इंदौर/भोपाल: पिछले लगातार आठ वर्षों से भारत के ‘सबसे स्वच्छ शहर’ का ताज पहनने वाले इंदौर में एक दिल दहला देने वाली घटना सामने आई है। शहर की सफाई व्यवस्था और वेस्ट मैनेजमेंट (कचरा प्रबंधन) की दुनिया भर में चर्चा होती है, लेकिन इसी शहर के एक हिस्से में सीवेज मिश्रित जहरीला पानी पीने से एक शिशु सहित कम से कम 10 लोगों की मौत हो गई है। इसके अलावा, 270 से अधिक लोग गंभीर हालत में अस्पतालों में भर्ती हैं।
चेतावनी को किया गया नजरअंदाज
यह घटना मध्य प्रदेश की आर्थिक राजधानी इंदौर के भागीरथपुरा इलाके में हुई, जो एक घनी आबादी वाला और निम्न-आय वर्ग का क्षेत्र है। स्थानीय निवासियों का कहना है कि वे पिछले कई महीनों से नलों से बदबूदार पानी आने की शिकायत कर रहे थे।
विडंबना यह है कि साफ-सफाई के लिए वाहवाही लूटने वाले प्रशासन ने नागरिकों की इन गंभीर चेतावनियों को पूरी तरह से अनसुना कर दिया, जिसका नतीजा आज सबके सामने है।
आंकड़े और आधिकारिक पुष्टि
इंदौर के महापौर पुष्यमित्र भार्गव ने इस दुखद घटना की पुष्टि करते हुए कहा, “मुझे जानकारी मिली है कि भागीरथपुरा क्षेत्र में दूषित पानी के कारण डायरिया का प्रकोप फैला है, जिससे 10 लोगों की मौत हुई है।”
उन्होंने स्वीकार किया कि पानी की टंकी से आने वाली मुख्य लाइन में सीवेज का पानी मिल गया था।
हालाँकि, स्थानीय मीडिया रिपोर्ट्स में मृतकों की संख्या 15 तक बताई जा रही है, लेकिन इसकी अभी कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। वर्तमान में कम से कम 32 मरीज आईसीयू में जिंदगी और मौत से जूझ रहे हैं। मुख्यमंत्री मोहन यादव ने बताया कि अस्पतालों में भर्ती मरीजों के अलावा, स्वास्थ्य विभाग की टीमों ने घर-घर जाकर जांच की और 2,456 “संदिग्ध मरीजों” की पहचान की, जिन्हें मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया।
कैसे हुई यह चूक?
जांच में एक चौंकाने वाली और घोर लापरवाही सामने आई है। अधिकारियों के मुताबिक, पीने के पानी की पाइपलाइन के ठीक ऊपर एक सार्वजनिक शौचालय का निर्माण किया गया था। सबसे बड़ी खामी यह थी कि यह शौचालय बिना सेप्टिक टैंक के बनाया गया था, जिससे जमा गंदगी और सीवेज रिसकर नीचे बिछी पेयजल आपूर्ति लाइन में मिल गया।
लैब में जब पानी की जांच की गई, तो उसमें मानव अपशिष्ट (Human Waste) में पाए जाने वाले खतरनाक बैक्टीरिया की पुष्टि हुई। इसी पानी को पीने से लोगों को उल्टी, दस्त और तेज बुखार जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ा।
एक पिता का दर्द
प्रशासनिक लापरवाही का सबसे दर्दनाक पहलू यह है कि एक पांच महीने के बच्चे की भी जान चली गई। बच्चे के पिता, सुनील साहू ने नम आंखों से बताया कि उन्होंने अपने बच्चे को बोतल से वही नल का पानी पिलाया था।
उन्होंने कहा, “हमने पानी को छानकर इस्तेमाल किया था। किसी ने हमें नहीं बताया कि पानी जहरीला हो चुका है। पूरी बस्ती में यही पानी आ रहा था और प्रशासन की तरफ से कोई चेतावनी जारी नहीं की गई थी।”
जिम्मेदारों पर कार्रवाई और राजनीतिक प्रतिक्रिया
नगर निगम पार्षद कमल वाघेला ने इसे “कर्तव्य में घोर लापरवाही” का मामला बताया है। जांच लंबित रहने तक कई नगरपालिका अधिकारियों को निलंबित कर दिया गया है।
इस घटना ने राजनीतिक तूल भी पकड़ लिया है। विपक्षी कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने भाजपा नीत राज्य सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि “स्वच्छ पानी कोई एहसान नहीं, बल्कि जीवन का अधिकार है।” सरकार ने आश्वासन दिया है कि भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए नए नियम बनाए जाएंगे और दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा।
जल सुरक्षा पर सवाल
‘द हिंदू’ के एक संपादकीय ने इस घटना को भारत के जल प्रबंधन के लिए एक “वेक-अप कॉल” (चेतावनी) बताया है। वहीं, विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि जैसे-जैसे भारत की शहरी आबादी बढ़ रही है, जल परीक्षण में ढिलाई बीमारियों के प्रकोप को बढ़ा सकती है।
टाइम्स ऑफ इंडिया की एक रिपोर्ट के अनुसार, दिल्ली सरकार द्वारा संचालित सार्वजनिक जल-परीक्षण प्रयोगशालाओं में से केवल 8% ही राष्ट्रीय प्रत्यायन बोर्ड (NABL) से मान्यता प्राप्त हैं, जो कि राष्ट्रीय औसत 59% से काफी कम है।
इंदौर की यह घटना बताती है कि महज कागजों पर या बाहरी दिखावे में ‘स्वच्छ’ होना काफी नहीं है, जमीनी स्तर पर नागरिकों की बुनियादी सुविधाओं और सुरक्षा पर ध्यान देना ही असली पैमाना होना चाहिए।
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