श्रीलंका के तट के करीब अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र में एक अमेरिकी पनडुब्बी के हमले का शिकार होकर डूबे ईरानी युद्धपोत ‘आईआरआईएस देना’ (IRIS Dena) को लेकर कूटनीतिक और रणनीतिक हलचल तेज हो गई है। ईरान लगातार इस बात का खंडन कर रहा है कि उसका यह जहाज किसी भी प्रकार के हथियारों से लैस था। इसी बीच, एक प्रमुख रक्षा विश्लेषक ने इस संभावना पर गंभीर संदेह व्यक्त किया है कि क्या इस ईरानी फ्रिगेट को ट्रैक करने और डुबाने के लिए भारत ने अमेरिका के साथ कोई संवेदनशील खुफिया जानकारी साझा की थी।
अमेरिका-भारत खुफिया डेटा साझाकरण पर चिंता
नई दिल्ली स्थित सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च (Centre for Policy Research) के रणनीतिक अध्ययन के एमेरिटस प्रोफेसर और भू-रणनीतिकार ब्रह्मा चेलानी (Brahma Chellaney) ने इस घटनाक्रम का गहराई से विश्लेषण किया है। उनके अनुसार, भारत और अमेरिका ‘कॉमकासा’ (COMCASA) और ‘लेमोआ’ (LEMOA) जैसे सैन्य समझौतों के तहत महत्वपूर्ण और संवेदनशील समुद्री डेटा एक-दूसरे के साथ साझा करते हैं।
साल 2018 में हस्ताक्षरित कॉमकासा (कम्युनिकेशंस कम्पैटिबिलिटी एंड सिक्योरिटी एग्रीमेंट) समझौता अमेरिका को भारत के साथ उन्नत और एन्क्रिप्टेड संचार प्रणालियां साझा करने की अनुमति देता है, जिससे दोनों देशों की सेनाओं के बीच सुरक्षित और रियल-टाइम डेटा का सीधा आदान-प्रदान संभव हो पाता है। वहीं, लेमोआ (लॉजिस्टिक्स एक्सचेंज मेमोरेंडम ऑफ एग्रीमेंट) भारतीय और अमेरिकी सेनाओं के बीच पारस्परिक और प्रतिपूर्ति के आधार पर रसद सहायता, आपूर्ति और सेवाओं के आदान-प्रदान का एक मजबूत ढांचा प्रदान करता है।
ब्रह्मा चेलानी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स (X) पर अपनी एक पोस्ट में स्पष्ट किया कि यदि किसी अमेरिकी हमलावर पनडुब्बी ने उस ईरानी फ्रिगेट को खोजने और डुबाने के लिए इसी साझा डेटा का इस्तेमाल किया है, जो ठीक उसी वक्त एक बहुपक्षीय नौसैनिक अभ्यास में भाग लेकर भारतीय बंदरगाह से निकला था, तो यह भारत-अमेरिका रक्षा साझेदारी के बुनियादी सिद्धांतों का सीधा उल्लंघन होगा।
‘मिलन-2026’ अभ्यास और शांति प्रोटोकॉल का संदर्भ
चेलानी ने अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए कहा कि आईआरआईएस देना जैसा मौज-क्लास (Moudge-class) का फ्रिगेट अगर पूरी तरह से हथियारों से लैस भी हो, तब भी वह भारत के समुद्री क्षेत्र में सक्रिय किसी अमेरिकी परमाणु-संचालित पनडुब्बी का मुकाबला नहीं कर सकता। लेकिन इस पूरी घटना में परिस्थितियां बेहद मायने रखती हैं।
उन्होंने बताया कि अगर देना जहाज पर भारत के ‘मिलन-2026’ (MILAN-2026) अभ्यास के “शांति प्रोटोकॉल” के तहत बहुत कम या बिल्कुल भी हथियार नहीं थे, तो यह हमला किसी युद्ध की तरह कम और एक पूर्व नियोजित हत्या की तरह ज्यादा प्रतीत होता है।
इस रणनीतिक विशेषज्ञ के मुताबिक ईरान का यह दावा अवास्तविक नहीं है कि उनका जहाज निहत्था था। ऐसे नौसैनिक अभ्यासों का मुख्य उद्देश्य सैन्य सहयोग और आपसी भाईचारा बढ़ाना होता है। आमतौर पर इन आयोजनों में शामिल होने वाले युद्धपोत तब तक अपने साथ गोला-बारूद का पूरा जखीरा लेकर नहीं चलते, जब तक कि किसी निर्धारित ‘लाइव-फायर ड्रिल’ (गोलीबारी अभ्यास) के लिए ऐसा करना अनिवार्य न हो।
‘मिलन’ अभ्यास के हार्बर चरण (harbour phase) के दौरान भाग लेने वाले सभी जहाजों को एक बेहद सुरक्षित स्थिति में रहना होता है। इस चरण में सार्वजनिक पर्यटन, कूटनीतिक कार्यक्रम और फ्लीट रिव्यू जैसी गतिविधियां शामिल होती हैं, जिनके लिए सख्त सुरक्षा प्रोटोकॉल का पालन किया जाता है। समुद्री चरण (sea phase) के दौरान भी, जहां परिचालन अभ्यास और लाइव-फायर जैसी गतिविधियां होती हैं, वहां भी गोला-बारूद को अत्यधिक नियंत्रित रखा जाता है और यह केवल विशिष्ट अभ्यासों की जरूरत तक ही सीमित होता है।
ईरानी पक्ष का कड़ा ऐतराज
ईरान इस बात पर पूरी तरह से कायम है कि घटना के समय जहाज पर किसी भी प्रकार के हथियार मौजूद नहीं थे और उनके नाविक केवल भारतीय नौसेना के निमंत्रण पर भारत आए थे। भारत में ईरान के सर्वोच्च नेता के प्रतिनिधि, अयातुल्ला डॉ. अब्दुल मजीद हकीमेलाही (Ayatollah Dr Abdul Majeed Hakeemelahi) ने एक साक्षात्कार में कड़ा ऐतराज जताते हुए कहा कि ईरानी जहाज को निशाना बनाना पूरी तरह से अंतरराष्ट्रीय कानून के खिलाफ है, क्योंकि उनके पास युद्ध लड़ने लायक कोई भी हथियार नहीं था।
चेलानी ने अपने विश्लेषण का निष्कर्ष निकालते हुए कहा कि यदि ईरानी युद्धपोत विजाग (Vizag) बंदरगाह से इस तरह की ‘प्रतिबंधित और सुरक्षित स्थिति’ में रवाना हुआ था, तो यह एक भारी असंतुलन की स्थिति को दर्शाता है। एक ऐसा जहाज, जो हल्के हथियारों के साथ केवल एक सहकारी अभ्यास में हिस्सा लेने आया था, उसे दुनिया के सबसे परिष्कृत और उन्नत अंडरसी वॉरफेयर प्लेटफॉर्म द्वारा ट्रैक करके नष्ट कर दिया गया।
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