी पर कटाक्ष किया गया था। कुछ अन्य पोस्ट्स में प्रधानमंत्री को इजरायल का नेसेट मेडल पहने हुए दिखाया गया था, जबकि उनके साथ ही एक भारतीय नागरिक गले में रसोई गैस सिलेंडर लटकाए खड़ा था।
मध्य पूर्व में चल रहे युद्ध पर प्रधानमंत्री की प्रतिक्रिया और गैस की किल्लत झेल रहे लोगों की आलोचना के कारण मीम्स की बाढ़ आ गई थी। माना जा रहा है कि इसी वजह से इतने बड़े पैमाने पर सेंसरशिप को बढ़ावा मिला।
पिछले कुछ हफ्तों में भारतीय अधिकारियों ने डिजिटल नियमों का एक नया सेट पेश किया है। मौजूदा कानूनों में जोड़े गए इन संशोधनों से भारत में बोलने और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार पर भारी दबाव पड़ने की आशंका है।
बीती 30 मार्च को सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने आईटी अधिनियम 2021 में संशोधनों की घोषणा की। यह कदम अनिवार्य रूप से ऑनलाइन सामग्री को ब्लॉक करने के सरकार के अधिकार का विकेंद्रीकरण कर देगा।
नए प्रस्ताव के तहत सामग्री हटाने या ‘टेकडाउन’ के अधिकार अब रक्षा, गृह मामलों, विदेश मामलों और सूचना एवं प्रसारण सहित कई मंत्रालयों को दिए जाएंगे। इससे पहले सेंसरशिप का यह अधिकार केवल आईटी मंत्रालय के पास सुरक्षित था।
भारत में बढ़ते डिजिटल सत्तावाद की पहले भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आलोचना होती रही है। पिछले साल भारत और पाकिस्तान के बीच बढ़ते तनाव के दौरान, सरकार ने ‘एक्स’ को देश में 2,355 अकाउंट्स ब्लॉक करने का आदेश दिया था, जिनमें रॉयटर्स जैसे अंतरराष्ट्रीय समाचार आउटलेट भी शामिल थे।
पारदर्शिता रिपोर्ट के आंकड़ों के अनुसार, साल 2024 में 28,000 से अधिक यूआरएल या वेब लिंक ब्लॉक किए गए हैं। सार्वजनिक रिकॉर्ड और वकालत समूहों के डेटा से पता चलता है कि विरोध प्रदर्शनों या राजनीतिक समारोहों के दौरान सरकार की तरफ से सामग्री हटाने के सैकड़ों अनुरोध किए गए और देश भर में दर्जनों बार इंटरनेट शटडाउन किया गया।
‘द कश्मीर वाला’ और ‘गांव सवेरा’ जैसी समाचार साइटों को सुरक्षा कारणों का हवाला देकर ब्लॉक कर दिया गया है। सरकार की आलोचना करने वाले कई छोटे समाचार आउटलेट्स और यूट्यूब चैनलों को भी सरकारी लाइन पर चलने या फिर ब्लॉक होने के भारी दबाव का सामना करना पड़ा है।
मौजूदा कानूनों में होने वाले ये संशोधन सेंसरशिप प्रक्रिया को पहले से कहीं अधिक तेज और प्रभावी बना देंगे। अधिकार समूहों ने इन नियमों को तुरंत वापस लेने की मांग की है, लेकिन पूरी उम्मीद है कि अगले 15 दिनों के भीतर ये नए नियम लागू हो जाएंगे।
टेक पॉलिसी प्रेस के फेलो और डिजिटल अधिकार संगठन ‘इंटरनेट फ्रीडम फाउंडेशन’ के पूर्व कार्यकारी निदेशक प्रतीक वाघरे का कहना है कि नए नियमों का दायरा पहले मौजूद किसी भी नियम से कहीं अधिक व्यापक है।
वाघरे ने अपनी चिंता जताते हुए कहा कि सत्ता का यह विस्तार और समाचारों या समसामयिक मामलों के विश्लेषण को निशाना बनाने की क्षमता सबसे ज्यादा चिंताजनक है। उनके मुताबिक अब इंटरनेट पर कही गई किसी भी बात की बारीकी से जांच हो सकती है।
उन्होंने बताया कि भले ही ये नए नियम स्पष्टीकरण और प्रक्रियात्मक रूप में पेश किए गए हों और मौजूदा कानूनों में ‘एडवाइजरी’ के रूप में जोड़े गए हों, लेकिन असल में वे कानूनी रूप से लागू करने योग्य हैं।
इन नए नियमों में सबसे विवादास्पद पहलुओं में से एक सोशल मीडिया कंपनियों के लिए गैरकानूनी सामग्री को हटाने की अनिवार्य समय सीमा है। यदि सरकार किसी सामग्री को हरी झंडी दिखाती है या फ्लैग करती है, तो प्लेटफॉर्म्स को उसे बिना किसी पूर्व नोटिस के केवल तीन, और कभी-कभी दो घंटे के भीतर हटाना होगा।
वाघरे का मानना है कि यह नया तीन घंटे का नियम पुरानी 36 घंटे की समय सीमा के बिल्कुल विपरीत है। प्लेटफॉर्म्स के पास किसी पोस्ट की कानूनी वैधता जांचने का पर्याप्त समय ही नहीं बचेगा। समय की इस भारी कमी के कारण वे बिना सोचे-समझे सामग्री को हटाने के लिए मजबूर होंगे।
टेक-फोकस्ड न्यूज प्लेटफॉर्म मीडियानामा के संस्थापक, पत्रकार और डिजिटल अधिकार कार्यकर्ता निखिल पाहवा ने मनमाने फैसलों पर जोर देते हुए कहा कि ऑनलाइन सामग्री की निगरानी में पारदर्शिता की भारी कमी है।
पाहवा के अनुसार, किसी भी सरकारी मंत्रालय का कोई अधिकारी सुबह उठकर अपनी नापसंदगी के आधार पर किसी ट्वीट या यूट्यूब वीडियो को हटाने का आदेश दे सकता है। ऐसी जानकारी को सार्वजनिक करने का कोई स्पष्ट नियम मौजूद नहीं है। यह जानने का भी कोई तरीका नहीं है कि किस मंत्रालय ने सामग्री को क्यों फ्लैग किया।
वाघरे को डर है कि इस नई अपारदर्शिता के कारण व्यंग्यात्मक कार्टून और पत्रकारिता जैसी पूरी तरह वैध सामग्री को अवैध गतिविधियों के साथ मिला दिया जाएगा। सरकार के स्पष्टीकरण न देने की वजह से यह तय करना मुश्किल हो जाएगा कि क्या वास्तव में बाल पोर्नोग्राफी या गलत सूचना जैसी अवैध सामग्री है, और क्या महज़ एक पैरोडी।
पाहवा कहते हैं कि ये नए कानून भारत में सेंसरशिप का एक स्थायी बुनियादी ढांचा तैयार करने की दिशा में एक अहम हिस्सा हैं। यह सब बहुत ही व्यवस्थित और व्यापक तरीके से हो रहा है, जिसे लोगों को बिना एहसास कराए टुकड़ों में जोड़ा गया है।
नए संशोधन सोशल मीडिया अकाउंट्स, ऑनलाइन वीडियो क्रिएटर्स और स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म्स को सीधे तौर पर सूचना और प्रसारण मंत्रालय की निगरानी में ले आएंगे। इसका सीधा अर्थ है कि भारत का कोई भी ऑनलाइन कंटेंट क्रिएटर यदि पत्रकारों के लिए तय सरकारी कानूनों का पालन नहीं करता है, तो उसे भी वैसी ही दंडात्मक कार्रवाई का सामना करना पड़ेगा।
मंत्रालय ने साल 2024 में भी ऐसा ही एक विधेयक पारित करने का प्रयास किया था जो विफल रहा। अब मौजूदा कानून में संशोधन के जरिए मंत्रालय ने इन नए नियमों को लागू करने का एक चोर दरवाजा खोज लिया है।
पाहवा की चिंता का एक बड़ा कारण यह है कि पिछले एक दशक में सरकारी दबाव और अरबपति डोनर्स द्वारा मीडिया संस्थानों की खरीद के कारण स्वतंत्र भारतीय पत्रकारिता पारंपरिक मीडिया से हटकर यूट्यूब और सोशल मीडिया की तरफ शिफ्ट हो गई थी। अब तक ये माध्यम सूचना और प्रसारण मंत्रालय के सीधे नियंत्रण से मुक्त थे, लेकिन अब यह स्थिति पूरी तरह बदलने वाली है।
इससे भी ज्यादा चिंता की बात यह है कि ये नए नियम भारत में ऑनलाइन और ऑफलाइन दोनों तरह से असहमति के स्वरों को दबाने और फ्री स्पीच पर लगाम कसने वाले कानूनों की लंबी फेहरिस्त का एक और हिस्सा भर हैं।
हाल ही में बच्चों की सोशल मीडिया तक पहुंच को विनियमित करने पर एक चर्चा में पाहवा शामिल हुए थे, जहां सरकार के कई अधिकारी मौजूद थे। वहां एक अधिकारी ने खुले तौर पर कहा कि इंटरनेट एक सार्वजनिक बुनियादी ढांचा है, इसलिए सरकार को ही उस ढांचे तक पहुंच को नियंत्रित करना चाहिए।
पाहवा के मुताबिक यह दृष्टिकोण अधिकारों पर केंद्रित न होकर पूरी तरह नियंत्रण पर केंद्रित था। डिजिटल स्वतंत्रता कोई सार्वजनिक बुनियादी ढांचा नहीं है, बल्कि यह हमारे मौलिक अधिकारों का एक अहम सूत्रधार है।
उनके अनुसार लोग इन नियमों को अंतिम मान रहे हैं, लेकिन हकीकत में यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हो रही इस व्यापक कार्रवाई का महज़ एक चेकपॉइंट है, और निश्चित रूप से यह अंतिम नहीं है।
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