पश्चिम एशिया में अमेरिका और इजरायल के हमलों के बाद उपजे संघर्ष के बीच ईरान की मदद के लिए भारत से भी हाथ उठने लगे हैं। पिछले हफ्ते कारगिल के काकसर गांव में एक दिल छू लेने वाला वाकया सामने आया। यहां एक महिला ने राहत कार्यों में अपना योगदान देने के लिए एक मस्जिद के बाहर तीन मुर्गियां दान कर दीं।
दान में मिली उन मुर्गियों में से एक ने बाद में एक अंडा दिया। लोगों को दान के लिए और अधिक प्रेरित करने के मकसद से इस अंडे की नीलामी करने का फैसला किया गया। इस अनोखी नीलामी की शुरुआत 100 रुपये की बोली से हुई थी। वहां मौजूद भीड़ का उत्साह बढ़ता गया और देखते ही देखते वह अंडा 6,000 रुपये में नीलाम हो गया।
पिछले एक हफ्ते में यह भावनात्मक चलन पूरे कारगिल में तेजी से लोकप्रिय हो गया है। चौराहों पर लोग अंडे या सेब जैसी छोटी-छोटी चीजें दान के लिए ला रहे हैं और फिर उनकी सार्वजनिक नीलामी की जा रही है। इसी कड़ी में करकिचू गांव में एक सेब की नीलामी हुई, जिसने 1.05 लाख रुपये की भारी कीमत हासिल की।
ईरान में पढ़ाई करने वाले और इन दिनों अपने घर कारगिल आए छात्र शेख हसनैन भी ऐसी ही एक नीलामी के गवाह बने। उन्होंने बताया कि यह लोगों द्वारा घर से लाई गई चीजों से जुड़ी उनकी पवित्र भावनाओं का सम्मान करने का एक तरीका है। जब कोई एक सेब लाता है और दूसरा उसके लिए बड़ी रकम चुकाता है, तो यह एक समुदाय के रूप में उनके योगदान के प्रति हमारा साझा सम्मान दर्शाता है।
गौरतलब है कि 1 मार्च को ईरान के तत्कालीन सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की हत्या कर दी गई थी। इस घटना के बाद पश्चिम एशिया में युद्ध के खिलाफ विरोध प्रदर्शन करने के लिए पूरे लद्दाख क्षेत्र के लोग बड़ी संख्या में सड़कों पर उतर आए थे।
इस विरोध के साथ-साथ पूरे क्षेत्र के अलग-अलग हिस्सों से लगातार मदद की पेशकश भी की जा रही है। लोगों द्वारा दिए जा रहे इस चंदे और राहत सामग्री को इकट्ठा करके बाद में नई दिल्ली स्थित ईरानी दूतावास को भेज दिया जाता है।
करकिचू गांव के सेब अपनी लंबी शेल्फ लाइफ यानी जल्दी खराब न होने की खूबी के लिए काफी मशहूर हैं। हसनैन के मुताबिक, इन सेबों का सीजन आमतौर पर नवंबर में ही खत्म हो जाता है और मार्च के महीने में इनका मिलना बेहद दुर्लभ होता है। किसी ग्रामीण के घर में पिछले सीजन का एक सेब बचा हुआ था, जिसे वह पूरे सम्मान के साथ दान के लिए ले आया।
इस खास सेब की नीलामी की शुरुआत 200 रुपये की बोली से हुई थी। आखिरकार, इलियास नाम के एक स्थानीय व्यवसायी ने इसे एक लाख रुपये से थोड़ी अधिक कीमत देकर खरीद लिया। हसनैन ने बताया कि यह उस व्यक्ति के प्रति सम्मान दिखाने का व्यवसायी का अपना तरीका था जो केवल एक सेब ला सकता था, ताकि उसके उस छोटे से योगदान को भी बड़ा और खास बनाया जा सके।
कारगिल में शिया मुसलमानों की एक बड़ी आबादी रहती है, लेकिन पिछले एक महीने के दौरान पूरे लद्दाख से ईरान के लिए चंदा और मदद भेजी गई है। अपनी गुल्लक से पैसे दान करने वाले स्कूली बच्चों से लेकर अपने घरों के तांबे के बर्तन देने वाले परिवारों तक, जम्मू-कश्मीर और लद्दाख के लोग ईरान को वित्तीय सहायता देने के लिए पूरी तरह से एकजुट हुए हैं।
भारत में मौजूद ईरानी दूतावास ने भी इस निस्वार्थ और भावुक समर्थन की दिल से सराहना की है। दूतावास ने सोशल मीडिया पर संदेश पोस्ट करके ईरान के पुनर्निर्माण की दिशा में दिए गए इस अहम योगदान के लिए विशेष रूप से जम्मू-कश्मीर और कारगिल के लोगों का आभार व्यक्त किया है।
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