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सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस उज्जल भुइयां ने बताए भेदभाव के दो चौंकाने वाले किस्से, कहा- ‘संवैधानिक नैतिकता से हम अभी कोसों दूर’

| Updated: February 24, 2026 15:25

सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस उज्जल भुइयां ने मुस्लिम छात्रा को कमरा न मिलने और दलित महिला के हाथ का बना खाना न खाने जैसी घटनाओं का जिक्र कर समाज का असली आईना दिखाया है। उन्होंने जिला न्यायपालिका की भूमिका और जजों की गरिमा पर भी बेबाक राय रखी।

सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस उज्जल भुइयां ने समाज में गहराई तक पैठ बना चुके भेदभाव को लेकर एक बेहद गंभीर और विचारणीय टिप्पणी की है। उन्होंने कहा है कि भलें ही हमारी संवैधानिक अदालतें ‘संवैधानिक नैतिकता’ की वकालत करती हों, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि आजादी के 75 साल बाद भी हमारे समाज की दरारें और भेदभाव जस के तस बने हुए हैं।

जस्टिस भुइयां तेलंगाना जजेज एसोसिएशन और तेलंगाना स्टेट ज्यूडिशियल एकेडमी द्वारा आयोजित एक सेमिनार में ‘संवैधानिक नैतिकता और जिला न्यायपालिका की भूमिका’ विषय पर अपने विचार रख रहे थे। इस दौरान उन्होंने समाज की असलियत बयां करने वाले दो हैरान कर देने वाले उदाहरण भी साझा किए।

नाम और धर्म पूछकर छात्रा को नहीं दिया कमरा

जस्टिस भुइयां ने पहला वाकया अपनी ही बेटी की एक दोस्त का सुनाया। उन्होंने बताया:

“मेरी बेटी की एक दोस्त नोएडा की एक प्राइवेट यूनिवर्सिटी से अपना पीएचडी (PhD) प्रोग्राम कर रही है। उसे रहने के लिए एक कमरे की तलाश थी। इसी सिलसिले में वह दक्षिण दिल्ली (South Delhi) में एक वर्किंग वुमन हॉस्टल चलाने वाली महिला के पास पहुंची। मकान मालकिन ने सबसे पहले उसका नाम पूछा। जब छात्रा ने अपना नाम बताया (जिससे धर्म स्पष्ट नहीं हो रहा था), तो मकान मालकिन ने कुरेदते हुए उसका उपनाम (Surname) पूछा। उपनाम बताते ही लड़की की मुस्लिम पहचान उजागर हो गई। इसके बाद मकान मालकिन ने दो-टूक कह दिया कि यहां कमरा खाली नहीं है और वह अपने लिए कोई और जगह तलाश ले।”

ओडिशा का मामला: ‘दलित महिला के हाथ का बना खाना नहीं खाएंगे बच्चे’

दूसरा किस्सा साझा करते हुए उन्होंने ओडिशा का रुख किया। जस्टिस भुइयां ने बताया कि ग्रामीण इलाकों के बच्चों को बुनियादी शिक्षा से जोड़ने के लिए सरकार स्कूलों में मिड-डे मील योजना चला रही है। इस योजना के तहत खाना बनाने के लिए सरकार ने आंगनवाड़ी केंद्रों की कई महिलाओं को रोजगार दिया है, जिनमें से कुछ दलित समुदाय से आती हैं।

जब कुछ अभिभावकों को यह पता चला कि खाना दलित महिलाएं बना रही हैं, तो उन्होंने बेहद आक्रामक तरीके से हंगामा खड़ा कर दिया। उन्होंने साफ शब्दों में कह दिया कि उनके बच्चे किसी दलित महिला के हाथ का बना भोजन नहीं करेंगे।

इन दोनों घटनाओं का जिक्र करते हुए जस्टिस भुइयां ने अफसोस जताया कि यह सिर्फ ‘हिमशैल का सिरा’ (Tip of the iceberg) है, जो दिखाता है कि हमारे समाज में भेदभाव की जड़ें कितनी गहरी हैं। गणतंत्र बनने के 75 साल बाद भी हम संवैधानिक नैतिकता के उस मापदंड से बहुत दूर खड़े हैं, जिसकी उम्मीद हमारा संविधान हमसे करता है।

क्या है संवैधानिक नैतिकता? (अहम मुकदमों का संदर्भ)

संवैधानिक नैतिकता को स्पष्ट करते हुए जस्टिस भुइयां ने कहा कि यह एक ऐसा बेंचमार्क है जिस पर हम सभी को खरा उतरना चाहिए। लेकिन हम अपने घरों या समुदायों में जिस नैतिकता का पालन करते हैं, वह अक्सर संविधान की अपेक्षाओं से बिल्कुल उलट होती है।

उन्होंने इस सिद्धांत के विकास को समझाने के लिए तीन ऐतिहासिक मुकदमों का भी जिक्र किया:

  • नाज़ फाउंडेशन बनाम भारत संघ: इसमें दिल्ली हाईकोर्ट ने भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 377 को उस हद तक कम कर दिया था, जहां यह समलैंगिक संबंधों को अपराध मानती थी। अदालत ने माना था कि लोकप्रिय सामाजिक नैतिकता के आधार पर अनुच्छेद 21 को सीमित नहीं किया जा सकता।
  • सुरेश कुमार कौशल बनाम नाज़ फाउंडेशन: सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाईकोर्ट के उपरोक्त फैसले को पलट दिया था।
  • नवतेज सिंह जौहर: अंततः सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने इस मामले में परिवर्तनकारी संविधानवाद (transformative constitutionalism) को हासिल करने के लिए संवैधानिकता और नैतिकता के सिद्धांतों को मार्गदर्शक के रूप में बरकरार रखा।

न्याय की पहली सीढ़ी हैं निचली अदालतें, जजों का सम्मान जरूरी

जिला न्यायपालिका के महत्व पर जोर देते हुए जस्टिस भुइयां ने याद दिलाया कि ज्यादातर वादकारियों (litigants) के लिए ट्रायल कोर्ट ही न्याय का पहला दरवाजा होते हैं। इसलिए सबूत दर्ज करने और जमानत जैसे मामलों की सुनवाई को पूरी अहमियत दी जानी चाहिए।

उन्होंने कहा कि ट्रायल जजों की गरिमा का पूरा सम्मान होना चाहिए क्योंकि उन्हीं के द्वारा तय किए गए तथ्यात्मक आधार पर अपीलीय अदालतें (Appellate Courts) कानून को स्पष्ट करती हैं। उन्होंने याद दिलाया कि देश के कई बेहतरीन जजों ने अपने करियर की शुरुआत जिला न्यायपालिका से ही की थी, जिनमें जस्टिस एचके खन्ना (HK Khanna), जस्टिस ए.एम अहमदी और जस्टिस फातिमा बीवी जैसे बड़े नाम शामिल हैं।

हाईकोर्ट की भूमिका पर बात करते हुए उन्होंने कहा:

“हाईकोर्ट निचली अदालतों का मार्गदर्शक (Mentor) है और जरूरत पड़ने पर उसे उंगली पकड़कर चलना सिखाना चाहिए। संविधान के अनुच्छेद 227 के तहत हाईकोर्ट का अधिकार क्षेत्र एक ‘ढाल’ की तरह है, ‘तलवार’ की तरह नहीं। इसका काम केवल अधिकार क्षेत्र से जुड़ी गंभीर गलतियों को सुधारना है, न कि ट्रायल जज के विवेक (discretion) की जगह अपना फैसला थोपना।”

न्यायपालिका बने ‘इंद्रधनुषी संस्था’: तेलंगाना ने पेश की मिसाल

जस्टिस भुइयां ने गर्व के साथ बताया कि न्यायपालिका में महिलाओं के प्रतिनिधित्व के मामले में तेलंगाना ने पूरे देश में एक मिसाल कायम की है।

तेलंगाना न्यायिक सेवा के आंकड़े:

  • कुल स्वीकृत पद: 655
  • वर्तमान में कार्यरत अधिकारी: 478
  • महिला अधिकारी: 283 (जो कि 50 प्रतिशत के आंकड़े से कहीं ज्यादा है)

इसके अलावा, हाशिए के समुदायों का प्रतिनिधित्व भी काफी शानदार है:

  • अनुसूचित जाति (SC): 76 न्यायिक अधिकारी
  • अनुसूचित जनजाति (ST): 46 न्यायिक अधिकारी
  • अल्पसंख्यक समुदाय: 25 न्यायिक अधिकारी

हाल ही में सुप्रीम कोर्ट के ‘इन रे: रिक्रूटमेंट ऑफ विजुअली इम्पेड इन ज्यूडिशियल सर्विसेज (2025)’ फैसले के बाद 5 दिव्यांग न्यायिक अधिकारी भी इस सिस्टम का हिस्सा बने हैं। जस्टिस भुइयां ने कहा कि भाषा और कानूनी निरक्षरता न्याय के रास्ते में बड़ी बाधाएं हैं। इसलिए महिलाओं, हाशिए के समुदायों और दिव्यांगजनों का प्रतिनिधित्व बढ़ना जरूरी है ताकि आम आदमी न्यायपालिका से जुड़ाव महसूस कर सके।

उन्होंने यह इच्छा भी जताई कि न्यायपालिका को एक ‘इंद्रधनुषी संस्था’ (Rainbow Institution) बनना चाहिए, जिसमें समाज के हर रंग की नुमाइंदगी हो। उन्होंने कहा कि उन्हें उस दिन बहुत खुशी होगी जब कोई किन्नर (Transgender) या यौन अल्पसंख्यक समुदाय का व्यक्ति न्याय के इस आसन पर बैठेगा।

महिलाओं पर क्या होगा 3 साल की प्रैक्टिस वाले नियम का असर?

अंत में, जस्टिस भुइयां ने ज्यूडिशियल सर्विस में एंट्री लेवल के लिए वकील के तौर पर न्यूनतम तीन साल की प्रैक्टिस के नियम पर बात की (जिसे पिछले साल सुप्रीम कोर्ट ने बहाल किया है)। उन्होंने माना कि इससे व्यावहारिक ज्ञान (practical exposure) तो मिलेगा, लेकिन इसका महिलाओं पर क्या असर होगा, यह आने वाला वक्त बताएगा।

उन्होंने चिंता जताते हुए कहा कि वकालत के शुरुआती साल काफी मेहनत वाले और आर्थिक रूप से अनिश्चित होते हैं। इसका सबसे ज्यादा असर ग्रामीण और छोटे कस्बों से आने वाली महिला उम्मीदवारों पर पड़ सकता है, जिन्हें शादी या सामाजिक दबावों के कारण अपने करियर में ब्रेक लेना पड़ता है। इसलिए यह बारीकी से देखने वाली बात होगी कि यह नया नियम महिलाओं के न्यायपालिका में शानदार प्रवेश को किस हद तक प्रभावित करता है।

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