अहमदाबाद: अक्सर लोग अपनी कीमती संपत्ति को सुरक्षित रखने के लिए बैंकों पर भरोसा करते हैं, लेकिन गुजरात में एक ऐसा मामला सामने आया है जिसने बैंकिंग प्रणाली की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े कर दिए हैं। राजकोट के एक दंपती ने आरोप लगाया है कि इंडियन बैंक (Indian Bank) के पास गिरवी रखा गया उनका 1.15 करोड़ रुपये का सोना बैंक की कस्टडी से गायब हो गया है।
हैरानी की बात यह है कि बैंक ने न केवल इस बात को महीनों तक छिपाए रखा, बल्कि दंपती से लोन पर ब्याज भी वसूलता रहा। अब यह मामला गुजरात हाई कोर्ट पहुंच गया है।
क्या है पूरा मामला?
याचिकाकर्ता संगीता शाह और श्याम शाह ने साल 2023 में अपने बिजनेस को बढ़ाने के लिए इंडियन बैंक की राजकोट शाखा से दो एमएसएमई (MSME) लोन लिए थे। इन लोन के बदले उन्होंने बैंक के पास 1004.1 ग्राम (करीब 1 किलो) 22-कैरेट सोने के जेवर और रत्न गिरवी रखे थे, जिनका बाजार मूल्य लगभग 1.15 करोड़ रुपये है।
नियमों के मुताबिक, यह लोन हर साल रिन्यू (नवीनीकृत) होता था और बैंक हर बार गिरवी रखे गए सोने का मूल्यांकन करता था। सब कुछ ठीक चल रहा था, लेकिन जब 28 अक्टूबर 2025 को दंपती ने बैंक से लोन रिन्यू करने का अनुरोध किया, तो अगले ही दिन उन्हें एक चौंकाने वाली खबर मिली।
बैंक का जवाब: आपका ‘ज्वेल पैकेट’ मिल नहीं रहा
29 अक्टूबर को बैंक ने दंपती को सूचित किया कि उनका गिरवी रखा हुआ “ज्वेल पैकेट” गायब है, इसलिए लोन रिन्यू नहीं किया जा सकता। बैंक ने यह भी बताया कि यह सोना मार्च 2025 से ही गायब है और उन्होंने जुलाई में पुलिस में शिकायत भी दर्ज कराई थी, हालांकि अभी तक कोई एफआईआर (FIR) दर्ज नहीं हुई है।
दंपती के लिए सबसे बड़ा झटका यह था कि मार्च में सोना गायब होने के बावजूद बैंक ने उन्हें अंधेरे में रखा और लगातार ब्याज वसूलता रहा। इतना ही नहीं, बैंक ने अब उन पर दबाव बनाना शुरू कर दिया है। बैंक ने लोन खाते को एनपीए (NPA) घोषित करने की धमकी दी और उन पर पीनल चार्ज (दंड शुल्क) लगा दिए, जिससे उनका क्रेडिट स्कोर खराब होने लगा।
मुआवजे के नाम पर खानापूर्ति
बैंक ने अपनी गलती मानते हुए दंपती से कहा कि वे 24-कैरेट सोने के लिए 10,813 रुपये प्रति ग्राम की दर से प्रतिपूर्ति (Reimbursement) का दावा पेश करें। लेकिन याचिकाकर्ताओं का कहना है कि इसमें उनकी ज्वेलरी के मेकिंग चार्ज और उसमें जड़े कीमती रत्नों की कीमत शामिल नहीं की गई है।
हाई कोर्ट में दलीलें
दंपती के वकील निमित शुक्ला ने कोर्ट में तर्क दिया कि बैंक ने जानबूझकर महीनों तक जानकारी दबाए रखी और ब्याज वसूलना जारी रखा, जो कि “ड्यूटी ऑफ केयर” (देखभाल के कर्तव्य) का उल्लंघन है। दंपती ने 5 नवंबर 2025 को बैंक को एक अभ्यावेदन (Representation) देकर लापरवाही का मुद्दा उठाया था और सोने के साथ-साथ मेकिंग चार्ज व रत्नों की कीमत के लिए मुआवजे की मांग की थी।
याचिका में कहा गया है कि बैंक ने अपनी लिखित स्वीकृति के बावजूद मुआवजे के लिए कोई समय-सीमा नहीं दी है। इसके विपरीत, बैंक अब अपनी ताकत का गलत इस्तेमाल कर रहा है और जबरदस्ती वसूली के कदम उठा रहा है।
याचिका के अनुसार, “बैंक द्वारा जानकारी छिपाना और मुआवजा देने में आनाकानी करना आरबीआई (RBI) के दिशा-निर्देशों की पूरी तरह अवहेलना है।”
कोर्ट का रुख
दंपती ने मांग की है कि केंद्र सरकार और आरबीआई को इस मामले में हस्तक्षेप करना चाहिए और बैंक के खिलाफ कार्रवाई करनी चाहिए। उन्होंने मांग की है कि या तो कानून के अनुसार उन्हें उचित मुआवजा मिले या फिर एक स्वतंत्र सतर्कता समिति (Vigilance Committee) का गठन किया जाए।
साथ ही, उन्होंने लोन खातों की पूरी जानकारी मांगी है और यह निर्देश देने की अपील की है कि बैंक उनके खिलाफ कोई भी दंडात्मक कार्रवाई न करे।
प्राथमिक सुनवाई के बाद, जस्टिस अनिरुद्ध माई ने मामले की गंभीरता को देखते हुए केंद्र सरकार, आरबीआई और इंडियन बैंक को नोटिस जारी किया है। सभी पक्षों को अपना जवाब दाखिल करने के लिए कहा गया है। अब इस मामले की अगली सुनवाई 27 जनवरी को होगी।
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